Minor Molestation Cases: बिहार के जमुई में नाबालिग छात्रा के साथ कथित छेड़छाड़ और झारखंड के कोडरमा में तीन नाबालिगों को खंभे से बांधकर गांव में घुमाने की घटना ने समाज और कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दोनों घटनाओं में नाबालिगों की सुरक्षा, उनकी गरिमा और कानून को अपने हाथ में लेने की प्रवृत्ति पर सवाल उठ रहे हैं। जमुई और कोडरमा की इन घटनाओं ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। एक तरफ जमुई में सड़क पर नाबालिग छात्र-छात्रा के साथ कथित तौर पर अभद्रता और छेड़छाड़ का मामला सामने आया, तो दूसरी ओर कोडरमा में ग्रामीणों पर तीन नाबालिगों को पकड़कर सार्वजनिक रूप से घुमाने और बिजली के खंभे से बांधने का आरोप है। दोनों मामलों ने यह सवाल खड़ा किया है कि आखिर किसी अपराध या किसी की निजी जिंदगी को लेकर फैसला करने और सजा देने का अधिकार भीड़ को किसने दिया?
जमुई में नाबालिग छात्र-छात्रा को सड़क पर रोककर की गई बदसलूकी
पहला मामला बिहार के जमुई जिले का है। टाउन थाना क्षेत्र में 19 सितंबर की शाम कोचिंग से लौट रहे एक नाबालिग छात्र और छात्रा को कुछ युवकों ने कथित तौर पर रास्ते में रोककर अभद्र व्यवहार और छेड़छाड़ की। घटना का वीडियो 21 सितंबर को सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद मामला चर्चा में आया। पुलिस ने BNS की संबंधित धाराओं और पॉक्सो एक्ट के तहत FIR दर्ज कर जांच शुरू की है। अब तक तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि अन्य संदिग्धों की तलाश जारी है। जमुई एसपी के निर्देश पर SDPO के नेतृत्व में SIT भी गठित की गई है। पुलिस वायरल वीडियो और अन्य साक्ष्यों के आधार पर जांच कर रही है। नाबालिगों से जुड़ा मामला होने के कारण उनकी पहचान और निजता की सुरक्षा का भी ध्यान रखा जा रहा है।
बिहार राज्य महिला आयोग ने भी घटना को गंभीरता से लेते हुए प्रशासन से रिपोर्ट मांगी है। वहीं, कई राजनीतिक नेताओं ने घटना पर चिंता जताते हुए आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। हालांकि, मामले में दोष तय करने का अंतिम अधिकार न्यायिक प्रक्रिया का ही है।
कोडरमा में तीन नाबालिगों को खंभे से बांधकर गांव में घुमाने का आरोप
दूसरी ओर, झारखंड के कोडरमा जिले के लोचनपुर गांव से भी भीड़ द्वारा कानून हाथ में लेने का मामला सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, रविवार देर रात एक नाबालिग लड़की से मिलने उसके दो नाबालिग दोस्त उसके घर पहुंचे थे। सोमवार सुबह जब ग्रामीणों को इसकी जानकारी मिली तो कुछ लोगों ने तीनों नाबालिगों को पकड़ लिया। आरोप है कि ग्रामीणों ने उन्हें गांव में घुमाया और इसके बाद बिजली के खंभे से रस्सी से बांध दिया। बताया गया कि इस दौरान तीनों से माफी भी मंगवाई गई। सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची और तीनों नाबालिगों को ग्रामीणों के कब्जे से मुक्त कराया। पुलिस अब पूरे मामले की जांच कर रही है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि घटना में कौन-कौन लोग शामिल थे। यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि ग्रामीणों को किसी गतिविधि पर आपत्ति थी या उन्हें किसी संभावित अपराध की जानकारी मिली थी, तो पुलिस को सूचना देने के बजाय नाबालिगों को सार्वजनिक रूप से दंडित करने का रास्ता क्यों अपनाया गया?
कानून और समाज के सामने खड़े हुए 5 गंभीर सवाल
1- क्या किसी नागरिक या भीड़ को खुद कानून हाथ में लेकर सजा देने का अधिकार है?
किसी व्यक्ति पर आरोप लगना और अदालत में उसका दोष साबित होना दो अलग-अलग बातें हैं। भारत में किसी भी अपराध की जांच पुलिस करती है और दोष साबित होने के बाद सजा देने का अधिकार अदालत को होता है। किसी व्यक्ति को बंधक बनाना, उसके साथ मारपीट करना, सार्वजनिक रूप से घुमाना या बिजली के खंभे से बांधकर माफी मंगवाना कानूनी प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता। यदि किसी को किसी अपराध की जानकारी मिलती है तो उसे पुलिस और संबंधित प्रशासन को सूचना देनी चाहिए, न कि खुद फैसला सुनाकर सजा देनी चाहिए।
2- नाबालिगों के अधिकार और उनकी सुरक्षा का क्या?
