फिल्मी सितारों की लोकप्रियता सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रहती। उनके कपड़े, बोलने का अंदाज, खान-पान और यहां तक कि वे जिन उत्पादों का विज्ञापन करते हैं, उसका भी लोगों पर असर पड़ता है। यही वजह है कि जब किसी बड़े स्टार को पान मसाला, तंबाकू या शराब से जुड़े ब्रांड के विज्ञापन में देखा जाता है, तो उस पर बहस शुरू हो जाती है। अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की एक अपील के बाद यह बहस एक बार फिर तेज हो गई है। 22 सितंबर 2026 को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में राष्ट्रपति ने लोकप्रिय कलाकारों से ऐसे उत्पादों का प्रचार नहीं करने की अपील की, जो लोगों की सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि सितारों का युवाओं पर गहरा प्रभाव होता है और उन्हें अपने इस प्रभाव का इस्तेमाल जिम्मेदारी के साथ करना चाहिए।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने क्या कहा?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने फिल्म कलाकारों को संबोधित करते हुए कहा कि सफल कलाकार जब अनुशासित जीवनशैली की बात करते हैं तो लाखों बच्चे और युवा उन्हें फॉलो करते हैं। ऐसे में उन्होंने लोकप्रिय कलाकारों से स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक उत्पादों का endorsement नहीं करने की अपील की। उनका संदेश किसी एक अभिनेता या किसी एक ब्रांड का नाम लिए बिना था, लेकिन यह बयान ऐसे समय आया है जब पान मसाला और उससे जुड़े विज्ञापनों में बड़े फिल्मी सितारों की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि एक सच्चा स्टार वह है जो रोशनी फैलाए, अंधेरा नहीं। इस बयान के बाद सोशल मीडिया और मीडिया में सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट को लेकर चर्चा फिर तेज हो गई।
सरोगेट एडवर्टाइजमेंट क्या होता है?
अब सवाल है कि आखिर सरोगेट एडवर्टाइजमेंट यानी छद्म विज्ञापन क्या होता है? आसान भाषा में समझें तो ऐसे विज्ञापन में किसी ऐसे प्रोडक्ट या कैटेगरी के नाम का इस्तेमाल किया जाता है, जिसके विज्ञापन पर सीधे तौर पर प्रतिबंध या कड़े नियम लागू होते हैं। उदाहरण के तौर पर पान मसाला या तंबाकू से जुड़े ब्रांड किसी दूसरे उत्पाद, जैसे इलायची या माउथ फ्रेशनर, के नाम से विज्ञापन करते हैं। शराब के मामले में भी पानी, सोडा, म्यूजिक या दूसरे उत्पादों के नाम से ब्रांड प्रमोशन देखने को मिलता है। विवाद तब पैदा होता है जब विज्ञापन में दिखाया जाने वाला दूसरा उत्पाद सिर्फ नाम के स्तर पर मौजूद हो, जबकि विज्ञापन की पूरी ब्रांडिंग और पहचान दर्शक को उसी पान मसाला या शराब वाले ब्रांड की याद दिलाती रहे।
विमल इलायची के विज्ञापन पर शाहरुख, अजय और टाइगर को नोटिस क्यों मिला?
इसी बहस के बीच महाराष्ट्र FDA ने अभिनेता शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को Vimal Elaichi के विज्ञापन को लेकर शो-कॉज नोटिस जारी किए। FDA का आरोप था कि यह विज्ञापन Vimal Pan Masala के लिए surrogate promotion का हिस्सा हो सकता है। यानी विज्ञापन में इलायची का नाम और प्रोडक्ट दिखाई देता है, लेकिन रेगुलेटर का सवाल यह है कि क्या इसके जरिए उसी ब्रांड से जुड़े पान मसाला उत्पाद की पहचान और ब्रांड वैल्यू को बढ़ावा दिया जा रहा है। अभिनेताओं को नोटिस देकर इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा गया। यह ध्यान रखना जरूरी है कि नोटिस जारी होना अपने आप में किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप साबित होना नहीं है; मामले में संबंधित पक्षों का जवाब और आगे की कानूनी प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होती है।
अमिताभ बच्चन और कमला पसंद का विवाद क्या था?
