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पटना, 7 जुलाई 2021

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दूसरे कार्यकाल में केंद्रीय कैबिनेट का विस्तार ( PM Modi Cabinet Expansion) किया. बिहार की सियासत के लिहाज से देखें तो इसमें दो बातें खास हुई हैं. पहली यह कि इस बार जनता दल यूनाइटेड (JDU) भी शामिल हुई और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष आरसीपी सिंह (RCP Singh) केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनाए गए. वहीं, दूसरा यह कि लोक जन शक्ति पार्टी के सांसद पशुपति कुमार पारस (Pashupati kumar Paras) को भी मोदी मंत्रिमंडल में जगह मिली. पर सवाल यह है कि आनुपातिक आधार पर अब तक चार मंत्री पद की मांग पर अड़ी जेडीयू ने आखिर एक मंत्री पद पर ही क्यों मान गई? लोजपा में बगावत और चिराग पासवान की नाराजगी के बावजूद पशुपति कुमार पारस को पीएम मोदी ने कैबिनेट में क्यों शामिल किया?

राजनीतिक जानकारों की मानें तो इसमें ड्रामा, इमोशन, बलिदान और समझौतों से भरी पूरी फिल्मी स्क्रिप्ट आपको समझ में आएगी. दरअसल केंद्रीय कैबिनेट में जगह बनाने को लेकर जेडीयू साल 2019 से कोशिश में थी. लोकसभा चुनाव के बाद हुए कैबिनेट विस्तार में जेडीयू कोटा से मंत्री के शामिल होने की बात पक्की थी. आरसीपी सिंह का नाम तय माना जा रहा था, लेकिन आखिरी क्षण फैसला बदल गया और 16 सांसद होने के बावजूद जेडीयू को कैबिनेट में जगह नहीं मिल पाई. तब नीतीश कुमार की नाराजगी भी सरेआम सामने आई थी. हालांकि पीएम मोदी तब भी टस से मस न हुए थे.

जेडीयू की जुगत को मिली कमायाबी
तब यही चर्चा आई कि जेडीयू के दो कैबिनेट व एक राज्य मंत्री पद की मांग की एवज में भाजपा ने एक कैबिनेट और एक राज्य मंत्री देने पर हामी भरी थी. लेकिन, जेडीयू के दो कद्दावर नेता आरसीपी सिंह और ललन सिंह, दोनों की दावेदारी कैबिनेट मंत्री पद की ही थी. उस वक्त बात नहीं बनी और सीएम नीतीश ने स्वयं इस बात का ऐलान किया कि जेडीयू केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं होगी. अब जब केंद्रीय मंत्रिपरिषद की विस्तार की खबरें आईं तो ऐसे में इस बार कैबिनेट विस्तार की सुगबुगाहट शुरू होने के बाद से ही जेडीयू ने जुगत लगानी शुरू कर दी थी. यही वजह रही कि प्रत्यक्ष तौर पर एक मंत्री पद प्राप्त करने में जेडीयू कामयाब रही.

मोदी को जो जानते हैं, वो यह बात भी मानेंगे
हालांकि इस बार भी यही चर्चा हो रही थी कि सीएम नीतीश कुमार ने दो कैबिनेट व दो राज्य मंत्री पद की डिमांड रखी थी. पर  इस बार नीतीश का चेहरा आगे नहीं था बल्कि सामने आरसीपी सिंह थे. जेडीयू मोदी मंत्रिमंडल में दो कैबिनेट मंत्री व कम से कम 2 राज्य मंत्री की मांग कर रही थी. लेकिन सहयोगी जेडीयू की मांग को बीजेपी ने खारिज कर दी. दरअसल इसके पीछे की दो वजह साफ है. पहला यह कि पीएम मोदी मिनमम गवर्मेंट मैक्सिम गवर्नेंस की बात कहते रहे हैं. ऐसे में जंबो मंत्रिमंडल होने की स्थिति में ही जेडीयू की मांग पूरी की जा सकती थी, जो कि संभव नहीं था.

लोकसभा से विधान सभा आते-आते बदल गई स्थिति
दूसरा कारण यह कि एनडीए एक बड़ा कुनबा है ऐसे में पीएम मोदी के समक्ष एक सहयोगी को खुश करने की स्थिति में अन्य सहयोगियों को नाराज करने का रिस्क हो जाता. ऐसे भी चुनावी राज्यों पर फोकस करने की बात पहले से ही आगे आ रही थी. यही वजह है कि इस बार यूपी से सात तो गुजरात से पांच मंत्री बनाए गए. बिहार में चुनाव संपन्न हो चुके हैं और जेडीयू की लोकसभा चुनाव वाली स्थिति भी नहीं रही है. क्योंकि अब बिहार विधानसभा में जेडीयू तीसरे नंबर की पार्टी है और भाजपा पर सीएम नीतीश का बहुत दबाव नहीं चल पा रहा है.

