राहुल गांधी की AAPDA पॉलिटिक्स: कर्पूरी मॉडल से नीतीश को मात देने की रणनीति

बिहार में सियासी तपिश लगातार तेज होती जा रही है और इसी बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ‘AAPDA पॉलिटिक्स’ सुर्खियों में है। बिहार की 2025 विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए राहुल गांधी अब अतिपिछड़ा, पसमांदा और दलित-आदिवासी वर्ग (AAPDA) को एकजुट कर नीतीश कुमार को कड़ी टक्कर देने की तैयारी में हैं। 7 अप्रैल को पटना में आयोजित ‘संविधान सुरक्षा सम्मेलन’ में राहुल गांधी तीसरी बार बिहार का दौरा कर सामाजिक न्याय का एजेंडा मजबूत करते नजर आएंगे।

कांग्रेस ने बिहार में संगठन को नये सिरे से खड़ा करने के लिए दलित समाज से आने वाले राजेश कुमार को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। राहुल गांधी का फोकस साफ है—AAPDA वोट बैंक को साधकर सामाजिक न्याय की राजनीति को धार देना। जातिगत जनगणना और आरक्षण की सीमा तोड़ने जैसे मुद्दों के जरिए कांग्रेस सीधे OBC, खासकर अतिपिछड़ी जातियों के हक की बात कर रही है।

कर्पूरी ठाकुर के सामाजिक न्याय मॉडल से प्रेरित होकर कांग्रेस अब उसी राह पर चलने की तैयारी में है। कर्पूरी मॉडल में अतिपिछड़ों को सत्ता में हिस्सेदारी और सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाने की जो कोशिश थी, अब कांग्रेस उसी को दोहराकर नीतीश कुमार के गढ़ में सेंधमारी करना चाहती है। कांग्रेस नेता सुशील पासी ने साफ कहा है कि नीतीश सरकार ने 36% अतिपिछड़ी आबादी को न तो आरक्षण में उनका हक दिया और न ही राजनीतिक हिस्सेदारी।

बिहार की राजनीति में अतिपिछड़ी जातियां ‘किंगमेकर’ हैं। इन जातियों की कुल संख्या करीब 114 है, जिनमें लुहार, कुम्हार, कहांर, मल्लाह, बढ़ई, सुनार जैसी जातियां शामिल हैं। ये जातियां अपने दम पर भले निर्णायक न हों, लेकिन दूसरे वोटबैंक के साथ जुड़कर ये सत्ता का खेल पलट सकती हैं। वर्तमान विधानसभा में इनका प्रतिनिधित्व महज 7% है, जो उनकी आबादी के अनुपात में बेहद कम है। यही वजह है कि कांग्रेस इन समुदायों को उनके सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हक की लड़ाई का भरोसा दिलाकर अपने पक्ष में करना चाहती है।

राहुल गांधी का ये भी प्रयास है कि पसमांदा मुस्लिम और दलित समुदाय को भी AAPDA पॉलिटिक्स के तहत एक छतरी के नीचे लाया जाए। उन्होंने पहले ही दलित प्रतीक जगलाल चौधरी की जयंती में शिरकत और पसमांदा नेता अली अनवर अंसारी को कांग्रेस से जोड़कर अपने इरादे साफ कर दिए हैं।

कांग्रेस का यह दांव बीजेपी और जेडीयू दोनों के समीकरण को प्रभावित कर सकता है। खासकर जब बीजेपी और जेडीयू का गठबंधन एक ओर है और कांग्रेस अपने बलबूते सामाजिक न्याय का नया एजेंडा सेट कर रही है। राहुल गांधी की रणनीति है कि AAPDA वोट बैंक को एकजुट कर नीतीश कुमार के पारंपरिक आधार को तोड़ा जाए और कांग्रेस को बिहार की राजनीति में दोबारा मजबूत स्थान दिलाया जाए।

बिहार में सत्ता की चाबी अब सवर्ण नहीं, बल्कि वही 36% अतिपिछड़े वर्ग के हाथ में है, जो वर्षों से प्रतिनिधित्व से वंचित रहे हैं। राहुल गांधी की AAPDA पॉलिटिक्स इसी दिशा में एक बड़ा सियासी कदम है, जो 2025 में बिहार की राजनीति का गेमचेंजर साबित हो सकता है।

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