जमुई और कोडरमा दोनों मामलों में नाबालिगों के शामिल होने के कारण उनकी सुरक्षा और निजता का सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। बच्चों से जुड़े मामलों में उनकी पहचान सार्वजनिक करना, वीडियो या तस्वीरें प्रसारित करना और उन्हें मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना देना गंभीर चिंता का विषय है। पॉक्सो एक्ट और बाल संरक्षण से जुड़े कानूनों में बच्चों की गरिमा और सुरक्षा को विशेष महत्व दिया गया है। इसलिए किसी घटना की जानकारी सामने आने के बाद भीड़ या सोशल मीडिया यूजर्स को यह ध्यान रखना चाहिए कि कार्रवाई के नाम पर बच्चे की पहचान या निजी जानकारी सार्वजनिक न हो।
3- किसी लड़की या नाबालिगों की निजी जिंदगी पर फैसला सुनाने का अधिकार किसे है?
कोडरमा मामले में ग्रामीणों को नाबालिगों के एक-दूसरे से मिलने पर आपत्ति थी। लेकिन किसी व्यक्ति के व्यवहार या निजी संबंधों को लेकर सामाजिक असहमति होने का मतलब यह नहीं है कि भीड़ उसे पकड़कर सार्वजनिक रूप से अपमानित या दंडित कर सकती है। यदि किसी गतिविधि में अपराध की आशंका है तो उसकी सूचना पुलिस को दी जानी चाहिए। कानून यह तय करेगा कि वास्तव में कोई अपराध हुआ है या नहीं। भीड़ द्वारा खुद फैसला सुनाना न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है।
4- समाज की चुप्पी और तमाशबीन बनने की प्रवृत्ति पर कैसे लगेगी रोक?
जमुई जैसी घटनाओं में वीडियो सामने आने के बाद एक और सवाल उठता है कि सार्वजनिक स्थान पर ऐसी घटना होने के दौरान आसपास मौजूद लोगों की भूमिका क्या होनी चाहिए। किसी पीड़ित की मदद करने और पुलिस को सूचना देने के बजाय घटना का वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया पर फैलाना स्थिति को और गंभीर बना सकता है। खासतौर पर नाबालिगों से जुड़े मामलों में वीडियो या तस्वीरें शेयर करने से उनकी पहचान और निजता प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में नागरिकों को पुलिस हेल्पलाइन 112 या चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 जैसी सेवाओं की मदद लेनी चाहिए।
5- घटना के बाद पीड़ित बच्चों और उनके परिवारों को किस तरह की मदद मिले?
किसी घटना के बाद केवल आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करना ही पर्याप्त नहीं है। यदि नाबालिग किसी अपराध या प्रताड़ना का शिकार हुआ है तो उसे सुरक्षित माहौल, कानूनी सहायता और जरूरत पड़ने पर मानसिक परामर्श भी मिलना चाहिए। पॉक्सो एक्ट और बाल संरक्षण व्यवस्था के तहत बच्चों की सुरक्षा और पुनर्वास के लिए संबंधित संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। जिला बाल संरक्षण इकाई और बाल कल्याण समिति जैसी संस्थाएं जरूरत के अनुसार सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं। परिवार और समाज की जिम्मेदारी है कि बच्चे पर दबाव डालने के बजाय उसे सुरक्षित वातावरण दें और मामले की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाएं।
जमुई और कोडरमा की घटनाओं की परिस्थितियां अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों मामलों ने नाबालिगों की सुरक्षा और कानून के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जमुई में जहां नाबालिग छात्र-छात्रा के साथ कथित बदसलूकी और छेड़छाड़ की जांच चल रही है, वहीं कोडरमा में तीन नाबालिगों को सार्वजनिक रूप से दंडित किए जाने के आरोपों की जांच हो रही है। इन दोनों मामलों से एक बात स्पष्ट होती है कि किसी आरोप की सच्चाई तय करना और दोषी को सजा देना कानून और न्यायिक प्रक्रिया का विषय है। किसी भी स्थिति में भीड़ का फैसला कानून का विकल्प नहीं हो सकता।
जमुई की इस शर्मनाक घटना, कानून-व्यवस्था पर उठते सवालों और समाज की खामोशी पर वरिष्ठ पत्रकार राणा यशवंत का खास विश्लेषण यहां देखें।




