IIT Bombay Sahil Wakode Case: IIT बॉम्बे के बीटेक छात्र साहिल रविंद्र वाकोडे की मौत के मामले में जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे कई सवाल सामने आ रहे हैं। साहिल के परिवार ने आरोप लगाया है कि वह लंबे समय से जातिगत भेदभाव और मानसिक दबाव का सामना कर रहा था। परिवार की शिकायत के आधार पर प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और SC/ST (Prevention of Atrocities) Act की धाराओं में FIR दर्ज की गई है। मामले की जांच अब मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच कर रही है। दूसरी तरफ, IIT बॉम्बे ने जातिगत भेदभाव के आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि साहिल की ओर से SC/ST सेल या संस्थान के प्रशासन के पास ऐसी कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी। इसी बीच परीक्षा कक्ष का CCTV फुटेज और प्रोफेसर डूला का 2024 का एक पुराना ईमेल सामने आया है, जिसमें उन्होंने छात्रों को जाति और सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव से बचने की सलाह दी थी। इन दोनों पहलुओं के सामने आने के बाद पूरे मामले की जांच का दायरा और महत्वपूर्ण हो गया है।
परीक्षा के दौरान क्या हुआ था?
18 सितंबर को साहिल वाकोडे परीक्षा दे रहे थे। रिपोर्टों के मुताबिक, परीक्षा के दौरान प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला ने उन्हें मोबाइल फोन या किसी डिवाइस की ओर देखते हुए देखा और उनसे पूछताछ की। CCTV फुटेज में दोपहर करीब 12:30 से 12:45 बजे के बीच साहिल और प्रोफेसर के बीच बातचीत तथा साहिल को बाकी छात्रों से अलग किए जाने का घटनाक्रम दिखाई देता है। इसके बाद साहिल परीक्षा कक्ष से बाहर निकलते दिखाई देते हैं। IIT बॉम्बे की शुरुआती जानकारी में कहा गया था कि साहिल ने परीक्षा का प्रश्नपत्र ChatGPT पर अपलोड कर उत्तर हासिल करने की कोशिश की थी। हालांकि, संस्थान ने बाद में इस घटना को लेकर जारी अपनी शुरुआती सार्वजनिक टिप्पणी पर माफी मांगते हुए कहा कि जांच जारी रहने के दौरान ऐसा बयान देना उचित नहीं था।
कुछ घंटे बाद साहिल की मौत, परिवार ने लगाए गंभीर आरोप
परीक्षा की घटना के कुछ घंटे बाद साहिल अपने हॉस्टल लौटे और शाम को उनकी मौत की जानकारी सामने आई। इसके बाद उनके परिवार ने प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला और IIT बॉम्बे के निदेशक शिरीष केदारे पर गंभीर आरोप लगाए। परिवार का दावा है कि साहिल ने उन्हें अपने साथ कथित जातिगत भेदभाव और अपमान के बारे में बताया था। उनके पिता रविंद्र वाकोडे ने कहा कि साहिल ने 13 सितंबर को भी उनसे जातिसूचक टिप्पणियों की बात की थी। हालांकि, ये आरोप परिवार के हैं और इनकी पुष्टि जांच के जरिए होनी बाकी है। परिवार की शिकायत के आधार पर पुलिस ने प्रोफेसर डूला के खिलाफ BNS की धारा 108 यानी आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित प्रावधान और SC/ST Act की धाराओं में मामला दर्ज किया। बाद में जांच मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई।
CCTV अब जांच का अहम हिस्सा क्यों?
साहिल की मौत से पहले परीक्षा कक्ष में जो कुछ हुआ, उसे समझने के लिए CCTV फुटेज महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सामने आए फुटेज में साहिल को अपनी जेब की ओर देखते और उसके बाद प्रोफेसर डूला को उनसे बातचीत करते देखा गया है। रिपोर्टों के मुताबिक, डूला ने उन्हें अन्य छात्रों से अलग किया और इसके बाद साहिल परीक्षा कक्ष से बाहर निकल गए। अब जांच का एक महत्वपूर्ण सवाल यही है कि उस समय वास्तव में क्या हुआ था। साहिल की जेब में क्या था? प्रोफेसर और छात्र के बीच क्या बातचीत हुई? क्या यह परीक्षा में कथित मोबाइल इस्तेमाल को लेकर सामान्य पूछताछ थी या बातचीत के दौरान कोई ऐसी घटना हुई जिसका संबंध परिवार द्वारा लगाए गए जातिगत भेदभाव के आरोपों से था? इन सवालों का जवाब CCTV, गवाहों, डिजिटल साक्ष्यों और अन्य जांच सामग्री से ही सामने आ सकता है।
जिस प्रोफेसर पर आरोप, उनका पुराना ईमेल क्यों चर्चा में है?
