द फ्रंट डेस्क: दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव (DUSU Elections) में कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI को बड़ा झटका लगा है। केंद्रीय पैनल की चारों सीटों—अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव पर NSUI उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा। मतगणना के दौरान कई चरणों में NSUI के उम्मीदवार बढ़त बनाते नजर आए, लेकिन अंतिम नतीजों में संगठन के खाते में एक भी केंद्रीय पद नहीं आया। दूसरी ओर, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने चार में से तीन पदों पर जीत दर्ज की, जबकि उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन विजयी रहे।
इस नतीजे के बाद NSUI के उम्मीदवार चयन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। खासतौर पर दीपांशु शौकीन का मामला चर्चा के केंद्र में है। शौकीन लंबे समय तक NSUI से जुड़े रहे थे और टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरे। चुनाव में उनकी जीत ने संगठन के टिकट वितरण को लेकर बहस को और तेज कर दिया है।
DUSU चुनाव में NSUI की हार की सबसे बड़ी वजह
डूसू छात्रसंघ चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI को करारी हार का सामना करना पड़ा। चुनाव में NSUI केंद्रीय पैनल की चारों सीटों पर जीत दर्ज नहीं कर सकी। इस हार के बाद कांग्रेस के भीतर उम्मीदवार चयन को लेकर सवाल उठने लगे हैं। पार्टी के कई नेता-कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच एक फैसले को हार की अहम वजह के तौर पर देखा जा रहा है। आखिर कांग्रेस से ऐसी कौन-सी चूक हुई, जिसने डूसू चुनाव में NSUI की मुश्किलें बढ़ा दीं? आइए समझते हैं। लेकिन उससे पहले एक नजर डालते हैं डूसू चुनाव के फाइनल रिजल्ट पर।
चार पदों का पूरा परिणाम क्या रहा?
अध्यक्ष पद पर ABVP के यश डबास ने NSUI के विजय शंकर मीणा को हराया। डबास को 24,576 वोट मिले, जबकि मीणा के खाते में 22,523 वोट आए। इस तरह डबास ने 2,053 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने 30,615 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। ABVP के इशु मौर्या को 16,910 और NSUI के वीर चतरथ को 4,313 वोट मिले। सचिव पद पर ABVP की रिया छावड़ी ने 21,650 वोट के साथ जीत दर्ज की, जबकि NSUI उम्मीदवार को 14,869 वोट मिले। संयुक्त सचिव पद पर ABVP के लक्ष्य राज सिंह 16,615 वोट के साथ विजयी रहे। समाजवादी छात्र सभा के विशेष यादव को 15,778 और NSUI के गोपाल चौधरी को 15,206 वोट मिले।
उम्मीदवार चयन पर क्यों उठे सवाल?
चुनाव की शुरुआत में NSUI को लेकर सकारात्मक माहौल होने की चर्चा थी। जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन और चुनाव के दौरान सत्य निकेतन में हुए हादसे जैसे मुद्दों ने भी कैंपस की राजनीति को प्रभावित किया। इसी बीच NSUI के उम्मीदवार चयन को लेकर ऐसा फैसला हुआ, जिस पर अब सवाल उठ रहे हैं। उपाध्यक्ष पद पर जीत हासिल करने वाले दीपांशु शौकीन लंबे समय तक NSUI से जुड़े रहे थे। वह करीब चार साल से संगठन के साथ छात्र राजनीति में सक्रिय थे और चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला और बाद में वह निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतर गए।
दीपांशु शौकीन का टिकट कटा, निर्दलीय लड़कर जीते
