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Punjab Chunav: सबसे कम उम्र के सीएम बनने से लेकर सबसे उम्र दराज़ सीएम बनने का रिकॉर्ड है जिनके नाम, इस बार चुनाव में क्या ढीली पड़ रही उनकी कमान? जानिये प्रकाश सिंह बादल की मुश्किलें

Punjab Chunav: सबसे कम उम्र के सीएम बनने से लेकर सबसे उम्र दराज़ सीएम बनने का रिकॉर्ड है जिनके नाम, इस बार चुनाव में क्या ढीली पड़ रही उनकी कमान? जानिये प्रकाश सिंह बादल की मुश्किलें

बठिंडा। पंजाब की राजनीति में अजेय योद्धा कहे जाने वाले शिरोमणि अकाली दल (Shiromani Akali Dal) के संरक्षक प्रकाश सिंह बादल (Prakash Singh Badal) इस बार भी अपनी परंपरागत विधानसभा सीट लंबी से चुनाव लड़ रहे हैं।  ये सीट मुक्तसर जिले में आती है। यहां सीनियर बादल के नाम से चर्चित प्रकाश सिंह बादल बेशक कभी इस सीट से नहीं हारे, लेकिन इस बार उन्हें युवाओं की खुली मुखालफत का सामना करना पड़ रहा है। बादल का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है। तो क्या इस बार यह मान लिया जाए कि बादल का सियासी दुर्ग कमजोर हो गया है? इसका जवाब काफी हद तक ‘हां’ में दिया जा सकता है। इस बार बादल को लंबी से चुनौती देने वाला कोई असाधारण सियासी किरदार नहीं है, बल्कि आम आदमी है। युवा पीढ़ी बदलाव की बात कर रही है। उसका कहना है कि लगातार एक ही प्रत्याशी को जिताना ठीक नहीं है। बेहतरी के लिए बदलाव होना चाहिए। आखिर लोकतंत्र भी तो कोई चीज है।

बादल 2022 चुनाव के सबसे उम्रदराज़ प्रत्याशी हैं। वे 94 साल की उम्र में चुनाव लड़ रहे हैं. बादल 53 साल से कोई चुनाव नहीं हारे हैं। साल 1969 से वे चुनाव जीतते आ रहे हैं। साल 1947 में उन्होंने सियासत में एंट्री की थी। 1970 में जब बादल पहली बार सीएम् बने तब उनके नाम सबसे कम उम्र के सीएम बनने का रिकॉर्ड दर्ज हुआ। साल 2012 में जब वो पांचवी बार सीएम बने तब सबसे उम्रदराज सीएम थे।

आम आदमी पार्टी ने लंबी सीट से इस बार गुरमीत सिंह खुडियां को टिकट दिया है। इलाके में उनकी हवा दिखती है। कांग्रेस ने इस सीट से युवा चेहरे जगपाल सिंह अबुल खुराना को मौका दिया है। जबकि पहली बार भाजपा भी इस ग्रामीण सीट से अपनी किस्मत आजमा रही है। भाजपा ने यहां से राकेश ढींगरा को टिकट दिया है। सभी दलों के प्रत्याशियों ने इस बार एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है।

बादल गांव विकास का मॉडल
राजनीति करने वाले अगर विकास का विजन देखना चाहते हैं तो एक बार लंबी विधानसभा क्षेत्र में आ जाएं। यहां बादल के गांव में आ जाएं। इस इलाके में खजूर के पेड़ नहीं उगते, मगर बादल गांव की हर सड़क के दोनों तरफ कतारों में खजूर के पेड़ खड़े हैं। यह पेड़ यहां उगे नहीं, उगाए गए हैं। क्योंकि यह क्षेत्र देश के सबसे उम्रदराज राजनेता प्रकाश सिंह बादल का इलाका है। बादल उनका अपना गांव है, जहां वाटर वर्कर्स से लेकर सीवरेज और स्टेडियम से लेकर बड़ा अस्पताल तक सब मौजूद है। सड़कें भी चकाचक। भविष्य में सीवरेज-पेयजल लाइनें बिछाने को सड़कें ना तोड़नी पड़े, इसलिए पूरी प्लानिंग से उनके बीच में इंटरलॉकिंग टाइल्स तक लगाई गई हैं ताकि उन्हें हटाकर पाइप बिछाए जा सकें।

