बिहार की राजनीति में 2025 का विधानसभा चुनाव पहले से ही गर्मा चुका है। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता तेजस्वी यादव सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनके सामने कई सियासी चुनौतियां खड़ी हैं। एक ओर एनडीए का मजबूत गठबंधन उन्हें घेर रहा है, तो दूसरी ओर असदुद्दीन ओवैसी, प्रशांत किशोर (पीके) और कांग्रेस ने भी उनकी राह मुश्किल बना दी है। सवाल यह है कि क्या तेजस्वी इस चक्रव्यूह को भेद पाएंगे या फिर सत्ता की दौड़ में पिछड़ जाएंगे?
एनडीए का मजबूत किला
तेजस्वी यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती नीतीश कुमार की अगुवाई वाला एनडीए गठबंधन है, जिसमें जेडीयू, बीजेपी, लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी), हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक जनता दल शामिल हैं। यह गठबंधन एक मजबूत जातीय और क्षेत्रीय समीकरण के साथ चुनाव में उतरेगा।
एनडीए लगातार तेजस्वी यादव को उनके पिता लालू यादव के शासनकाल की याद दिलाकर घेरता है। ‘जंगलराज’ और ‘भ्रष्टाचार’ जैसे मुद्दों को उठाकर विपक्ष तेजस्वी की छवि खराब करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में तेजस्वी को अपने नेतृत्व को साबित करने और जनता को यह भरोसा दिलाने की जरूरत होगी कि वे बिहार को नई दिशा में ले जाने के लिए सक्षम हैं।
ओवैसी से मुस्लिम वोट बैंक पर संकट
बिहार की राजनीति में मुस्लिम समुदाय आरजेडी का परंपरागत वोट बैंक रहा है, लेकिन असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM इसे कमजोर करने की कोशिश कर रही है। 2020 के चुनाव में सीमांचल क्षेत्र में पांच सीटें जीतकर ओवैसी ने साबित कर दिया कि वे इस इलाके में मजबूत उपस्थिति रखते हैं।
ओवैसी इस बार दो दर्जन से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं, जिससे आरजेडी के लिए मुस्लिम वोटों में सेंध लगने का खतरा है। अगर सीमांचल में मुस्लिम वोट बंटता है, तो इसका सीधा फायदा एनडीए को मिलेगा। तेजस्वी के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे मुस्लिम समुदाय को अपने पाले में बनाए रखें और ओवैसी की बढ़ती पैठ को रोकें।
प्रशांत किशोर का सियासी दांव
राजनीतिक रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर (पीके) ने ‘जन सुराज’ अभियान के तहत बिहार में अपनी जमीनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है। वे लगातार तेजस्वी यादव की आलोचना कर रहे हैं और उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठा रहे हैं।
पीके का मुख्य फोकस दलित, मुस्लिम और अति पिछड़ा वर्ग के वोटरों पर है, जो आरजेडी का पारंपरिक आधार माना जाता है। अगर पीके इस वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब होते हैं, तो तेजस्वी की राह और मुश्किल हो सकती है। तेजस्वी को न सिर्फ पीके की रणनीति का जवाब देना होगा, बल्कि जनता को यह समझाना होगा कि उनकी पार्टी ही इन वर्गों की असली हितैषी है।
कांग्रेस का बदला हुआ रुख
आरजेडी और कांग्रेस का गठबंधन लंबे समय से चला आ रहा है, लेकिन इस बार कांग्रेस के तेवर बदले हुए नजर आ रहे हैं। कांग्रेस अब आरजेडी के साए से निकलकर बिहार में अपनी स्वतंत्र सियासी पहचान बनाने की कोशिश कर रही है।
सीट शेयरिंग को लेकर भी कांग्रेस और आरजेडी के बीच तनातनी देखी जा रही है। कांग्रेस चाहती है कि लोकसभा चुनाव के आधार पर सीटों का बंटवारा हो, लेकिन आरजेडी इसके लिए तैयार नहीं है। इसके अलावा, कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार की बिहार में बढ़ती सक्रियता आरजेडी के लिए चिंता का कारण बन रही है।
क्या तेजस्वी तोड़ पाएंगे चक्रव्यूह?
तेजस्वी यादव के सामने 2025 के चुनाव में एक साथ कई चुनौतियां हैं। एक तरफ एनडीए की मजबूत रणनीति है, तो दूसरी तरफ ओवैसी, पीके और कांग्रेस का सियासी दांव। अगर तेजस्वी को इस चक्रव्यूह से बाहर निकलना है, तो उन्हें जातीय और सामाजिक समीकरण को साधने के साथ-साथ गठबंधन में समन्वय बनाना होगा।
अगर तेजस्वी यादव अपनी रणनीति सही तरीके से बनाते हैं और विरोधियों के हमलों का करारा जवाब देते हैं, तो बिहार की सत्ता उनके करीब आ सकती है। लेकिन अगर वे इन चुनौतियों का सामना करने में विफल रहे, तो 2025 में उनकी सत्ता की राह और मुश्किल हो जाएगी।




