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योगी आदित्यनाथ की सुरक्षा पर हर साल कितना होता है खर्च? जानिए केंद्र या राज्य कौन उठाता है जिम्मेदारी

योगी आदित्यनाथ की सुरक्षा पर हर साल कितना होता है खर्च? जानिए केंद्र या राज्य कौन उठाता है जिम्मेदारी

उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा और राजनीतिक रूप से सबसे संवेदनशील राज्य माना जाता है। ऐसे में राज्य के मुख्यमंत्री की सुरक्षा सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह शासन, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक निरंतरता से सीधे तौर पर जुड़ा मामला बन जाती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था अक्सर लोगों के बीच चर्चा का विषय रहती है। इसी के साथ यह सवाल भी उठता है कि आखिर इस सुरक्षा कवच पर हर साल कितना खर्च होता है और इस खर्च की जिम्मेदारी केंद्र सरकार उठाती है या राज्य सरकार।


किस श्रेणी की सुरक्षा में रहते हैं योगी आदित्यनाथ

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उन चुनिंदा नेताओं में शामिल हैं, जिन्हें Z+ श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त है। यह सुरक्षा श्रेणी देश में उच्चतम स्तर की सुरक्षा व्यवस्थाओं में से एक मानी जाती है।
Z+ सुरक्षा के तहत मुख्यमंत्री के साथ हर समय विशेष रूप से प्रशिक्षित कमांडो तैनात रहते हैं। इसके अलावा उनके काफिले में बुलेटप्रूफ वाहन, अत्याधुनिक हथियार, जैमर सिस्टम, निगरानी उपकरण और 24 घंटे क्लोज प्रोटेक्शन टीम मौजूद रहती है।

यह सुरक्षा स्थायी नहीं होती, बल्कि खुफिया एजेंसियों द्वारा समय-समय पर किए जाने वाले थ्रेट परसेप्शन असेसमेंट के आधार पर इसमें बदलाव किया जाता है। खतरे के स्तर में इजाफा होने पर सुरक्षा को और मजबूत किया जा सकता है।


सुरक्षा पर हर साल कितना आता है खर्च

सरकारी बजट दस्तावेजों, विधानसभा में पूछे गए सवालों और आरटीआई के जरिए सामने आए अनुमानों के अनुसार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सुरक्षा पर हर साल करीब 25 से 30 करोड़ रुपये का खर्च आता है।

इस खर्च में कई तरह की मदें शामिल होती हैं, जिनमें—

  • सुरक्षाकर्मियों और कमांडो का वेतन

  • विशेष प्रशिक्षण और सुरक्षा अभ्यास

  • हथियार और गोला-बारूद

  • बुलेटप्रूफ वाहनों की खरीद और रखरखाव

  • ईंधन और यात्रा खर्च

  • संचार प्रणाली, जैमर और अन्य तकनीकी उपकरण

  • लॉजिस्टिक और प्रशासनिक सपोर्ट

सरकार आमतौर पर किसी एक व्यक्ति की सुरक्षा पर होने वाले खर्च का अलग से विस्तृत सार्वजनिक ब्योरा जारी नहीं करती, लेकिन उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर यह अनुमान लगाया जाता है।


खर्च की जिम्मेदारी किसकी—केंद्र या राज्य?

अक्सर यह भ्रम रहता है कि Z+ सुरक्षा मिलने पर पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाती है। लेकिन संवैधानिक व्यवस्था इसके उलट है।
किसी राज्य के मुख्यमंत्री की सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है।

यदि मुख्यमंत्री की सुरक्षा में केंद्रीय बलों जैसे एनएसजी या सीआरपीएफ की तैनाती की जाती है, तब भी उसका खर्च संबंधित राज्य सरकार ही केंद्र को वहन करती है। यानी सुरक्षा बल भले ही केंद्र के हों, भुगतान राज्य के खजाने से किया जाता है। उत्तर प्रदेश सरकार भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सुरक्षा से जुड़ा अधिकांश खर्च स्वयं उठाती है।


इतनी कड़ी सुरक्षा क्यों मानी जाती है जरूरी

सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, योगी आदित्यनाथ को उनकी राजनीतिक भूमिका, प्रशासनिक फैसलों और सार्वजनिक गतिविधियों के कारण समय-समय पर सुरक्षा संबंधी खतरे बताए जाते रहे हैं।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में मुख्यमंत्री का पद न सिर्फ राजनीतिक बल्कि प्रशासनिक रूप से भी अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में किसी भी तरह की सुरक्षा चूक का असर पूरे राज्य की कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक स्थिरता पर पड़ सकता है।

इसी वजह से सुरक्षा एजेंसियां किसी भी तरह का जोखिम लेने से बचती हैं और हालात के अनुसार सुरक्षा व्यवस्था को लगातार अपडेट करती रहती हैं।


सुरक्षा खर्च पर सवाल क्यों उठते हैं

जब सुरक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च होने की बात सामने आती है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं कि क्या यह बोझ राज्य के खजाने पर भारी नहीं पड़ता। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की सुरक्षा को केवल खर्च के नजरिये से देखना उचित नहीं है।

मुख्यमंत्री की सुरक्षा सीधे तौर पर शासन की निरंतरता, निर्णय प्रक्रिया और राज्य की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी होती है। इसलिए इसे आवश्यक प्रशासनिक खर्च माना जाता है।

कुल मिलाकर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सुरक्षा पर हर साल होने वाला खर्च बड़ा जरूर है, लेकिन इसे केवल आर्थिक बोझ के रूप में नहीं देखा जाता। यह खर्च राज्य की सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक स्थिरता और संवैधानिक जिम्मेदारियों का हिस्सा है। यही वजह है कि केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर इसे गंभीरता से लिया जाता है और सुरक्षा में किसी भी तरह की ढील नहीं बरती जाती।

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