नेशनल कन्फेडरेशन ऑफ ओबीसी इम्प्लॉइज वेलफेयर एसोसिएशन (NCOBC) के एक प्रतिनिधिमंडल ने संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात की। इस दौरान केंद्र सरकार और सार्वजनिक उपक्रमों में ओबीसी कर्मचारियों के प्रतिनिधित्व और मान्यता से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा हुई। यह मुलाकात तेलंगाना में ओबीसी आरक्षण बढ़ाने के फैसले के बाद काफी अहम मानी जा रही है।
तेलंगाना में ओबीसी आरक्षण बढ़ाने के फैसले के बाद हुई मुलाकात
17 मार्च को तेलंगाना विधानसभा ने शैक्षणिक संस्थानों, सरकारी नौकरियों और स्थानीय निकायों के चुनावों में ओबीसी समुदाय के लिए आरक्षण को 42% तक बढ़ाने का निर्णय लिया था। राहुल गांधी ने इस फैसले की सराहना करते हुए इसे कांग्रेस सरकार द्वारा किए गए एक महत्वपूर्ण वादे की पूर्ति बताया था। उन्होंने कहा था कि तेलंगाना सरकार ने वैज्ञानिक जाति सर्वेक्षण के आधार पर ओबीसी समुदाय की वास्तविक जनसंख्या को मान्यता दी है, जिससे उनकी शिक्षा, रोजगार और राजनीति में समान भागीदारी सुनिश्चित की जा सके।
राहुल गांधी ने इस कदम को “सामाजिक न्याय में क्रांतिकारी बदलाव” करार दिया था और कहा था कि इससे आरक्षण की 50% सीमा टूट गई है। उन्होंने यह भी बताया कि तेलंगाना सरकार ने जाति सर्वेक्षण के आंकड़ों का विश्लेषण करने के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समूह गठित किया है, जो नीतियों को बेहतर बनाने में मदद करेगा।
ओबीसी कर्मचारियों के संगठन ने रखी अपनी मांगें
NCOBC के प्रतिनिधिमंडल ने राहुल गांधी के सामने ओबीसी कर्मचारियों की विभिन्न समस्याओं को रखा। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र में ओबीसी कर्मचारियों की घटती भागीदारी, प्रमोशन में आरक्षण की कमी और सरकारी नीतियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिलने जैसी समस्याएं शामिल थीं। संगठन ने मांग की कि केंद्र सरकार और सार्वजनिक उपक्रमों में ओबीसी कर्मचारियों के लिए आरक्षण और प्रतिनिधित्व को लेकर ठोस नीतियां बनाई जाएं।
कांग्रेस की ओबीसी रणनीति
कांग्रेस अब हिंदुत्व की राजनीति के मुकाबले जातिगत समीकरणों पर ध्यान केंद्रित कर रही है। पार्टी की रणनीति ओबीसी, एससी, एसटी और अल्पसंख्यकों को साथ लाकर एक मजबूत सामाजिक गठबंधन बनाने की है। हाल ही में बिहार में भूमिहार नेता अखिलेश प्रसाद सिंह को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर दलित नेता राजेश राम को कमान सौंपना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
तेलंगाना में ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का कांग्रेस का कदम देशभर में इस वर्ग को साधने की एक बड़ी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस की यह नई रणनीति आगामी चुनावों में उसे राजनीतिक बढ़त दिला पाएगी या नहीं।




