द फ्रंट डेस्क: पाकिस्तान में पेट्रोल संकट अब सिर्फ बढ़ती कीमतों तक सीमित नहीं है। पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक ने चेतावनी दी है कि ईंधन की कमी होने पर पेट्रोल 1,000 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकता है। फिलहाल 19 सितंबर से पेट्रोल 389.14 रुपये और हाई-स्पीड डीजल 424.04 रुपये प्रति लीटर है। महंगे ईंधन से राहत के लिए सरकार ने मोटरसाइकिल, रिक्शा और 800 सीसी तक की कारों को 100 रुपये प्रति लीटर की राहत देने के लिए 75 अरब रुपये मंजूर किए हैं। साथ ही सरकारी वाहनों के ईंधन में कटौती और नई सरकारी गाड़ियों की खरीद पर रोक जैसे कदम उठाए गए हैं। मध्य पूर्व के तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य व लाल सागर में ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने पाकिस्तान की मुश्किल और बढ़ा दी है।
लेकिन बड़ा सवाल सिर्फ पेट्रोल का नहीं है। सवाल यह है कि 1947 में एक साथ आजाद हुए भारत और पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति में आज इतना बड़ा अंतर कैसे पैदा हो गया? विश्व बैंक के 2025 के आंकड़ों के मुताबिक भारत की जीडीपी करीब 3.96 ट्रिलियन डॉलर, जबकि पाकिस्तान की जीडीपी करीब 407 अरब डॉलर थी। भारत की आर्थिक वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रही, जबकि पाकिस्तान की 3.7 प्रतिशत। प्रति व्यक्ति जीडीपी में भी भारत करीब 2,702 डॉलर और पाकिस्तान करीब 1,596 डॉलर पर था। आखिर दोनों देशों के बीच यह आर्थिक अंतर कैसे बढ़ता गया? आइए, इसे विस्तार से समझते हैं।
1947 में दोनों देश लगभग एक ही जगह से शुरू हुए, फिर रास्ते अलग कैसे हुए?
भारत और पाकिस्तान दोनों ने 1947 में आजादी के बाद गरीबी, कमजोर उद्योग, सीमित पूंजी, कम बुनियादी ढांचे और बड़ी आबादी जैसी चुनौतियों के साथ अपनी आर्थिक यात्रा शुरू की थी। लेकिन आने वाले दशकों में दोनों देशों ने आर्थिक विकास के लिए अलग-अलग रास्ते अपनाए। भारत ने लंबे समय तक नियोजित अर्थव्यवस्था और सरकारी क्षेत्र पर जोर दिया, लेकिन 1991 के आर्थिक संकट के बाद बड़े आर्थिक सुधार किए गए। धीरे-धीरे निजी क्षेत्र, विदेशी निवेश, व्यापार और सेवा क्षेत्र की भूमिका बढ़ती गई। पाकिस्तान में भी कई दौर में आर्थिक सुधार हुए और कुछ समय तक तेज आर्थिक विकास भी देखने को मिला। लेकिन वहां आर्थिक वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय तक बाहरी वित्तपोषण और आयात पर निर्भर रहा। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की रिपोर्टों में पाकिस्तान के सामने बार-बार आने वाली चुनौतियों में बड़ी वित्तीय जरूरतें, कम विदेशी मुद्रा भंडार, राजकोषीय दबाव और संरचनात्मक सुधारों की धीमी प्रगति शामिल रही है। यानी दोनों देशों की कहानी में फर्क किसी एक साल या एक सरकार से नहीं बना। यह कई दशकों की आर्थिक नीतियों और संस्थागत फैसलों का परिणाम है।
भारत ने आईटी और सेवा क्षेत्र को ताकत बनाया, पाकिस्तान क्यों पीछे रहा?
