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कांशीराम को लेकर राहुल गांधी का बयान: दलित वोट बैंक साधने की कोशिश या नई राजनीति?

कांशीराम को लेकर राहुल गांधी का बयान: दलित वोट बैंक साधने की कोशिश या नई राजनीति?

नई दिल्ली: बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संस्थापक कांशीराम की जयंती पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए सामाजिक न्याय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को सराहा। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि कांशीराम दलितों, वंचितों और शोषितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले महान नेता थे, और उनका संघर्ष कांग्रेस के लिए मार्गदर्शन करता रहेगा।

राहुल गांधी का यह बयान महज श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी राजनीतिक रणनीति भी है। उत्तर प्रदेश में लगातार कमजोर होती बसपा के दलित वोटों पर अब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) की नजर है। कांग्रेस इस समय अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है और उसे हालिया चुनावों में कई करारी हार मिली है। इसलिए पार्टी अब दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों (डीपीए) के मुद्दों को जोर-शोर से उठा रही है।

दलित वोट बैंक पर कांग्रेस की नजर
उत्तर प्रदेश में बसपा की गिरती पकड़ ने दलित वोटों को लेकर कांग्रेस और सपा को अवसर दे दिया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव जहां पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फार्मूले को आगे बढ़ा रहे हैं, वहीं राहुल गांधी संविधान और आरक्षण के मुद्दे को भुनाने में लगे हैं। उनका कहना है कि बीजेपी संविधान की समीक्षा कर दलितों और पिछड़ों का आरक्षण खत्म कर सकती है।

लोकसभा चुनाव 2024 में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में 43 सीटें जीतकर बीजेपी को बड़ा झटका दिया था। इस चुनाव में सपा को करीब 33%, कांग्रेस को 10% और बसपा को 10% वोट मिले थे। अगर बसपा भी इस गठबंधन का हिस्सा होती, तो बीजेपी को और बड़ा नुकसान होता। इसी संभावना को देखते हुए कांग्रेस लगातार दलित मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है और कांशीराम जैसे बड़े दलित नेता की विरासत को सम्मान देने का प्रयास कर रही है।

क्या बसपा के वोट कांग्रेस की तरफ जाएंगे?
राहुल गांधी ने हाल ही में बसपा पर बीजेपी की ‘बी टीम’ होने का आरोप लगाया था, जिससे मायावती और कांग्रेस के बीच दूरियां बढ़ गई थीं। इसके बावजूद कांग्रेस लगातार दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है। हालांकि, सवाल यह है कि क्या बसपा समर्थक कांग्रेस की ओर रुख करेंगे?

विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के लिए यह आसान नहीं होगा, क्योंकि मायावती का दलित वोट बैंक अब भी काफी हद तक उनके साथ बना हुआ है। लेकिन अगर कांग्रेस और सपा का गठबंधन इसी तरह आगे बढ़ता है और दलितों को यह भरोसा दिलाने में सफल होता है कि वे उनके अधिकारों के लिए लड़ेंगे, तो भविष्य में दलित वोटों का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस की ओर शिफ्ट हो सकता है।

निष्कर्ष: राहुल गांधी द्वारा कांशीराम को सम्मान देने का उद्देश्य सिर्फ श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि दलित वोट बैंक को कांग्रेस के पाले में लाने की कोशिश है। यूपी की राजनीति में इस बयान का क्या असर पड़ेगा, यह आगामी चुनावों में साफ हो जाएगा।

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