राज्यसभा सांसद और समाजसेविका सुधा मूर्ति ने प्रयागराज के महाकुंभ में पहुंचकर त्रिवेणी संगम पर डुबकी लगाई और पितरों का तर्पण किया। प्रसिद्ध उद्योगपति और इंफोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति की पत्नी सुधा मूर्ति अपने सरल और सादगीपूर्ण जीवन के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने महाकुंभ को “सर्वोत्तम तीर्थराज” बताया और इसे एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव कहा।
पितरों के तर्पण का महत्व
हिंदू धर्म में पितरों के निमित्त तर्पण का विशेष महत्व है। ज्योतिषाचार्य अनीष व्यास के अनुसार, मृत्यु के बाद यदि पितरों का तर्पण न किया जाए तो उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलती। तर्पण पितरों की मोक्ष प्राप्ति, उनका आशीर्वाद पाने और पितृ दोष से मुक्ति के लिए अत्यंत आवश्यक माना गया है। यह प्रक्रिया परिवार के सभी सदस्यों के लिए पुण्यदायी और लाभकारी होती है।
महाकुंभ में तर्पण का विशेष महत्व
महाकुंभ 144 वर्षों में एक बार आयोजित होने वाला धार्मिक और आध्यात्मिक आयोजन है। मान्यता है कि प्रयागराज के संगम तट पर गंगा स्नान के बाद पितरों का तर्पण करना अत्यधिक फलदायी होता है। इससे न केवल पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है, बल्कि तर्पण करने वाले व्यक्ति को भी अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। गंगा स्नान के बाद पितरों को गंगाजल अर्पित करना और प्रार्थना करना जीवन में सुख-शांति लाने वाला माना गया है।
पितरों का आशीर्वाद और मोक्ष प्राप्ति
तर्पण के माध्यम से पितरों को शांति और मोक्ष प्राप्त होता है। धार्मिक मान्यता है कि इससे परिवार पर पितरों की कृपा बनी रहती है और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है। महाकुंभ में किया गया तर्पण सामान्य तर्पण से अधिक पुण्यकारी माना गया है।
सुधा मूर्ति का संदेश
सुधा मूर्ति ने महाकुंभ को एक अनमोल अवसर बताते हुए लोगों से आह्वान किया कि वे इस पवित्र आयोजन में भाग लेकर अपने जीवन को धन्य बनाएं। उन्होंने महाकुंभ को भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपरा का अद्भुत संगम बताया।