इतने विकास के बावजूद भी विरोध क्यों? 
कायदा तो यह है कि यहां उनका एक भी विरोधी नहीं होना चाहिए। मगर सियासत में विकास के अलावा भी बहुत सारे समीकरण काम करते हैं। इसलिए चुनाव में उतरे प्रकाश सिंह बादल को अपनी सीट पर जीत का सिलसिला बरकरार रखने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। बादल पिछले कई दिनों से बीमार हैं। उन्हें महीनेभर पहले कोरोना भी हो गया था। ऐसे में उनके प्रचार की कमान उनकी पुत्रवधु और पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल वर्कर्स के साथ मिलकर संभाले हुए हैं। प्रकाश सिंह बादल का पोता और सुखबीर बादल का बेटा अनंतवीर सिंह बादल भी अपने दादाजी को जीत दिलाने के लिए पहली बार फील्ड में एक्टिव है। हालांकि अनंतवीर सिंह बादल फील्ड में भाषण नहीं देते और लोगों से हाथ जोड़कर अभिवादन करते हुए अपने दादाजी के लिए वोट मांग रहे हैं।

पहला चुनाव 57 वोट से हारने वाले बादल फिर कभी नहीं हारे
लंबी विधानसभा सीट पर प्रकाश सिंह बादल के आने का भी अपना एक इतिहास है। प्रकाश सिंह बादल ने अपना पहला चुनाव अकाली दल के ही टिकट पर साल 1967 में गिदड़बाहा विधानसभा सीट से लड़ा। वह चुनाव बहुत रोचक रहा। तब बादल के सामने कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व सीएम रहे हरचरण सिंह बराड़ थे। उस मुकाबले में बादल बराड़ से सिर्फ 57 वोट से हार गए। बादल की अपने सियासी जीवन की यह पहली और अभी तक की आखिरी हार रही। उसके बाद वह 1969 से 1992 तक गिदड़बाहा से विधायक रहे। साल 1992 में अकाली दल ने पंजाब विधानसभा चुनाव का बहिष्कार कर दिया। तब यहां से कांग्रेस के रघुबीर सिंह जीते। हालांकि बाद में कोर्ट ने उस चुनाव को रद्द कर दिया। 1995 में गिदड़बाहा सीट पर उपचुनाव हुआ, जिसमें बादल ने अपने भतीजे मनप्रीत बादल को मैदान में उतारा। जबकि कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह ने रघुबीर सिंह के बेटे दीपक को टिकट दिया। इस चुनाव में मनप्रीत बादल विजयी रहे।

गिदड़बाहा मनप्रीत को देकर लंबी आए बादल 
1997 में प्रकाश सिंह बादल गिदड़बाहा सीट अपने भतीजे मनप्रीत को देकर खुद लंबी विधानसभा सीट पर चले आए। उसके बाद पिछले 25 बरसों से लंबी सीट पर उनका एकछत्र राज है। यहां से बादल को हराना तो दूर, विरोधी दलों के प्रत्याशी उनके नजदीक भी नहीं पहुंच पाते। वह यहां से 20 से 25 हजार वोटों से जीतते रहे हैं। 2017 के चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह खुद यहां बादल के सामने उतरे, मगर जीत नहीं पाए। तब बादल को 66,375 और कैप्टन को 43,605 वोट मिले।

प्रकाश सिंह बादल के सामने ये चुनौतियां

  • 94 साल की उम्र होने से इलाके में ज्यादा एक्टिव नहीं हैं।
  • कुछ समय से सेहत भी ठीक नहीं चल रही है।
  • बादल के करीबी वर्कर्स से स्थानीय लोग खफा।
  • आम लोग मुलाकात नहीं कर पाते, इसलिए नाराजगी।
  • लोगों में बदलाव करने की सामान्य धारणा बढ़ गई।

इस वजह से दौड़ में सबसे आगे

  • लंबी इलाके के घर-घर तक पहुंच है।
  • सभी गांवों के लोगों को बादल पसर्नली जानते हैं।
  • इलाके में घर-घर तक कंक्रीट की सड़कें बनी हैं।
  • एरिया में इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थिति अच्छी है।
  • विकास नजर आता है। इलाका कभी सेमग्रस्त था।
  • खेती खराब हो रही थी। अब खेत लहलहाते हैं।
  • करोड़ों रुपए खर्च कर सेम का खात्मा किया।
  • छवि अच्छी है। हर किसी के सुख-दुख में पहुंचते हैं।

AAP के खुडियां की राह में ये मुश्किलें

  • कांग्रेस छोड़कर आए। कांग्रेस के पुराने साथी साथ हैं।
  • AAP के लोकल नेता साइडलाइन होने से नाराज।
  • बादल जैसे अनुभवी राजनेता के सामने पहला चुनाव।
  • इलाका पहले से डेवलप, इसलिए मुद्दों का अभाव।
  • बादल के लोगों से व्यक्तिगत संबंध, इसीलिए जगह बना पाना चुनौती।

AAP की हवा का फायदा

  • पिता फरीदकोट से अकाली दल (मान) के सांसद रहे।
  • खुद की भी बतौर राजनेता ईमानदार नेता की छवि।
  • सामान्य घरेलू चेहरा। कांग्रेस में भी एक्टिव रहे।
  • लोगों तक सीधी पहुंच और जुड़ाव।
  • इलाके में हर समय उपलब्ध रहने वाले।
  • AAP के पक्ष में चल रही हवा का भी फायदा।
  • बादल विरोधी चचेरे भाई महेश इंदर का समर्थन।

कांग्रेस के अबुल खुराना के सामने चैलेंज

  • बादल जैसे अनुभवी नेता के सामने नया चेहरा।
  • चचेरे भाई महेश इंदर साइलेंट हैं।
  • बागी कांग्रेस नेता खुड़ियां सामने चुनाव लड़ रहे।
  • खुडियां AAP से लड़ रहे हैं। ज्यादातर टीम उनके साथ है।
  • कांग्रेस में गुटबाजी हावी। अलग-अलग गुटों बंटे नेता।
  • इलाके के ज्यादातर लोगों से सीधा संपर्क नहीं।

इनका सहारा ही जगा रहा उम्मीद

  • इलाके में कांग्रेस का अच्छा वोट बैंक है।
  • 2017 में कांग्रेस के कैप्टन को 43,605 वोट मिले।
  •  खुराना का परिवार टकसाली कांग्रेसी।
  • पिता गुरनाम सिंह प्रदेश में मंत्री रह चुके हैं।
  • परिवार की कैप्टन से नजदीकियां।
  • साढ़े 4 साल में इलाके के लोगों के काम करवाए।

BJP के ढींगरा की दिक्कतें

  • ग्रामीण इलाके में पार्टी का जनाधार नहीं।
  • पहले ही चुनाव में बादल जैसे अनुभवी नेता से सामना।
  • खुद की इलाके में पहचान नहीं। वोटरों से खास संपर्क नहीं।
  • BJP पहली बार यहां से चुनाव लड़ रही।

इन वजहों से मौका

  • भाजपा के जिलाध्यक्ष रहे हैं।
  • पहली बार चुनाव में बड़ी लाइन खींच सकते हैं।
  • कृषि कानून वापसी के बाद माहौल बना है।
  • पीएम मोदी की अच्छी छवि के सहारे वोट प्रतिशत बढ़ा सकता है।

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