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जयपुर, 27 मार्च 2021

आपने ब्रज के बरसाना की लट्ठमार होली और मथुरा वृन्दावन की होली के किस्से ज़रूर सुने होंगे।
देश विदेश में रंगो का त्यौहार होली हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है लेकिन हर जगह की होली मनाने की प्रथा अलग-अलग होती है। कहीं लोग सुखी होली खेलते है तो कहीं पानी और रंगों एवं कहीं फूलों से तो कहीं टमाटरों से होली खेली जाती है।

होली मनाने के हर जगह के तौर-तरीके, रीती-रिवाज अलग होते है। लेकिन पत्थरों से होली खेलने की प्रथा के बारे में बहुत कम लोगों ने सुना होगा।यह खतरनाक प्रथा दक्षिणी राजस्थान के उदयपुर संभाग के गुजरात और मध्य प्रदेश से सटे आदिवासी क्षेत्र डूंगरपुर के भीलूड़ा गांव में देखी जा सकती है।भीलूड़ा गांव बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिले के मध्य सागवाडा कस्बे के निकट है। इस अजीब मान्यता के चलते प्रतिवर्ष होली के दिन कई लोग घायल होते है।
भीलूड़ा के अलावा रामगढ़ गाँव में भी यह ख़तरनाक खेल खेला जाता है और होली के मौके पर यहाँ लोगों को अस्पताल पहुँचाने प्रशासन को एंबुलेंस 108 और पुलिंस लगानी पड़ती है। लोग होली से पहलें ही पत्थर इकट्ठा कर लेते हैं। ये खेल होलिका दहन के बाद रात से ही शुरू होता है तो धूलंडी तक चलता है। माहौल में वीर रस भरने के लिए ढोल कुंडी और चंग बजने लगते हैं। इस परंपरा को स्थानीय भाषा में ‘राड़’ बोला जाता है।राड का एक अर्थ दुश्मनी निकालने से भी लिया जाता है।

पत्थरों से होली खेलने की इस परम्परा को काफी पुराना बताया जा रहा है। बरसों से चल रही इस परम्परा में यहां के लोग होली पर एक दूसरे पर पत्थर फेंकते है और होली खेलते है। ढोल और कुंडी की थाप पर थिरकते युवा, होरियां की चित्कारों के साथ ही दो दलों में जमकर बरसते हैं पत्थर। हाथों में गोफण (सूत की रस्सी) और सुरक्षा के लिए ढाल, पैरों में घुंघरू के झनकार के साथ ही सन्न् सन्न्… करती पत्थरों की ऐसी बौछार होती है कि लोग लहुलूहान हों जाते हैं। होली के इस शौर्य प्रदर्शन में लोगों का उत्साह देखते ही बनता है । ढोल नगाड़ों के साथ नाचते हुए होरिया की पुकार के साथ आदिवासी मोहल्लों और गांव से आने वाले लोग भिलूडा गाँव के रघुनाथजी मंदिर के पास गर्ल्स स्कूल ग्राउंड में परंपरागत पत्थरों की राड़ खेलने एकत्रित होते है । साथ ही हजारों लोग इस अनूठे खेल के दर्शनार्थी बनते है । पहले यहां बड़े उत्साह के साथ गैर नृत्य खेला जाता है और गैर के खत्म होने के बाद सभी लोग राड़ खेलने लगते है । परंपरागत परिधान पहने पैरों में घुंघरू, हाथों में ढाल, गोफण एवं सिर पर साफा बांधे राड़ खेलने वाले दो दलों के लोग जब एक दूसरे पर होरिया की चित्कार लगाते हुए गोफणों से पत्थरों की बोछार शुरु करते है, तो हजारों दर्शक सुरक्षित स्थानों पर बैठकर इस रोमांचक खेल का आनंद लेते है । राड़ खेलने व देखने भीलूड़ा सहित आसपास के गांवों व डूंगरपुर व बांसवाड़ा जिलों से हजारों लोग इकट्ठा होते है।