इस मामले में अब प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला का 2024 का एक पुराना ईमेल भी चर्चा में है। उस समय वह IIT बॉम्बे में डीन ऑफ स्टूडेंट अफेयर्स की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। सामने आए ईमेल में छात्रों को अपने साथियों से JEE रैंक, GATE स्कोर या ऐसी जानकारी पूछने से बचने की सलाह दी गई थी, जिससे किसी छात्र की जाति या आरक्षित श्रेणी का पता चल सकता है। IIT बॉम्बे की ओर से ऐसी एंटी-डिस्क्रिमिनेशन गाइडलाइंस 2023 में जारी की गई थीं और 2024 में दोबारा प्रसारित की गईं। इस ईमेल को लेकर एक बात स्पष्ट रखना जरूरी है। यह दस्तावेज अपने आप में यह साबित नहीं करता कि साहिल के मामले में जातिगत भेदभाव नहीं हुआ था और न ही यह साबित करता है कि परिवार के आरोप सही हैं। लेकिन यह जांच के लिए एक प्रासंगिक तथ्य जरूर है कि जिस अधिकारी पर आज जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया जा रहा है, उसी कार्यकाल में उन्होंने छात्रों को सामाजिक और जातिगत पहचान के आधार पर भेदभाव से बचने की सार्वजनिक सलाह दी थी।

यानी अब जांच के सामने दोनों पहलू मौजूद हैं। एक तरफ परिवार के आरोप और दूसरी तरफ प्रोफेसर का पुराना एंटी-डिस्क्रिमिनेशन रिकॉर्ड। दोनों को साक्ष्यों के साथ जांचना जरूरी होगा।
क्या परीक्षा में नियम लागू करना SC/ST Act का मामला बन सकता है?
नहीं। सिर्फ किसी व्यक्ति का SC या ST समुदाय से होना अपने आप SC/ST Act लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यह कानून खास तौर पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के खिलाफ उनकी जातिगत पहचान के कारण होने वाले अत्याचार, अपमान और भेदभाव से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है। उदाहरण के लिए, अगर कोई SC/ST छात्र परीक्षा में मोबाइल इस्तेमाल करने के आरोप में पकड़ा जाता है और शिक्षक परीक्षा के नियमों के तहत उसके खिलाफ कार्रवाई करता है, तो केवल छात्र की जाति के कारण उस कार्रवाई को SC/ST Act का अपराध नहीं माना जा सकता। लेकिन अगर जांच में सामने आता है कि छात्र को उसकी जाति की वजह से अलग तरीके से निशाना बनाया गया, उसे जातिसूचक शब्द कहे गए या उसकी जाति के कारण जानबूझकर अपमानित किया गया, तो मामला अलग हो सकता है। यानी कानून में सिर्फ यह नहीं देखा जाता कि शिकायतकर्ता की जाति क्या है, बल्कि यह भी देखा जाता है कि कथित घटना का संबंध उसकी जातिगत पहचान से था या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST Act को लेकर क्या कहा है?
सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि SC/ST Act की संबंधित धाराओं को लागू करने के लिए कथित अपराध और पीड़ित की जातिगत पहचान के बीच संबंध होना जरूरी है। 2024 के Shajan Skaria बनाम State of Kerala मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी SC/ST व्यक्ति का अपमान करना और उसे उसकी SC/ST पहचान के कारण अपमानित करना एक जैसी बात नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कथित अपमान का संबंध व्यक्ति की जाति से होना जरूरी है। जनवरी 2026 के Keshaw Mahto बनाम State of Bihar मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ शिकायतकर्ता के SC/ST समुदाय से होने के आधार पर SC/ST Act की धाराएं अपने आप लागू नहीं हो जातीं। कथित अपमान या धमकी का संबंध उसकी जातिगत पहचान से होना चाहिए। इसका सीधा मतलब है कि जांच में सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि साहिल SC समुदाय से थे। यह भी देखना होगा कि उनके साथ कथित व्यवहार उनकी जाति के कारण किया गया था या नहीं।
22 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने फिर क्या कहा?