सरोगेट विज्ञापन को लेकर इससे पहले भी बड़े फिल्मी सितारों के नाम सामने आते रहे हैं। अमिताभ बच्चन और रणवीर सिंह कमला पसंद के सिल्वर-कोटेड इलायची वाले विज्ञापन में नजर आए थे। इस विज्ञापन को लेकर विवाद हुआ और अमिताभ बच्चन ने बाद में खुद को इस कैंपेन से अलग कर लिया था। इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया कि जब कोई सेलिब्रिटी किसी ऐसे ब्रांड का विज्ञापन करता है, जिसकी पहचान किसी तंबाकू या पान मसाला उत्पाद से भी जुड़ी हो, तो क्या सिर्फ विज्ञापन में दिखाए जा रहे दूसरे उत्पाद को अलग मानना पर्याप्त है? यही सवाल सरोगेट एडवर्टाइजमेंट की बहस के केंद्र में है।
सलमान खान के राजश्री मसाला विज्ञापन का मामला क्या है?
राजश्री मसाला से जुड़े एक विज्ञापन को लेकर अभिनेता सलमान खान के खिलाफ भी उपभोक्ता फोरम में कार्यवाही शुरू हुई थी। शिकायत में विज्ञापन को कथित तौर पर भ्रामक और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक बताया गया था। सलमान खान की ओर से यह दलील दी गई कि उन्होंने सिल्वर-कोटेड इलायची का विज्ञापन किया था, न कि पान मसाला का। अप्रैल 2026 में राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले से जुड़ी उपभोक्ता कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। यानी इस मामले में भी अंतिम निष्कर्ष के बजाय यह समझना जरूरी है कि कानूनी प्रक्रिया अभी अलग-अलग स्तरों पर चली है और आरोप तथा अदालत का अंतिम फैसला एक ही चीज नहीं होते।
आखिर कंपनियां ऐसा विज्ञापन क्यों करती हैं?
इसका सबसे बड़ा कारण ब्रांड की पहचान को लोगों के बीच बनाए रखना माना जाता है। किसी ऐसे उत्पाद का सीधा विज्ञापन करना मुश्किल हो सकता है, जिस पर कानून या विज्ञापन नियमों के तहत पाबंदियां हों। ऐसे में उसी ब्रांड नाम, लोगो, रंग, पैकेजिंग या सेलिब्रिटी चेहरे के जरिए दूसरे उत्पाद का विज्ञापन किया जाए तो उपभोक्ता के दिमाग में ब्रांड की पहचान बनी रह सकती है। यही वजह है कि सरोगेट एडवर्टाइजमेंट पर सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के नजरिए से भी बहस होती है। भारत सरकार के Economic Advisory Council से जुड़े 2026 के एक working paper में भी तंबाकू कंपनियों द्वारा surrogate advertising और ऐसे तरीकों से ब्रांड प्रमोशन को लेकर चिंता जताई गई है।
राष्ट्रपति की अपील के बाद सबसे बड़ा सवाल क्या है?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की अपील के बाद बहस सिर्फ इस बात पर नहीं है कि कोई विज्ञापन तकनीकी रूप से किस उत्पाद का है। बड़ा सवाल यह है कि क्या लोकप्रिय कलाकारों को यह देखना चाहिए कि उनके चेहरे और लोकप्रियता का इस्तेमाल किस तरह के उत्पादों की ब्रांड पहचान मजबूत करने के लिए किया जा रहा है। दूसरी तरफ, विज्ञापन में शामिल कलाकारों और कंपनियों की ओर से यह तर्क दिया जा सकता है कि उन्होंने वही उत्पाद endorse किया है, जो विज्ञापन में दिखाया गया था। इसलिए किसी विज्ञापन को surrogate मानना या नहीं मानना कई मामलों में उसके कंटेंट, ब्रांडिंग, संबंधित उत्पादों और लागू कानूनों की जांच का विषय बन जाता है। राष्ट्रपति की अपील ने इसी बहस को फिर सामने ला दिया है। मामला सिर्फ एक विज्ञापन या एक अभिनेता तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि करोड़ों युवाओं पर प्रभाव रखने वाले सेलिब्रिटी जब किसी उत्पाद का प्रचार करते हैं, तो उनकी जिम्मेदारी की सीमा क्या होनी चाहिए और विज्ञापन कंपनियां कानून की सीमाओं के भीतर रहकर ब्रांडिंग कैसे कर सकती हैं। इन सवालों का जवाब आने वाले समय में कानूनी प्रक्रियाओं, नियामकीय कार्रवाई और विज्ञापन उद्योग के रवैये से भी तय होगा।
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