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बसंत पंचमी से शुरू होगी खप्पर तपस्या, 350 साधु करेंगे 16 घंटे का कठिन तप

बसंत पंचमी से शुरू होगी खप्पर तपस्या, 350 साधु करेंगे 16 घंटे का कठिन तप

प्रयागराज, महाकुंभ 2025 में बसंत पंचमी के दिन से सबसे कठिन तपस्या – खप्पर तपस्या शुरू होने जा रही है। इस तपस्या में 350 से अधिक साधु रोजाना 6 से 16 घंटे तक कठोर साधना करेंगे। यह तपस्या वैष्णव परंपरा के अंतर्गत आती है और इसकी प्रक्रिया अखाड़ों और संत समाज में साधुओं की वरिष्ठता तय करने में अहम भूमिका निभाती है।

18 वर्षों की कठिन तपस्या का अंतिम चरण
महाकुंभ में कई साधक अपनी आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत पंच धूना साधना से करते हैं, जो तपस्या का प्रारंभिक चरण होता है। इसके बाद सप्त, द्वादश, चौरासी और कोटि श्रेणी की तपस्या आती है। खप्पर श्रेणी इस श्रृंखला की सबसे कठिन और अंतिम तपस्या होती है। इसे पूरा करने में 18 साल लगते हैं।

कैसे होती है खप्पर तपस्या?

  • इस साधना में साधक के सिर के ऊपर एक मिट्टी का घड़ा (खप्पर) रखा जाता है, जिसमें निरंतर अग्नि जलती रहती है।
  • साधु को इस तपस्या में 6 से 16 घंटे तक अग्नि की आंच सहन करनी होती है।
  • यह कठिन तपस्या बसंत पंचमी से गंगा दशहरा तक (लगभग 3 महीने) जारी रहती है।
  • तपस्या के दौरान साधक निराजली (बिना जल ग्रहण किए) व्रत रखते हैं और संकल्पपूर्वक तप में लीन रहते हैं।
  • खप्पर श्रेणी की तपस्या पूरी होने पर साधु को अखाड़ों में वरिष्ठ संत का दर्जा प्राप्त होता है।

प्रयागराज के अखाड़ों में तैयारियां शुरू
महाकुंभ के मुख्य स्थलों खाक चौक, दिगंबर अखाड़ा, निर्मोही अखाड़ा और निर्वाणी अखाड़ा में खप्पर तपस्या के लिए तैयारियां जोरों पर हैं। दिगंबर अखाड़े के संत सीताराम दास के अनुसार, यह तपस्या वैष्णव परंपरा के अंतर्गत की जाती है और अग्नि साधना का चरम रूप मानी जाती है।

कई संत दोबारा करते हैं खप्पर तपस्या
इस कठिन तपस्या को पूर्ण करने के बाद भी कुछ साधु दोबारा इसे शुरू करते हैं ताकि वे अधिक आध्यात्मिक शक्ति और संत समाज में उच्च स्थान प्राप्त कर सकें। कई महापुरुषों ने इसी तपस्या से अपनी साधना को सिद्ध किया है।

धार्मिक मान्यता और महत्व
खप्पर तपस्या का उल्लेख कई धर्मशास्त्रों और पुराणों में मिलता है। यह तपस्या मानव देह की सीमाओं को तोड़कर आध्यात्मिक ऊर्जा को जागृत करने का एक तरीका है। ऐसी मान्यता है कि जो साधु यह कठिन तपस्या पूर्ण कर लेते हैं, वे ईश्वरीय शक्ति प्राप्त कर समाज के मार्गदर्शक बनते हैं।

प्रयागराज महाकुंभ में इस तपस्या का साक्षी बनने के लिए लाखों श्रद्धालु जुटेंगे। बसंत पंचमी से शुरू होकर गंगा दशहरा तक चलने वाली यह कठिन साधना संत समाज और भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक आयोजन होने जा रही है।

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