नई दिल्ली, वक्फ संशोधित बिल पर चर्चा के लिए बनाई गई संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने बिल के मसौदे में 14 अहम बदलावों को मंजूरी दे दी है। समिति की अंतिम बैठक हाल ही में संपन्न हुई। इन बदलावों के तहत वक्फ बोर्ड में कम से कम दो गैर-मुस्लिम सदस्यों का होना अनिवार्य रहेगा। इसके अलावा, नामांकित पदेन सदस्य (चाहे वे मुस्लिम हों या गैर-मुस्लिम) भी बोर्ड का हिस्सा हो सकते हैं। हालांकि, विपक्षी सांसदों ने इस पर नाराज़गी जताई है और कहा है कि सरकार मुसलमानों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप जारी रखना चाहती है।
वक्फ संशोधित बिल में महत्वपूर्ण बदलाव
बिल के मसौदे में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन के तरीके में 44 बदलाव सुझाए गए थे, जिनमें से 14 पर सहमति बनी। एक बड़ा बदलाव यह है कि अब किसी संपत्ति को ‘वक्फ’ घोषित करने का अधिकार जिला कलेक्टर के बजाय राज्य सरकार द्वारा नामित अधिकारी को होगा। इसके अलावा, यह कानून पहले से रजिस्टर्ड संपत्तियों पर पिछली तारीख से लागू नहीं होगा।
विपक्ष की चिंता
कांग्रेस नेता और JPC सदस्य इमरान मसूद ने चिंता जताई कि देशभर में लगभग 90 प्रतिशत वक्फ संपत्तियां अब तक पंजीकृत नहीं हैं। उनके मुताबिक, यह प्रबंधन में गंभीर खामी को दर्शाता है।
सुझाव और खारिज प्रस्ताव
भाजपा सांसदों जैसे निशिकांत दुबे, तेजस्वी सूर्या, और अपराजिता सारंगी ने इन 14 बदलावों का प्रस्ताव दिया था। तेजस्वी सूर्या ने सुझाव दिया कि वक्फ के लिए जमीन दान करने वालों को यह साबित करना होगा कि वे कम से कम पांच साल से इस्लाम का पालन कर रहे हैं। विपक्ष द्वारा पेश किए गए 44 बदलावों को पूरी तरह खारिज कर दिया गया।
राजनीतिक विवाद बरकरार
जहां सत्तारूढ़ दल और उसके सहयोगी इस बिल को वक्फ संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन के लिए जरूरी मानते हैं, वहीं विपक्ष इसे अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करार दे रहा है।




