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भोपाल में बेगम वाली होली: 325 साल पुरानी परंपरा की झलक

भोपाल में बेगम वाली होली: 325 साल पुरानी परंपरा की झलक

भोपाल: देशभर में होली का त्योहार अपने अनोखे अंदाज में मनाया जाता है, लेकिन भोपाल की होली का इतिहास कुछ खास रहा है। नवाबी दौर में यह महज रंगों का त्योहार नहीं था, बल्कि गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल भी थी। यहां की होली में नवाबों और बेगमों की खास भागीदारी हुआ करती थी, और इस परंपरा की झलक आज भी शहर की फिजाओं में महसूस की जा सकती है।

325 साल पुरानी परंपरा
भोपाल में होली मनाने की परंपरा सन् 1700 में नवाब दोस्त मोहम्मद खान के जमाने से चली आ रही है। हालांकि, इसे खास पहचान नवाबी दौर में मिली, जब यहां की महिला शासकों—सिकंदर जहां बेगम और सुल्तान जहां बेगम—ने इसे शाही अंदाज में मनाना शुरू किया। उनके शासनकाल में महल के अंदरूनी हिस्सों में महिलाओं के लिए विशेष आयोजन होते थे, जहां रंगों से सराबोर होकर त्योहार का आनंद लिया जाता था।

बेगम सिकंदर जहां को थे प्राकृतिक रंग पसंद
इतिहासकारों के अनुसार, बेगम सिकंदर जहां को रंगों से खास लगाव था। इकबाल मैदान में होली के बड़े जश्न का आयोजन किया जाता था, जहां बेगम खुद शामिल होती थीं। उन्हें कुदरती रंग पसंद थे, खासतौर पर जाफरान, अर्क गुलाब और अन्य खुशबूदार प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता था।

नवाबों की होली: जब मेहमानों पर उड़ाया जाता था गुलाल
भोपाल के नवाबों के शासनकाल में होली केवल हिंदू प्रजा तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसे नवाब भी पूरे जोश के साथ मनाते थे। महल के अंदर दरबारी, आमजन और विभिन्न समुदायों के लोग एकत्र होते थे। नवाब खुद अपने मेहमानों पर गुलाल उड़ाते और उन्हें शाही अंदाज में त्योहार की बधाई देते। इस मौके पर शेरो-शायरी, मुशायरे और संगीत के आयोजन होते थे, जिसमें फाग गीतों की गूंज महल से बाहर तक सुनाई देती थी।

आज भी जीवंत हैं परंपराएं
समय के साथ भोपाल की होली के रंग बदले, लेकिन इसकी विरासत आज भी पुराने शहर की गलियों में जिंदा है। नवाबी दौर की याद में अब भी बड़े जुलूस निकाले जाते हैं, जिनमें कवि सम्मेलन और फाग गायन की परंपरा जीवित है। लोग पुराने अंदाज में एक-दूसरे के घर जाकर गुलाल लगाते हैं और होली की शुभकामनाएं देते हैं।

भोपाल की होली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि शहर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सर्वधर्म समभाव की मिसाल है।

 

 

 

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