साहिल वाकोडे मामले के बीच ही 22 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में SC/ST Act से जुड़े एक और महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई हुई। CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने 2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली PIL को खारिज कर दिया। याचिका में कानून के कथित दुरुपयोग और 2018 के संशोधनों पर सवाल उठाए गए थे। अदालत ने 2020 के Prathvi Raj Chauhan फैसले को दोबारा खोलने से इनकार किया और कहा कि कथित misuse के अलग-अलग मामलों को अदालतें देख सकती हैं, लेकिन ऐसे मामलों के आधार पर पूरे कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। यानी कानून का संरक्षण भी बना रहेगा और जहां पहली नजर में मामला नहीं बनता, वहां न्यायिक जांच का रास्ता भी खुला रहेगा।
अब साहिल केस में जांच की असली कसौटी क्या होगी?
साहिल वाकोडे मामले में अब जांच के सामने दो अलग-अलग दावे हैं। परिवार कह रहा है कि साहिल को लंबे समय से जातिगत भेदभाव और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा। दूसरी ओर IIT बॉम्बे ने कहा है कि साहिल ने संस्थान के SC/ST सेल या प्रशासन के सामने ऐसी शिकायत नहीं की थी। कुछ छात्रों और फैकल्टी सदस्यों ने भी सार्वजनिक रूप से कहा है कि परीक्षा के दौरान प्रोफेसर डूला अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे। इसलिए जांच का सवाल सिर्फ इतना नहीं होना चाहिए कि साहिल SC समुदाय से थे या नहीं। महत्वपूर्ण सवाल यह होंगे कि क्या पहले भी उनके साथ कथित जातिगत भेदभाव की घटनाएं हुई थीं, क्या इसकी कोई शिकायत, ईमेल, मैसेज या गवाह मौजूद हैं, क्या प्रोफेसर डूला ने उनके साथ दूसरे छात्रों से अलग व्यवहार किया और क्या परीक्षा वाले दिन की कार्रवाई सिर्फ कथित मोबाइल इस्तेमाल से जुड़ी थी या उसमें कोई जातिगत तत्व भी था।
डूला का पुराना ईमेल आरोपों को खत्म करता है या जांच को और जरूरी बनाता है?
प्रोफेसर डूला का 2024 का ईमेल इस मामले में एक महत्वपूर्ण संदर्भ जरूर देता है। उसमें उन्होंने छात्रों को जाति या आरक्षित श्रेणी की पहचान से जुड़ी जानकारी पूछने से बचने और भेदभावपूर्ण व्यवहार से दूर रहने की सलाह दी थी। लेकिन किसी पुराने प्रशासनिक ईमेल से यह अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बाद में कोई भेदभाव हुआ ही नहीं। उसी तरह परिवार के आरोप दर्ज हो जाने से यह भी साबित नहीं होता कि आरोप सही हैं। यही वजह है कि इस पूरे मामले में निष्कर्ष से पहले जांच सबसे महत्वपूर्ण है। CCTV फुटेज, परीक्षा से संबंधित रिकॉर्ड, मोबाइल और डिजिटल डेटा, छात्रों के बयान, साहिल और परिवार के बीच हुई बातचीत से जुड़े उपलब्ध साक्ष्य तथा कथित पूर्व घटनाओं की स्वतंत्र पुष्टि—इन सभी को एक साथ देखा जाना होगा।
मामला सिर्फ साहिल और प्रोफेसर डूला का नहीं, संस्थागत व्यवस्था का भी है
इस मामले ने एक बड़ा सवाल भी सामने रखा है। शिक्षण संस्थानों में परीक्षा की निष्पक्षता और छात्रों के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। परीक्षा में नियमों का पालन कराना संस्थान की जिम्मेदारी है। वहीं, अगर किसी छात्र के साथ उसकी जाति के कारण भेदभाव होता है तो उसकी शिकायत की जांच और सुरक्षा देना भी संस्थान की जिम्मेदारी है। इसलिए किसी एक घटना के आधार पर पहले से यह तय कर देना कि साहिल की मौत सिर्फ परीक्षा की कार्रवाई का परिणाम थी या सिर्फ जातिगत भेदभाव का परिणाम, जांच पूरी होने से पहले जल्दबाजी होगी। दोनों संभावनाओं से जुड़े साक्ष्यों की जांच जरूरी है। फिलहाल सबसे अहम बात यही है कि FIR किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोपों की शुरुआत होती है, दोष सिद्ध होने का अंतिम फैसला नहीं। साहिल के परिवार के आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और अगर जातिगत भेदभाव के ठोस प्रमाण मिलते हैं तो कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, अगर जांच में सामने आता है कि परीक्षा के दौरान प्रोफेसर की कार्रवाई केवल संस्थागत नियमों के तहत थी और जातिगत उद्देश्य का कोई प्रमाण नहीं मिलता, तो उस तथ्य को भी रिकॉर्ड पर स्पष्ट रूप से सामने रखा जाना चाहिए।
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