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यूपी में दामादों को बड़ा झटका: अब ससुर की निजी जानकारी नहीं मिलेगी, सूचना आयोग का अहम फैसला

यूपी में दामादों को बड़ा झटका: अब ससुर की निजी जानकारी नहीं मिलेगी, सूचना आयोग का अहम फैसला

उत्तर प्रदेश में दामादों को बड़ा झटका लगा है। उत्तर प्रदेश सूचना आयोग ने साफ कर दिया है कि आरटीआई (सूचना का अधिकार) अधिनियम के तहत कोई भी व्यक्ति अपने ससुर या किसी अन्य व्यक्ति की निजी जानकारी हासिल नहीं कर सकता। आयोग ने कहा कि इस तरह की जानकारी उपलब्ध कराना आरटीआई की भावना के अनुरूप नहीं है।


सूचना आयोग ने क्या कहा?

उप्र सूचना आयुक्त मोहम्मद नदीम ने एक मामले की सुनवाई के बाद कहा कि आरटीआई अधिनियम का उद्देश्य निजी मुकदमों के लिए सबूत जुटाना नहीं है और न ही यह कानून किसी व्यक्ति की निजता में अनावश्यक दखल देने की अनुमति देता है।

आयोग के मुताबिक, वेतन, जीपीएफ, लोन, एडवांस, चल-अचल संपत्ति और आयकर से जुड़ी जानकारियां व्यक्तिगत सूचना की श्रेणी में आती हैं, जिन्हें सामान्य परिस्थितियों में आरटीआई के तहत साझा नहीं किया जा सकता।


क्या है पूरा मामला?

आधिकारिक बयान के अनुसार, एक व्यक्ति की पत्नी ने उसके खिलाफ 26 लाख रुपये दहेज लेने का आरोप लगाया था। इसके बाद संबंधित व्यक्ति ने आरटीआई के जरिए अपने ससुर की आर्थिक स्थिति से जुड़ी जानकारी मांगी।

उसने ससुर के

  • वेतन विवरण
  • जीपीएफ
  • लोन और एडवांस
  • चल और अचल संपत्ति

से जुड़ी जानकारी मांगी थी। आवेदक का तर्क था कि ससुर कोई बाहरी व्यक्ति नहीं हैं और दहेज से जुड़े मुकदमे में यह जानकारी बेहद अहम है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या ससुर की आर्थिक हैसियत इतनी थी कि वे 26 लाख रुपये दहेज दे सकते थे।


आरटीआई आवेदन और अपील

बयान के अनुसार, कुलवंत सिंह ने 27 जुलाई 2025 को बिजनौर जिले के तहसीलदार नजीबाबाद के यहां आरटीआई आवेदन दाखिल किया था। उनके ससुर तहसील में राजस्व निरीक्षक के पद पर तैनात थे।

जब समय पर सूचना नहीं मिली तो उन्होंने राज्य सूचना आयोग में अपील दाखिल की और जनसूचना अधिकारी को निर्देश देने की मांग की कि मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराई जाए।


आयोग ने क्यों ठुकराई मांग?

सूचना आयुक्त मोहम्मद नदीम की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि सुप्रीम कोर्ट अपने कई अहम फैसलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि वेतन, आयकर, भविष्य निधि, ऋण और संपत्ति से जुड़ी जानकारी व्यक्तिगत सूचना होती है।

आयोग ने साफ कहा कि

  • दामाद होना
  • या किसी निजी मुकदमे में जानकारी की जरूरत होना

आरटीआई अधिनियम के तहत ‘बड़ा जनहित’ नहीं माना जा सकता।


पीठ का साफ संदेश

पीठ ने अपने फैसले में कहा कि अगर किसी व्यक्ति को अपने बचाव के लिए इस तरह की जानकारी जरूरी लगती है, तो इसके लिए उचित मंच न्यायालय है, न कि आरटीआई।

आयोग ने कहा कि संबंधित व्यक्ति अदालत के सामने आवेदन कर सकता है और अगर न्यायालय को जानकारी जरूरी लगेगी, तो वह अपने स्तर से संबंधित विभाग को आदेश देकर यह जानकारी मंगा सकता है।


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