द फ्रंट डेस्क: बिहार में एक के बाद एक सामने आ रहे लड़कियों से कथित बदसलूकी के वीडियो ने अब मामला सिर्फ तीन अलग-अलग आपराधिक घटनाओं तक सीमित नहीं रखा है। जमुई, समस्तीपुर और अब बांका तीन जिलों से सामने आए मामलों ने पुलिस की कार्रवाई, महिलाओं की सुरक्षा और राज्य की कानून-व्यवस्था को लेकर राजनीतिक बहस तेज कर दी है। जमुई मामले में गिरफ्तारियां और पुलिस मुठभेड़ हुई, समस्तीपुर में चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और बांका के मंदार पर्वत मामले में छह अज्ञात युवकों के खिलाफ FIR दर्ज हुई है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि लगातार सामने आ रहे इन मामलों पर सरकार और पुलिस का एक्शन कितना तेज है और विपक्ष जिन सवालों को उठा रहा है, उनका आधार क्या है?
जमुई से शुरू हुआ मामला
19 सितंबर को जमुई में एक नाबालिग छात्रा और उसके साथ मौजूद छात्र को कुछ युवकों ने कथित तौर पर रास्ते में रोककर बदसलूकी की। घटना का वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने FIR दर्ज की और कई आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की। तीन आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई, जबकि मुख्य आरोपी नंदन यादव को पकड़ने के दौरान पुलिस के साथ मुठभेड़ हुई, जिसमें उसके पैर में गोली लगी। पुलिस की कार्रवाई के बावजूद यह सवाल उठा कि घटना के समय मौके पर मौजूद लोगों ने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया और पुलिस तक मामला वीडियो वायरल होने के बाद ही क्यों पहुंचा।
सरकार का दावा- कार्रवाई हो रही, लेकिन विपक्ष कानून-व्यवस्था पर घेर रहा
जमुई मामले के बाद विपक्ष ने इसे बिहार की कानून-व्यवस्था से जोड़कर सरकार पर हमला किया। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने राज्य में लड़कियों की सुरक्षा को लेकर सरकार से सवाल किए। बाद में बांका का वीडियो सामने आने पर भी उन्होंने कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए सरकार से जवाब मांगा। यह राजनीतिक आरोप हैं; सरकार और पुलिस की ओर से अलग-अलग मामलों में कार्रवाई और जांच जारी होने की बात कही गई है। वहीं मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने जमुई मामले के संदर्भ में कहा कि आरोपियों ने अगर वीडियो और रील नहीं बनाई होती तो उनकी गिरफ्तारी मुश्किल हो सकती थी। सरकार की ओर से इस तरह की घटनाओं में कार्रवाई की बात कही जा रही है, जबकि विपक्ष का सवाल यह है कि अपराध होने से पहले रोकथाम और सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षा व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

समस्तीपुर में चार गिरफ्तार, फिर भी चिराग ने उठाया बड़ा सवाल
जमुई के बाद समस्तीपुर से वायरल हुए वीडियो ने सरकार पर दबाव और बढ़ा दिया। पुलिस ने वीडियो की तकनीकी जांच के बाद चार लोगों को गिरफ्तार किया और मामले में संबंधित कानूनी धाराओं के तहत कार्रवाई की। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा कि केवल चार गिरफ्तारियां पर्याप्त नहीं हैं और मामले में जो भी लोग शामिल हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। यानी यहां बहस सिर्फ गिरफ्तारी की संख्या पर नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या पुलिस बाकी आरोपियों तक पहुंच पाएगी, क्या पीड़िता को न्याय मिलेगा और क्या ऐसी घटनाओं को दोबारा होने से रोकने के लिए पुलिसिंग में कोई ठोस बदलाव होगा?

अब बांका ने बढ़ाई चिंता, मंदार पर्वत का वीडियो कितना पुराना?