नीतीश कुमार की कुर्बानी से पशुपति कुमार पारस की बल्ले-बल्ले
राजनीतिक जानकारों की मानें तो यह सिर्फ आपको तकनीकी तौर पर आपको दिखता है कि जेडीयू को एक मंत्री पद मिला है. लेकिन नीति की दृष्टि से देखें तो जेडीयू के खाते में दो मंत्री पद आए हैं, वह भी कैबिनेट के. दरअसल राजनीतिक जानकार यही मान रहे हैं कि पशुपति कुमार पारस को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया जाना तभी संभव हो पाया जब जेडीयू ने अपनी ओर से कुर्बानी दी. इसके लिए भी सीएम नतीश ने बड़ी भूमिका निभाई है और पशुपति कुमार पारस को अपनी कोशिशों से कैबिनेट तक पहुंचा दिया है.

तो पशुपति पारस की जगह चिराग पासवान बन जाते मोदी के मंत्री
राजनीतिक जानकार बताते हैं कि जेडीयू को दो कैबिनेट मंत्री पद मिलना पक्का था, लेकिन पशुपति कुमार पारस का मामला फंस गया था. पीएम मोदी लोजपा से किसी न किसी को शामिल करना चाहते थे, लेकिन जिसमें चिराग पासवान हो सकते थे. ऐसे भी चिराग पासवान अब भी पीएम मोदी के दिल के करीब माने जाते हैं. लेकिन, इस बीच लोजपा में टूट हो गई तो टेक्निकल मामला फंस गया. लोकसभा में संसदीय दल के नेता के तौर पर पशुपति कुमार पारस को मान्यता मिल गई तो भाजपा की ओर से चिराग के लिए कुछ नहीं किया जा सका. अगर लोजपा नहीं टूटी होती तो संभव है कि पारस की जगह चिराग मंत्रिपरिषद में शामिल होते.

कामयाब रही नीतीश की कूटनीति और चिराग हो गए आउट
दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि चिराग पासवान से सीएम नीतीश कुमार की अदावत के कारण  जेडीयू ने ही पशुपति पारस को अपने भतीजे चिराग पासवान के खिलाफ बगावत करने के लिए उकसाया गया था. बगावत हुई और लोजपा टूट गई. चिराग पासवान के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी सवाल खड़े हो गए. ऐसे में सियासत की महीन नजरें तो यही देख पा रही हैं कि चिराग पासवान के खिलाफ बगावत करने और उन्हें मंत्री पद की रेस से बाहर करने के लिए ही पशुपति पारस को मंत्री पद का पुरस्कार मिला है.

पशुपति पारस गुट का जेडीयू में हो सकता है विलय
दरअसल राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस के बीच लोजपा पर वास्तविक अधिकार का मामला अभी भी चुनाव आयोग के पास लंबित है. ऐसे में चुनाव आयोग क्या निर्णय देता है इस पर भी काफी कुछ निर्भर करेगा कि पशुपति कुमार पारस गुट का क्या होगा? विशेषज्ञों की मानें तो लोजपा के 90 प्रतिशत समर्थक व कार्यकर्ता चिराग पासवान से सहानुभूति रखते हैं. पार्टी के संविधान के अनुसार लोजपा पर अधिकार का मामला भी अब कोर्ट में है, ऐसे में पारस गुट का पलड़ा भारी होने पर पारस गुट का विलय जेडीयू में होना संभव हो सकता है.

पारस-नीतीश का नाता क्या? 
राजनीतिक जानकार बताते हैं कि ऐसे भी जिस तरीके से चिराग पासवान को डैमेज करने के लिए सीएम नीतीश कुमार ने लोजपा के एक-एक सांसदों के पीछे आरसीपी सिंह, ललन सिंह जैसे अपने कद्दावर नेताओं को लगा दिया और उसे आखिरकार तोड़ ही दिया, ऐसे में आने वाले समय में पारस गुट का अंतिम मुकाम जेडीयू ही होने वाला है. ऐसी स्थिति में देखा जाए तो सामने से तो लगता है कि जेडीयू को एक मंत्री पद ही मिला है, लेकिन हकीकत में यह दो है. भले ही इस पूरी कवायद के पीछे की पूरी कहानी अभी बाहर नहीं आई है, लेकिन आने वाले समय में पारस और नीतीश का नाता जगजाहिर होना ही है.