नई दिल्ली: संसद में वक्फ संशोधन बिल पेश करते हुए केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस और यूपीए सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि 2013 में यूपीए सरकार ने वक्फ कानून में ऐसे बदलाव किए जिससे वर्तमान समय में भी विवाद खड़ा हो रहा है। रिजिजू ने आरोप लगाया कि अगर मोदी सरकार सत्ता में नहीं आई होती, तो संसद की भूमि भी वक्फ के दावे में आ सकती थी।
यूपीए सरकार के फैसलों पर उठाए सवाल
रिजिजू ने बताया कि 2013 में वक्फ कानून में ऐसा संशोधन किया गया, जिससे देश में कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, वक्फ बना सकता है। उन्होंने कहा कि शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड में उन्हीं समुदायों के लोगों को रखने का नियम बनाया गया था, लेकिन इसका दुरुपयोग किया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि 2013 में जबरन बिल पास करवा कर वक्फ के प्रावधानों को देश के अन्य सभी कानूनों से ऊपर रखने की कोशिश की गई थी।
123 प्राइम प्रॉपर्टी का ट्रांसफर
रिजिजू ने बताया कि 1970 से दिल्ली में 123 प्रॉपर्टी को लेकर मामला चल रहा था, लेकिन यूपीए सरकार ने 5 मार्च 2014 को इन सभी प्राइम प्रॉपर्टी को दिल्ली वक्फ बोर्ड को ट्रांसफर कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने यह फैसला महज वोट बैंक की राजनीति के तहत लिया था, लेकिन इसके बावजूद उसे 2014 के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।
नए बिल में क्या बदलाव किए गए?
रिजिजू ने संसद में कहा कि नए वक्फ संशोधन बिल के तहत अब वक्फ वही व्यक्ति बना पाएगा, जिसने कम से कम 5 साल तक इस्लाम की प्रैक्टिस की हो। इसके अलावा, वक्फ काउंसिल में 4 गैर-मुस्लिम सदस्य भी शामिल होंगे, जिनमें से दो महिलाएं होंगी।
भविष्य में क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस नए संशोधन से वक्फ कानून को अधिक पारदर्शी बनाया जा सकेगा और विवादित दावों पर रोक लगेगी। हालांकि, विपक्ष इस फैसले को अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों पर हमला बता रहा है।
संसद में वक्फ संशोधन बिल को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव तेज हो गया है, लेकिन सरकार इस बिल को पारित करवाने के लिए पूरी तरह तैयार नजर आ रही है।