25 सितंबर को बांका के मंदार पर्वत से एक और वीडियो सामने आया। पुलिस ने वीडियो में दिखाई दे रही जगह की पुष्टि की और छह अज्ञात युवकों के खिलाफ FIR दर्ज की। शुरुआती जांच में पुलिस को आशंका है कि वीडियो हाल का नहीं बल्कि कई महीने पुराना हो सकता है। इसलिए फिलहाल वीडियो की वास्तविक तारीख, उसमें दिखाई दे रहे लोगों की पहचान और घटना की पूरी परिस्थितियों की जांच की जा रही है। यह बिंदु महत्वपूर्ण है, क्योंकि सोशल मीडिया पर वीडियो के वायरल होने की तारीख और घटना की वास्तविक तारीख एक नहीं हो सकती। इसलिए बांका मामले को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही निकाला जा सकता है।
तीन घटनाओं के बाद असली सवाल- पुलिस वीडियो का इंतजार क्यों करती है?
इन मामलों में एक समान पैटर्न यह दिखाई देता है कि घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद पुलिस कार्रवाई तेज हुई। हालांकि इससे यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि पुलिस हर मामले में पहले से कार्रवाई नहीं कर रही थी। लेकिन लगातार वायरल हो रहे वीडियो ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है। क्या पुलिस की निगरानी और स्थानीय स्तर पर अपराध की रोकथाम की व्यवस्था इतनी प्रभावी है कि घटना होने से पहले ऐसे मामलों को रोका जा सके? जमुई मामले में पुलिस ने सोशल मीडिया पर पीड़िता की पहचान उजागर करने वाले वीडियो को लेकर भी कार्रवाई शुरू की है। रिपोर्टों के मुताबिक कई सोशल मीडिया अकाउंट्स को नोटिस भेजे गए हैं। इसका मतलब यह भी है कि सरकार के सामने चुनौती सिर्फ आरोपियों को पकड़ने की नहीं, बल्कि पीड़ित की पहचान और निजता की रक्षा करने की भी है।
कानून-व्यवस्था पर राजनीतिक लड़ाई क्यों तेज हुई?
जमुई, समस्तीपुर और बांका के मामले ऐसे समय सामने आए हैं जब बिहार में कानून-व्यवस्था राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बनी हुई है। विपक्ष इन घटनाओं को सरकार की जवाबदेही से जोड़ रहा है, जबकि सरकार की ओर से पुलिस कार्रवाई और आरोपियों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया को रेखांकित किया जा रहा है। बांका मामले के बाद भी तेजस्वी यादव ने सरकार से कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल किए। इस पूरे विवाद में दो अलग-अलग स्तर हैं। पहला, हर मामले में आरोपियों की पहचान, गिरफ्तारी और अदालत के जरिए दोष साबित होना। दूसरा, ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पुलिस व्यवस्था, सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा और प्रशासन की जवाबदेही। पहला सवाल जांच और न्यायिक प्रक्रिया से तय होगा, जबकि दूसरा सरकार और पुलिस की नीतियों तथा जमीनी व्यवस्था से जुड़ा है।
अब सरकार और पुलिस के सामने क्या चुनौती है?
फिलहाल तीनों मामलों में जांच अलग-अलग स्तर पर चल रही है। जमुई और समस्तीपुर में गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, जबकि बांका में आरोपियों की पहचान करना पुलिस के सामने प्रमुख चुनौती है। आगे पुलिस को वीडियो की फोरेंसिक जांच, आरोपियों की पहचान, गवाहों और पीड़ितों के बयान तथा उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर जांच आगे बढ़ानी होगी। लेकिन इन घटनाओं ने सरकार के सामने एक बड़ा प्रशासनिक सवाल जरूर रख दिया है। क्या कार्रवाई सिर्फ वीडियो वायरल होने के बाद होगी या सार्वजनिक जगहों पर अपराध रोकने के लिए पुलिसिंग को और मजबूत किया जाएगा? इसका जवाब आने वाले दिनों में सरकार की कार्रवाई और इन मामलों की जांच की दिशा से स्पष्ट होगा।




