द फ्रंट डेस्क : यमन के हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों ने सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था को फिर चर्चा में ला दिया है। रियाद और एयरपोर्ट के आसपास काले धुएं की खबरों के बीच सुरक्षा के साथ आर्थिक और रणनीतिक चिंताएं भी बढ़ी हैं। राजधानी में हमले की खबरों का असर हवाई यातायात, कारोबार और लोगों के भरोसे पर पड़ सकता है। ऐसे में अमेरिका, पाकिस्तान और तुर्की की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। अमेरिका सऊदी अरब का प्रमुख रक्षा साझेदार है, जबकि पाकिस्तान और तुर्की भी उसके महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी हैं। इसके बावजूद मौजूदा संकट में सीधे सैन्य हस्तक्षेप के स्पष्ट संकेत नहीं हैं।
हूती कौन हैं और सऊदी अरब को क्यों निशाना बना रहे हैं?
हूती यमन का एक सशस्त्र राजनीतिक और सैन्य संगठन है, जिसका प्रभाव यमन के बड़े हिस्से में है। इसे ईरान समर्थित संगठन के तौर पर देखा जाता है। हूतियों ने पिछले वर्षों में सऊदी अरब पर ड्रोन और मिसाइल से कई हमले किए हैं। लाल सागर में व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाए जाने के कारण उनकी गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा भी बनी हैं। सऊदी अरब और हूतियों के संघर्ष की जड़ यमन के गृहयुद्ध में है। सत्ता संघर्ष के दौरान हूतियों ने बड़े क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया, जिसके बाद सऊदी अरब ने यमन की सरकार के समर्थन में सैन्य हस्तक्षेप किया। धीरे-धीरे यह संघर्ष ईरान और सऊदी अरब की क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता से भी जुड़ गया। रियाद एयरपोर्ट को लेकर सामने आई खबरों ने चिंता बढ़ाई है। रियाद देश का प्रमुख राजनीतिक और आर्थिक केंद्र है। ऐसे में राजधानी या एयरपोर्ट के आसपास हमले का असर सुरक्षा के अलावा हवाई यातायात, कारोबार और निवेश पर भी पड़ सकता है।
सऊदी अरब को अमेरिकी समर्थन पर क्यों उठ रहे सवाल?
सऊदी अरब और अमेरिका के बीच दशकों पुराने रक्षा और रणनीतिक संबंध हैं। अमेरिका लंबे समय से रियाद का प्रमुख रक्षा साझेदार है और सऊदी अरब अमेरिकी हथियारों और सैन्य तकनीक का बड़ा खरीदार भी है। दोनों देशों के बीच सुरक्षा, खुफिया जानकारी और क्षेत्रीय रणनीति पर सहयोग रहा है। मौजूदा संकट में अमेरिकी भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट में अमेरिका और हूती प्रतिनिधियों के बीच ओमान में बातचीत की बात कही गई है। ऐसे में एक तरफ सऊदी अरब हूती हमलों का सामना कर रहा है, वहीं अमेरिका बातचीत के जरिए तनाव कम करने का रास्ता तलाश रहा है। हालांकि, इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि अमेरिका ने सऊदी अरब से दूरी बना ली है। दोनों देशों के संबंध अभी भी व्यापक हैं। लेकिन सवाल यह जरूर है कि किसी बड़े क्षेत्रीय संकट में अमेरिका रियाद के समर्थन में कितनी सैन्य भूमिका निभाएगा। हथियार और खुफिया सहयोग देना तथा सीधे युद्ध में उतरना अलग-अलग बातें हैं।
पाकिस्तान और तुर्की की भूमिका कितनी अहम है?
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से सैन्य और रणनीतिक सहयोग है। इसलिए सऊदी अरब पर बाहरी खतरे की स्थिति में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर सवाल उठते हैं। दोनों देशों के हालिया समझौते के बाद भी रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान ने इसे रक्षात्मक प्रकृति का बताया है और सीधे सैन्य कार्रवाई से दूरी रखी है। ऐसे में मजबूत संबंधों के बावजूद हर स्थिति में पाकिस्तानी सेना का सीधे युद्ध में उतरना जरूरी नहीं है। तुर्की भी सऊदी अरब का महत्वपूर्ण क्षेत्रीय साझेदार है। दोनों देशों के आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं, लेकिन हूती संकट में तुर्की की ओर से सीधे सैन्य हस्तक्षेप के स्पष्ट संकेत नहीं हैं। यमन का संघर्ष ईरान, अमेरिका और लाल सागर की सुरक्षा से जुड़ा है। ऐसे में तुर्की की भूमिका फिलहाल सैन्य हस्तक्षेप के बजाय कूटनीतिक और रणनीतिक सहयोग के रूप में अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देती है।
लाल सागर और तेल व्यापार के लिए यह संकट कितना अहम है?
लाल सागर एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व के बीच समुद्री व्यापार का प्रमुख मार्ग है। यहां से बड़ी संख्या में मालवाहक और ऊर्जा से जुड़े जहाज गुजरते हैं। लंबे समय तक अस्थिरता रहने पर इसका असर सऊदी अरब के साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है। सऊदी अरब प्रमुख तेल उत्पादकों में शामिल है और उसके लिए सुरक्षित समुद्री रास्ते बेहद महत्वपूर्ण हैं। अगर हूती हमलों के कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है और कंपनियों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ते हैं, तो परिवहन समय और लागत बढ़ सकती है। इसका असर ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक शिपिंग बाजार पर भी पड़ सकता है। इसलिए लाल सागर में हूतियों की गतिविधियां सिर्फ सैन्य खतरा नहीं हैं। यह सऊदी अरब के ऊर्जा निर्यात और व्यापारिक हितों से भी जुड़ा मुद्दा है।
क्या सऊदी अरब के सामने बदल रहा है सुरक्षा समीकरण
यह कहना कि सऊदी अरब पूरी तरह अकेला पड़ गया है, एक राजनीतिक और विश्लेषणात्मक निष्कर्ष होगा। हालांकि, मौजूदा घटनाक्रम से यह संकेत मिलता है कि रियाद अपने सहयोगियों से हर स्थिति में सीधे सैन्य हस्तक्षेप की उम्मीद नहीं कर सकता। अमेरिका, पाकिस्तान और तुर्की के साथ उसके मजबूत संबंध हैं, लेकिन हर देश अपने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय हितों के आधार पर भूमिका तय कर रहा है। अमेरिका बातचीत और सैन्य दबाव दोनों विकल्पों पर काम कर रहा है, पाकिस्तान अपने रक्षा समझौते की सीमाओं पर जोर दे रहा है और तुर्की सीधे सैन्य टकराव से दूर है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सऊदी अरब के इन देशों से संबंध खत्म हो गए हैं। बल्कि यह बदलते मिडिल ईस्ट में सुरक्षा साझेदारी की बढ़ती जटिलता को दिखाता है।
सऊदी अरब के पास इतनी सैन्य ताकत, फिर भी हूतियों को जवाब देना क्यों मुश्किल?
सऊदी अरब के पास आधुनिक सैन्य हथियारों की बड़ी ताकत है। 2026 के Global Firepower के मुताबिक उसके पास करीब 917 सैन्य विमान, 283 फाइटर जेट, 264 हेलीकॉप्टर, 1,085 टैंक और 22,370 बख्तरबंद वाहन हैं। इसके अलावा Patriot जैसे आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम भी मौजूद हैं। सैन्य ताकत के आकलन में सऊदी अरब को 145 देशों में 25वें स्थान पर रखा गया है। फिर भी हूतियों से निपटना चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि दोनों पक्षों की युद्ध रणनीति अलग है। सऊदी के पास F-15 जैसे महंगे फाइटर जेट और आधुनिक एयर डिफेंस हैं, जबकि हूती ड्रोन, क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल करते हैं। कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन और अलग-अलग दिशाओं से होने वाले हमले एयर डिफेंस के लिए चुनौती बन सकते हैं। यानी समस्या हथियारों की कमी नहीं, बल्कि हूतियों की असममित युद्ध रणनीति है। बड़े क्षेत्र की लगातार निगरानी और हर ड्रोन-मिसाइल को रोकना मुश्किल और महंगा हो सकता है। इसलिए सऊदी अरब के पास हूतियों पर हमला करने की क्षमता होने के बावजूद उनके हर हमले को 100 फीसदी रोक पाना संभव नहीं है।




