Online bahis kullanıcılarının %54’ü haftada en az bir kez canlı bahis oynamaktadır; bu oran bahsegel giriş platformunda %63’tür.

Engellemelerden etkilenmemek için bettilt sık sık kontrol ediliyor.

Bahsegel güncel giriş bahsegel bettilt

OECD raporları, kullanıcıların %52’sinin “kayıp limiti” belirleyen platformları tercih ettiğini göstermektedir; paribahis bu özelliği destekler.

bahsegel giriş bettilt bahsegel bahsegel giriş bahsegel bahsegel giriş bahsegel bettiltguncel.com bettilturk-turk.click bettilt bettilt bahsegel bahsegel bettilt bahsegel giriş

Shankaracharya Controversy: जब सत्ता से टकराए शंकराचार्य, जयललिता के दौर का वह विवाद जिसने देश को झकझोर दिया

Shankaracharya Controversy: जब सत्ता से टकराए शंकराचार्य, जयललिता के दौर का वह विवाद जिसने देश को झकझोर दिया

धर्म और सत्ता के बीच टकराव भारतीय राजनीति के इतिहास में नया नहीं है। हाल के दिनों में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच चल रहा विवाद इसी परंपरा की एक कड़ी माना जा रहा है। लेकिन इससे पहले भी एक ऐसा प्रकरण सामने आ चुका है, जिसने न सिर्फ़ तमिलनाडु बल्कि पूरे देश की राजनीति और धार्मिक जगत को हिला दिया था। यह मामला साल 2004 का है, जब तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता के कार्यकाल में कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को गिरफ्तार किया गया था।

दीपावली के दिन गिरफ्तारी, देश भर में मचा हड़कंप

11 नवंबर 2004 का दिन था। पूरा देश दीपावली के उत्सव में डूबा हुआ था। उसी दिन कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती आंध्र प्रदेश के महबूबनगर में दीपावली की त्रिकाल पूजा की तैयारी कर रहे थे। इसी दौरान तमिलनाडु पुलिस वहां पहुंची और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उसी रात विशेष विमान से उन्हें चेन्नई लाया गया और वेल्लोर सेंट्रल जेल में बंद कर दिया गया। एक प्रमुख हिंदू धर्मगुरु की इस तरह गिरफ्तारी ने पूरे देश को चौंका दिया।

हत्या के मामले में नाम आने से बढ़ा विवाद

तमिलनाडु पुलिस ने गिरफ्तारी का आधार एक हत्या का मामला बताया। यह मामला कांचीपुरम के वरदराज पेरुमल मंदिर के मैनेजर शंकररमन की हत्या से जुड़ा था। 3 सितंबर 2004 को मंदिर परिसर में ही धारदार हथियार से शंकररमन की हत्या कर दी गई थी। जांच में पुलिस ने दावा किया कि शंकररमन और मठ के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा था। शंकररमन ने मठ के कामकाज, वित्तीय अनियमितताओं और कथित घोटालों को लेकर गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने ‘सोमशेखर गणपाडिगल’ नाम से कई गुमनाम पत्र भी सरकार को भेजे थे, जिनमें मठ की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए थे।

सत्ता समीकरण और जयललिता की नाराज़गी

उस वक्त तमिलनाडु में जयललिता सत्ता में थीं। केंद्र में एनडीए सरकार गिर चुकी थी और यूपीए सत्ता में आ गई थी, जिसमें डीएमके प्रमुख करुणानिधि अहम साझेदार थे—जो जयललिता के कट्टर राजनीतिक विरोधी माने जाते थे। इसी दौर में यूपीए और खासकर डीएमके के कई नेता शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती से आशीर्वाद लेने कांची मठ पहुंचने लगे। यह स्थिति जयललिता को नागवार गुज़री। उन्हें लगने लगा कि कांची कामकोटि पीठ एक समानांतर सत्ता केंद्र के रूप में उभर रहा है, जो भविष्य में उनकी राजनीतिक पकड़ को चुनौती दे सकता है।