दीपांशु शौकीन के टिकट को लेकर सामने आई जानकारी के मुताबिक, वह पिछले चुनाव में भी टिकट के दावेदार रहे थे, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला। संगठन की ओर से भविष्य में उनकी मेहनत का सम्मान करने की बात कही गई थी। इस बार उन्होंने चुनाव के लिए तैयारी की थी और दावा किया गया कि NSUI की ओर से उनके नाम पर विचार भी हुआ था। बाद में उपाध्यक्ष पद के लिए उनका टिकट बदलकर वीर चतरथ को उम्मीदवार बनाया गया। वीर चतरथ कांग्रेस मुख्यालय के प्रभारी मनीष चतरथ के बेटे हैं। उनके परिवार की कांग्रेस से लंबे समय से राजनीतिक संबद्धता बताई जाती है। टिकट बदलने के बाद दीपांशु ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया और नतीजों में उन्हें 30,615 वोट मिले।
कैंपस में जमीनी प्रचार ने दीपांशु को दी अलग पहचान
निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरने के बाद दीपांशु ने कैंपस में लगातार प्रचार किया। पिछले चार वर्षों के दौरान छात्रों के बीच उनकी सक्रियता का भी उनके अभियान में इस्तेमाल हुआ। इसी दौरान सत्य निकेतन में पीजी गिरने का हादसा हुआ, जिसमें उन्होंने छात्रों की मदद की। हादसे में जान गंवाने वाले छात्रों के लिए न्याय की मांग को लेकर उन्होंने जूते-चप्पल छोड़कर नंगे पैर कैंपस में प्रचार किया। उनके इस अभियान ने उन्हें छात्रों के बीच अलग पहचान दिलाई। चुनाव परिणाम में 30,615 वोट हासिल कर उनकी जीत ने NSUI के उम्मीदवार चयन को लेकर चल रही बहस को और तेज कर दिया।
‘राजा का बेटा ही राजा बनेगा’ नैरेटिव से कैसे जुड़ा मामला?
दीपांशु शौकीन सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते हैं। खबर में उनके पिता के DTC में डेली वेज कंडक्टर होने का उल्लेख है। दूसरी ओर, जिस उम्मीदवार को NSUI ने उपाध्यक्ष पद पर टिकट दिया, वह कांग्रेस मुख्यालय के प्रभारी मनीष चतरथ के बेटे हैं। इसी अंतर को लेकर चुनाव के दौरान एक नैरेटिव सामने आया कि संगठन में सामान्य पृष्ठभूमि के छात्र नेता की जगह राजनीतिक परिवार से आने वाले उम्मीदवार को प्राथमिकता दी गई। इसी बहस को ‘राजा का बेटा ही राजा बनेगा’ वाले नैरेटिव से जोड़ा गया। यह नैरेटिव केवल उपाध्यक्ष पद तक सीमित नहीं रहा और समर्थकों के मुताबिक इसका असर दूसरे पदों पर भी पड़ा। हालांकि, इसे चुनावी नतीजे की एक व्याख्या के तौर पर ही देखा जाना चाहिए, निश्चित कारण के तौर पर नहीं।
विशेष यादव का मामला भी NSUI के लिए बना सवाल
उम्मीदवार चयन को लेकर दूसरा मामला विशेष यादव का है। वह भी NSUI की ओर से टिकट के दावेदार बताए गए थे, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने चुनाव में अलग तरीके से मैदान संभाला और समाजवादी छात्र सभा का समर्थन हासिल किया। संयुक्त सचिव पद के परिणाम में विशेष यादव को 15,778 वोट मिले, जबकि NSUI के गोपाल चौधरी को 15,206 वोट मिले। यानी दोनों के बीच केवल 572 वोटों का अंतर रहा और विशेष यादव NSUI उम्मीदवार से आगे रहे। कांग्रेस समर्थकों के एक वर्ग का दावा है कि अगर दीपांशु शौकीन और विशेष यादव जैसे दावेदारों को टिकट दिया जाता, तो DUSU चुनाव का परिणाम अलग हो सकता था। हालांकि, यह एक राजनीतिक आकलन है। चुनाव के आधिकारिक नतीजे यह बताते हैं कि NSUI केंद्रीय पैनल की चारों सीटों में से कोई भी जीत नहीं सकी, जबकि ABVP ने तीन पदों पर जीत दर्ज की और उपाध्यक्ष पद निर्दलीय दीपांशु शौकीन के खाते में गया।