भारत की आर्थिक कहानी में सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब देश ने सूचना प्रौद्योगिकी और सेवा क्षेत्र को अपनी ताकत बनाना शुरू किया। भारतीय कंपनियों ने अमेरिका और यूरोप के बाजारों में सॉफ्टवेयर, सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं और कारोबारी सेवाओं के जरिए बड़ी जगह बनाई। इससे भारत को विदेशी मुद्रा कमाने का एक नया और बड़ा स्रोत मिला। विश्व बैंक के मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 में भारत के निर्यात में 6.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई और इसमें सॉफ्टवेयर तथा कारोबारी सेवाओं के निर्यात का महत्वपूर्ण योगदान रहा। विश्व बैंक भारत की भविष्य की आर्थिक वृद्धि के लिए सेवा क्षेत्र और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में ज्यादा भागीदारी को भी महत्वपूर्ण मानता है। पाकिस्तान के लिए कपड़ा उद्योग लंबे समय से प्रमुख निर्यात क्षेत्र रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 में पाकिस्तान का कपड़ा निर्यात करीब 17.3 अरब डॉलर रहा। लेकिन समस्या यह है कि पाकिस्तान के निर्यात का आधार अपेक्षाकृत सीमित है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पाकिस्तान के निर्यात क्षेत्र को सकल घरेलू उत्पाद का करीब 10 प्रतिशत बताया है और उत्पादकता तथा प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया है। यानी भारत ने धीरे-धीरे आईटी, सेवा क्षेत्र, दवा उद्योग, इंजीनियरिंग, ऑटोमोबाइल और दूसरे क्षेत्रों में अपनी निर्यात क्षमता बढ़ाई, जबकि पाकिस्तान का निर्यात आधार अपेक्षाकृत कम विविध बना रहा।
पाकिस्तान बार-बार कर्ज और आईएमएफ के पास क्यों पहुंचता है?
यह पाकिस्तान की आर्थिक कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी भी देश के लिए कर्ज लेना असामान्य नहीं है। भारत समेत दुनिया के लगभग सभी बड़े देश कर्ज लेते हैं। असली सवाल यह है कि कर्ज क्यों लिया जा रहा है और उससे अर्थव्यवस्था की कमाई कितनी बढ़ रही है। पाकिस्तान को अपनी जरूरत के लिए तेल, मशीनरी और दूसरी चीजें विदेशों से खरीदनी पड़ती हैं। इसके लिए डॉलर जैसी विदेशी मुद्रा चाहिए। अगर निर्यात से पर्याप्त विदेशी मुद्रा नहीं आती और आयात का बिल बढ़ जाता है, तो देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है। इसके बाद बाहरी वित्तीय मदद की जरूरत बढ़ सकती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार पाकिस्तान की कर्ज चुकाने की क्षमता और आर्थिक स्थिरता अभी भी नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन और समय पर मिलने वाली बाहरी वित्तीय मदद पर काफी निर्भर है। संस्था ने पाकिस्तान में बड़ी वित्तीय जरूरतों और अपेक्षाकृत कम विदेशी मुद्रा भंडार को भी जोखिम के रूप में रेखांकित किया है। यही कारण है कि पाकिस्तान कई बार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के कार्यक्रमों का सहारा ले चुका है। मौजूदा कार्यक्रम में भी पाकिस्तान से राजकोषीय स्थिति मजबूत करने, ऊर्जा क्षेत्र में सुधार, राजस्व संग्रह बढ़ाने और निजी क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा बढ़ाने जैसे कदम उठाने पर जोर दिया जा रहा है।
भारत का बड़ा घरेलू बाजार और डिजिटल अर्थव्यवस्था कैसे बनी ताकत?
भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजारों में से एक है। करोड़ों उपभोक्ताओं की वजह से कंपनियों को देश के भीतर ही बहुत बड़ा बाजार मिलता है। लेकिन केवल आबादी बड़ी होना पर्याप्त नहीं है। भारत ने इस बाजार को बैंकिंग, दूरसंचार, ऑनलाइन कारोबार, डिजिटल भुगतान और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के विस्तार के साथ जोड़ने की कोशिश की। इसके साथ भारत में बुनियादी ढांचे पर भी निवेश बढ़ा है। सड़क, रेलवे, हवाई अड्डे, डिजिटल नेटवर्क और माल ढुलाई व्यवस्था में सुधार से देश के अलग-अलग हिस्सों को बाजार से जोड़ने में मदद मिली है। विश्व बैंक के मुताबिक वर्ष 2000 के बाद भारत की अर्थव्यवस्था वास्तविक रूप से लगभग चार गुना हुई है और प्रति व्यक्ति आय लगभग तीन गुना हुई है। विश्व बैंक यह भी कहता है कि भारत को 2047 तक उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था बनने के लिए लंबे समय तक करीब 7.8 प्रतिशत की औसत वार्षिक वृद्धि बनाए रखने की जरूरत होगी। यानी भारत की आर्थिक कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। भारत आगे बढ़ा है, लेकिन उसे भी लगातार सुधार और निवेश की जरूरत है।
तेल महंगा होने पर पाकिस्तान ज्यादा क्यों फंसता है और भारत की स्थिति क्या है?
यहीं से मौजूदा पेट्रोल संकट सीधे इस पूरी कहानी से जुड़ता है। पाकिस्तान और भारत दोनों ही तेल का आयात करते हैं। इसलिए मध्य पूर्व में युद्ध या अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी का असर दोनों देशों पर पड़ सकता है। लेकिन किसी देश की आर्थिक ताकत सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि वह तेल कितना आयात करता है। यह भी मायने रखता है कि उसके पास विदेशी मुद्रा भंडार कितना है, निर्यात कितना विविध है, वित्तीय व्यवस्था कितनी मजबूत है और सरकार के पास संकट से निपटने की कितनी क्षमता है। विश्व बैंक ने अप्रैल 2026 में कहा था कि मध्य पूर्व के संघर्ष से ऊर्जा की ऊंची कीमतें और आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट भारत की आर्थिक वृद्धि पर दबाव डाल सकती हैं। हालांकि, भारत के बड़े विदेशी मुद्रा भंडार, मजबूत वित्तीय क्षेत्र और व्यापार के विविध आधार जैसे कारक बाहरी झटकों से कुछ सुरक्षा देते हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तान के लिए ऊर्जा क्षेत्र खुद एक बड़ी संरचनात्मक चुनौती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पाकिस्तान में ऊर्जा क्षेत्र की वित्तीय स्थिति, बिजली क्षेत्र की स्थिरता और बिजली क्षेत्र के बकाया कर्ज जैसी समस्याओं में सुधार पर जोर दिया है। इसलिए अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो पाकिस्तान के लिए यह सिर्फ पेट्रोल महंगा होने की समस्या नहीं रहती। इससे आयात बिल, महंगाई, विदेशी मुद्रा भंडार और सरकारी वित्त पर एक साथ दबाव आ सकता है।
तो आखिर भारत आगे और पाकिस्तान पीछे क्यों रह गया?
इसका जवाब किसी एक सरकार या नेता में नहीं है। भारत और पाकिस्तान की आज की आर्थिक स्थिति करीब आठ दशकों में बने अलग-अलग आर्थिक ढांचों का नतीजा है। भारत ने कृषि के साथ विनिर्माण, सेवा और सूचना प्रौद्योगिकी को मजबूत किया। बड़ा घरेलू बाजार, बुनियादी ढांचा, डिजिटल अर्थव्यवस्था और वित्तीय क्षेत्र भी उसकी ताकत बने। पाकिस्तान में भी कृषि, कपड़ा, सूचना प्रौद्योगिकी और विदेशों से आने वाला पैसा महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सीमित निर्यात, ऊर्जा संकट, सरकारी वित्त पर दबाव और विदेशी वित्तपोषण की जरूरत जैसी समस्याएं लंबे समय से चुनौती बनी हुई हैं। इसलिए तेल की कीमत बढ़ने पर पाकिस्तान पर उसका असर ज्यादा दिखाई देता है।