शंकराचार्य की गिरफ्तारी का फैसला

इन परिस्थितियों के बीच शंकररमन हत्याकांड ने जयललिता को निर्णायक कदम उठाने का मौका दे दिया। उन्होंने तमिलनाडु पुलिस को शंकराचार्य की गिरफ्तारी की अनुमति दी। यह फैसला इतना बड़ा था कि जयललिता की सहयोगी बीजेपी भी इससे नाराज़ हो गई। वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने खुलकर विरोध किया, जबकि विश्व हिंदू परिषद और देशभर के साधु-संतों ने आंदोलन छेड़ दिया। इसके बावजूद जयललिता अपने फैसले पर अडिग रहीं।

जेल में आम कैदी जैसा व्यवहार

शंकराचार्य को जेल में किसी विशेष सुविधा नहीं दी गई। शुरुआत में उन्हें ज़मीन पर सोना पड़ा और सामान्य कैदियों जैसा ही भोजन मिला। शंकराचार्य परंपरानुसार स्वयं का बना भोजन, गंगाजल और त्रिकाल पूजा का पालन करते थे, लेकिन जेल में इन नियमों में ढील नहीं दी गई। बाद में देशभर में विरोध बढ़ने के बाद उन्हें मठ से आया दूध और फल, पूजा के लिए सीमित सामग्री और सोने के लिए लकड़ी का तख्त उपलब्ध कराया गया। करीब दो महीने जेल में बिताने के बाद 2005 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों के अभाव में उन्हें जमानत दे दी।

‘हिंदुत्व पर हमला’ और जनआक्रोश

शंकराचार्य की गिरफ्तारी को देशभर में हिंदुत्व पर हमला माना गया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को यह डर सताने लगा कि अगर शंकराचार्य जैसे धर्मगुरु को राजनीतिक कारणों से जेल भेजा जा सकता है, तो कोई भी संत सुरक्षित नहीं है। जमानत के बाद जब शंकराचार्य कांचीपुरम लौटे, तो उनके स्वागत में हजारों श्रद्धालु सड़कों पर उमड़ पड़े। फूलों की बारिश, ‘जय जय शंकर’ के नारे और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच उनका भव्य स्वागत किया गया।

लंबी कानूनी लड़ाई और अंततः बरी

जमानत के बाद शंकराचार्य के वकीलों ने केस को तमिलनाडु से बाहर स्थानांतरित करने की मांग की। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद यह मामला पुडुचेरी ट्रांसफर किया गया। करीब नौ साल तक चली सुनवाई में 189 गवाहों से पूछताछ हुई, जिनमें से 83 अपने बयान से मुकर गए। शंकररमन की पत्नी और बेटी भी आरोपियों की पहचान नहीं कर सकीं। पुलिस हत्या की साजिश को सीधे तौर पर शंकराचार्य से जोड़ने में नाकाम रही। अंततः 27 नवंबर 2013 को पुडुचेरी की विशेष अदालत ने शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती, उनके उत्तराधिकारी विजयेंद्र सरस्वती और अन्य 21 आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया।

धर्म और राजनीति की टकराहट की मिसाल

जयललिता–शंकराचार्य विवाद आज भी इस बात की मिसाल माना जाता है कि जब धर्म और सत्ता आमने-सामने आते हैं, तो उसका असर केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज और आस्था तक को झकझोर देता है। यह मामला आज भी भारतीय लोकतंत्र में शक्ति, आस्था और कानून के जटिल रिश्तों को समझने के लिए एक अहम संदर्भ के रूप में देखा जाता है।

Share post:

Popular

More like this
Related

योगी कैबिनेट का बड़ा फैसला: उत्तर प्रदेश बनेगा ‘ग्लोबल मैनपावर हब’

सरदार वल्लभभाई पटेल कौशल प्रशिक्षण एवं रोजगार क्षेत्र विकास...

प्रेमानंद महाराज के आश्रम पर सवाल: एक बेटे की मौत, दूसरा कहां है?

Premanand Maharaj Ashram Controversy: वृंदावन स्थित प्रेमानंद महाराज के...

ममता बनर्जी ने भी किया CJP का समर्थन, अभिजीत दिपके के साथ कौन-कौन से दल?

CJP Protest: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे...