द फ्रंट डेस्क: निठारी कांड के आरोपी रहे सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में मौत ने एक बार फिर उस चर्चित मामले को सुर्खियों में ला दिया है। करीब दो दशक जेल में रहने के बाद नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट से आखिरी मामले में भी राहत मिलने के बाद सुरेंद्र कोली जेल से बाहर आया था। यानी उसकी मौत के समय वह निठारी कांड के किसी मामले में सजा नहीं काट रहा था। इसके करीब 10 महीने बाद 18 सितंबर 2026 को हरिद्वार में उसकी चाय की दुकान के अंदर उसकी मौत हो गई। पुलिस शुरुआती तौर पर इसे आत्महत्या का मामला मान रही है, लेकिन अभी पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। वहीं, सुरेंद्र कोली के परिवार और उसके करीबियों ने मौत की परिस्थितियों पर सवाल उठाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।
2025 में सभी मामलों से बरी हो गया था सुरेंद्र कोली
सुरेंद्र कोली करीब दो दशक तक निठारी कांड से जुड़े मामलों में जेल में रहा। निठारी कांड 2006 में सामने आया था, जब नोएडा में कई बच्चों और महिलाओं के लापता होने के बाद एक मकान के पास मानव अवशेष बरामद हुए थे। इस मामले में कोली और मकान मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर को गिरफ्तार किया गया था और बाद में अलग-अलग मामलों में उन्हें दोषी ठहराया गया था। हालांकि, वर्षों तक चली न्यायिक प्रक्रिया में कोली को लगातार राहत मिलती गई। अक्टूबर 2023 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कई मामलों में उसे बरी कर दिया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी बचे मामले में भी उसकी सजा रद्द कर दी और उसे रिहा करने का आदेश दिया। इस तरह उसकी मौत के समय निठारी कांड से जुड़े सभी मामलों में वह कानूनी तौर पर बरी हो चुका था।

जेल से बाहर आने के बाद नई जिंदगी शुरू करने की कोशिश
जेल से बाहर आने के बाद सुरेंद्र कोली के सामने सबसे बड़ी चुनौती सामान्य जिंदगी दोबारा शुरू करने की थी। रिपोर्टों के मुताबिक, वह काम और रहने की जगह की तलाश में दिल्ली और उत्तराखंड के अलग-अलग इलाकों में रहा। हरिद्वार पहुंचने के बाद उसने कुछ समय सिक्योरिटी गार्ड के तौर पर भी काम किया। बाद में उसने अपना छोटा कारोबार शुरू करने का फैसला किया और भूपतवाला इलाके में एक चाय की दुकान किराये पर ली। रिपोर्टों के मुताबिक, मौत से कुछ दिन पहले ही उसने दुकान शुरू की थी। वह वहां ‘सदा राम’ नाम से रह रहा था और अपनी पुरानी पहचान को सार्वजनिक होने से बचाने की कोशिश कर रहा था। उसके करीबियों के मुताबिक, जेल से बाहर आने के बाद वह काम करके अपनी जिंदगी दोबारा खड़ी करना चाहता था।

हरिद्वार में दुकान के अंदर मिला शव
18 सितंबर 2026 को हरिद्वार के भूपतवाला इलाके में उसकी चाय की दुकान के अंदर उसका शव मिला। सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची और फॉरेंसिक टीम ने भी घटनास्थल की जांच की। पुलिस के अनुसार, मौके से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला। हरिद्वार पुलिस ने शुरुआती तौर पर आत्महत्या की आशंका जताई, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि मौत का वास्तविक कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट और फॉरेंसिक जांच के बाद ही स्पष्ट होगा। शव का पोस्टमार्टम डॉक्टरों के पैनल ने किया। 20 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार कर रही थी और अधिकारियों ने कहा कि सभी पहलुओं को देखा जा रहा है।

अगर बरी हो गया था तो आत्महत्या क्यों? यही सबसे बड़ा सवाल
सुरेंद्र कोली की मौत के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात को लेकर हो रही है कि जब वह 2025 में सभी निठारी मामलों से बरी हो चुका था, तो उसके बाद उसने यह कदम क्यों उठाया? लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है कि बरी होना अपने आप में किसी व्यक्ति की निजी परिस्थितियों या मानसिक स्थिति के बारे में कोई निष्कर्ष नहीं देता। रिपोर्टों में सामने आया है कि जेल से बाहर आने के बाद कोली को काम और रहने की जगह तलाशने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा। वह अपनी पहचान छिपाकर रह रहा था और आर्थिक परेशानियों से भी जूझ रहा था। उसके करीबियों ने बताया कि वह नई जिंदगी शुरू करने की कोशिश कर रहा था। हालांकि, इन परिस्थितियों से उसकी मौत का कारण निश्चित रूप से साबित नहीं होता। पुलिस ने भी अभी तक आत्महत्या के पीछे कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई है।
परिवार ने उठाए सवाल, हत्या की आशंका जताई
सुरेंद्र कोली के परिवार ने उसकी मौत की परिस्थितियों पर सवाल उठाए हैं। परिवार के कुछ सदस्यों और करीबियों ने कहा है कि उन्हें यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं लग रहा कि मामला आत्महत्या का ही है। उन्होंने जांच की मांग की है। हरिद्वार में कोली के संपर्क में रहे सामाजिक कार्यकर्ता नारायण सिंह रावत ने भी मौत को लेकर संदेह जताया और निष्पक्ष जांच की मांग की। उन्होंने दावा किया कि कोली आर्थिक परेशानियों से जूझ रहा था और चाय की दुकान शुरू करने के लिए उसने आर्थिक मदद ली थी। हालांकि, रावत की ओर से लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और पुलिस ने अभी इन्हें हत्या का प्रमाण नहीं माना है।
क्या पुलिस जांच में कुछ संदिग्ध मिला है?
फिलहाल उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि सुरेंद्र कोली की हत्या हुई है या किसी साजिश के तहत उसकी जान ली गई। पुलिस ने घटनास्थल की जांच की है, फॉरेंसिक टीम को भी बुलाया गया और पोस्टमार्टम कराया गया है। अब जांच में पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक रिपोर्ट अहम भूमिका निभाएगी। हरिद्वार के पुलिस अधिकारियों ने कहा है कि रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई तय होगी और सभी पहलुओं की जांच की जा रही है। इसलिए फिलहाल दो बातें अलग-अलग हैं—पुलिस की शुरुआती आशंका आत्महत्या की है, जबकि परिवार और कुछ करीबियों ने मौत की परिस्थितियों पर संदेह जताया है। अभी उपलब्ध जानकारी से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि इनमें से कौन-सा पक्ष सही है।
2014 में भी फांसी से कुछ घंटे पहले बदल गई थी पूरी कहानी
सुरेंद्र कोली की मौत के साथ 2014 की वह रात भी फिर चर्चा में आ गई है, जब उसे फांसी दी जानी थी। उस समय उसकी फांसी की तारीख तय हो चुकी थी और मेरठ जेल में तैयारियां चल रही थीं। लेकिन फांसी से कुछ घंटे पहले उसके वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की गंभीरता को देखते हुए देर रात विशेष सुनवाई हुई और अदालत ने फांसी पर रोक लगा दी। उस समय कानूनी दलील यह थी कि मौत की सजा पाए व्यक्ति को अंतिम स्तर पर खुले अदालत में अपने मामले की सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए। इस हस्तक्षेप के बाद फांसी टल गई और कोली को कानूनी लड़ाई आगे जारी रखने का मौका मिला।
करीब 12 साल बाद फिर सामने आई वही फांसी वाली कहानी
2014 में जिस व्यक्ति की फांसी आखिरी वक्त पर टल गई थी, वही सुरेंद्र कोली 2026 में हरिद्वार में मृत मिला। फर्क यह था कि इस बार वह किसी मौत की सजा का सामना नहीं कर रहा था, बल्कि करीब 10 महीने पहले ही निठारी कांड के आखिरी मामले में भी बरी होकर जेल से बाहर आया था। इसी वजह से उसकी मौत कई सवाल छोड़ गई है। क्या यह आत्महत्या थी? क्या जेल से बाहर आने के बाद की सामाजिक और आर्थिक परेशानियां इसके पीछे थीं? या फिर परिवार की आशंका के मुताबिक मौत की परिस्थितियों की किसी दूसरे एंगल से भी जांच जरूरी है? फिलहाल इन सवालों का अंतिम जवाब पोस्टमार्टम, फॉरेंसिक जांच और पुलिस की आगे की जांच से ही सामने आएगा। अभी तक सरकार या पुलिस की ओर से किसी जानकारी को छिपाए जाने का कोई विश्वसनीय सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आया है।




