द फ्रंट डेस्क: चुनाव आयोग अक्टूबर में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर की मतदाता सूचियों का विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण यानी SSR (Special Summary Revision) करा सकता है। इसके लिए 1 जनवरी 2027 को अर्हता तिथि माना जा सकता है। इन राज्यों में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में चुनाव से पहले वोटर लिस्ट को अपडेट करना अहम होगा। इस बीच देशभर में SSR नहीं कराए जाने को लेकर चुनाव आयोग के भीतर भी सवाल उठे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 1 जनवरी 2025 के बाद देशव्यापी SSR नहीं कराए जाने पर आपत्ति जताई थी। हालांकि, आयोग के सामने SIR और जनगणना जैसी कई प्रक्रियाएं भी चल रही हैं।
क्या होता है SIR और SSR?
SIR यानी Special Intensive Revision में मतदाता सूची की व्यापक और गहन जांच की जाती है। इसमें मतदाताओं की पात्रता और सूची में दर्ज जानकारी का विस्तृत सत्यापन किया जाता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य पात्र मतदाताओं के नाम सूची में सुनिश्चित करना और गलत, डुप्लीकेट या अपात्र प्रविष्टियों की पहचान करना होता है। यानी SIR में वोटर लिस्ट की गहराई से जांच और सत्यापन पर जोर रहता है। वहीं, SSR यानी Special Summary Revision में मौजूदा मतदाता सूची को अपडेट और संशोधित किया जाता है। इसमें नए पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने, मतदाता विवरण में गलतियों को सुधारने और जरूरी बदलाव करने की प्रक्रिया शामिल होती है। आसान भाषा में कहें तो SIR में वोटर लिस्ट की गहन जांच होती है, जबकि SSR में पहले से मौजूद सूची को अपडेट और सुधारने पर ज्यादा जोर रहता है।
किन राज्यों में हो सकता है SSR?
चुनाव आयोग अक्टूबर में इन पांच राज्यों में मतदाता सूची का विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण करा सकता है:
- उत्तर प्रदेश
- उत्तराखंड
- पंजाब
- गोवा
- मणिपुर
इन सभी राज्यों में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में चुनाव से पहले मतदाता सूची को अपडेट करना चुनावी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। SSR के दौरान नए पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करने के साथ पुराने रिकॉर्ड में जरूरी सुधार किए जा सकते हैं। इसके लिए 1 जनवरी 2027 को अर्हता तिथि माना जा सकता है।
2 आयुक्त देशभर में SSR न होने से क्यों थे खफा?
रिपोर्टों के मुताबिक, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 1 जनवरी 2025 के बाद देशव्यापी SSR नहीं कराए जाने पर आपत्ति जताई थी। दोनों आयुक्तों की आपत्ति का मुद्दा यह था कि पूरे देश में मतदाता सूचियों का विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण नियमित तौर पर क्यों नहीं कराया गया। हालांकि, अधिकारियों के अनुसार उस दौरान कई राज्यों में SIR की प्रक्रिया चल रही थी। बिहार में भी SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी और अन्य राज्यों में मतदाता सूची के व्यापक सत्यापन का काम जारी था। इसी बीच 2026 में आयोग ने 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कवर करने वाले SIR के तीसरे चरण की योजना बनाई। ऐसे में आयोग के सामने पहले से चल रही पुनरीक्षण प्रक्रिया और अन्य प्रशासनिक कार्य थे। यही वजह बताई जा रही है कि पूरे देश में एक साथ SSR कराने के बजाय फिलहाल चुनावी राज्यों की मतदाता सूचियों पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकता है।
देशभर में SSR कराने की संभावना कम क्यों?
देशभर में SSR नहीं कराने की एक प्रमुख वजह अलग-अलग राज्यों में चल रही SIR की प्रक्रिया है। 2026 में 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR का तीसरा चरण चल रहा है। इस प्रक्रिया में मतदाता सूची का व्यापक सत्यापन किया जाता है, इसलिए इसे पूरा करने में प्रशासनिक स्तर पर काफी संसाधनों की जरूरत होती है। इसके अलावा देश में जनगणना की प्रक्रिया भी जारी है। ऐसे में एक ही समय पर देशभर में SSR कराने से बड़ी संख्या में प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों की जरूरत पड़ सकती है। इन परिस्थितियों को देखते हुए आयोग चुनावी राज्यों में प्राथमिकता के आधार पर SSR कराने की तैयारी कर सकता है।
जनगणना की वजह से भी चुनौती
देशव्यापी SSR के सामने जनगणना की प्रक्रिया भी एक बड़ी चुनौती है। जनगणना का पहला चरण 1 अप्रैल से 30 सितंबर 2026 के बीच निर्धारित किया गया था। वहीं, कुछ पहाड़ी और बर्फीले क्षेत्रों में जनगणना की प्रक्रिया अलग समय पर चल रही है। ऐसे इलाकों में मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए प्रक्रिया का समय अलग रखा गया है। ऐसे में चुनाव आयोग को मतदाता सूची के पुनरीक्षण और जनगणना की प्रक्रिया के बीच बेहतर तालमेल रखना होगा। दोनों प्रक्रियाओं में बड़ी संख्या में प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों की जरूरत होती है। इसलिए देशव्यापी SSR की योजना बनाते समय इन प्रशासनिक चुनौतियों को भी ध्यान में रखना होगा।
चुनाव से पहले वोटर लिस्ट क्यों होती है अपडेट?
चुनाव से पहले मतदाता सूची को अपडेट करना जरूरी होता है, ताकि नए पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल किया जा सके और मतदाता विवरण में मौजूद गलतियों को सुधारा जा सके। इसके अलावा जिन मतदाताओं की जानकारी में बदलाव हुआ है, उनके रिकॉर्ड को भी आवश्यकतानुसार अपडेट किया जाता है। इससे चुनाव के समय मतदाता सूची को अधिक सटीक रखने में मदद मिलती है। चुनाव आयोग जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 21 के तहत मतदाता सूची का पुनरीक्षण कर सकता है। यह प्रावधान चुनाव या उपचुनाव से पहले संबंधित अर्हता तिथि के आधार पर मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़ा है। इसी प्रक्रिया के तहत पात्र नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल करने और रिकॉर्ड में जरूरी संशोधन करने का काम किया जाता है।
चुनाव आयोग के अंदर क्या है विवाद?
‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से जुड़े मुद्दों पर चिंता जताई थी। रिपोर्ट में दावा किया गया कि पिछले कुछ महीनों में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर कई बार आपत्ति दर्ज कराई गई। यह मामला मतदाता सूची के पुनरीक्षण और आयोग के भीतर होने वाले विचार-विमर्श से जुड़ा बताया गया है। वहीं, चुनाव आयोग ने कहा है कि किसी भी बहुसदस्यीय संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय, सुझाव और टिप्पणियां सामने आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के मुताबिक, उसके सभी अंतिम आदेश पिछले एक वर्ष में लिए गए सर्वसम्मत फैसलों का परिणाम हैं। अधिकारियों ने यह भी कहा कि देशभर में SIR से जुड़े फैसलों पर आयोग के भीतर पूरी सहमति थी। ऐसे में आयोग के अनुसार अलग-अलग राय को संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा माना जाना चाहिए।




