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नई दिल्ली, 7 अप्रैल 2021

सुप्रीम कोर्ट ने कर अधिकारियों द्वारा वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करने के तरीके के खिलाफ तीखी टिप्पणी करते हुए बुधवार को कहा कि करदाता सभी व्यवसायों को धोखाधड़ी के रूप में नहीं देख सकते हैं। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और एमआर शाह की पीठ ने कहा, “संसद ने जीएसटी को नागरिक-अनुकूल कर संरचना बनाने का इरादा किया था..जिस तरीके से इस अधिनियम को हमारे देश में लागू किया जा रहा है, उससे इसका उद्देश्य खो गया है।”

हिमाचल प्रदेश जीएसटी अधिनियम के तहत अल्पकालिक कुर्की (प्रोविजनल अटैचमेंट) के अधिकारों को चुनौती देने वाली एक याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणियां की। यह याचिका राधा कृष्ण इंडस्ट्रीज की ओर से दायर की गई थी। कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पुनीत बाली और अधिवक्ता सुरजीत भादू अपना रक्षा रख रहे थे।

बहरहाल, सुनवाई के दौरान पीठ ने उल्लेख किया कि कर अधिकारी संपत्ति को कुर्क नहीं कर सकते हैं और यह एक ‘पूर्व-नियोजित प्रहार’ नहीं हो सकता। पीठ ने अल्पकालिक कुर्की (प्रोविजनल अटैचमेंट) को ड्राकोनियन (बेहद कठोर) बताया।

कंपनी ने पीठ के समक्ष दलील दी कि धारा 83 के तहत कुर्की का अधिकार ड्राकोनियन (बेहद कठोर) है।

इस धारा के अनुसार, कर कार्यवाही की पेंडेंसी के दौरान, विभाग अल्पकालिक कुर्की के तौर पर किसी भी संपत्ति (बैंक खातों और प्राप्य खातों सहित) को कुर्क कर सकता है। कर अधिकारी इसे अदालतों द्वारा बाद के फैसले की संतुष्टि की गारंटी के लिए एक उपाय के रूप में उपयोग करते हैं।

पीठ ने कहा कि राजस्व के हितों की रक्षा और वास्तविक व्यवसायों की रक्षा के बीच एक संतुलन बनाए रखना होगा। इसने कहा, “देश को इस कर संस्कृति से बाहर आने की जरूरत है कि सभी व्यवसाय धोखेबाज हैं..वह भी तब जब 12 करोड़ रुपये का कर चुकाया गया है। आप केवल इस आधार पर संपत्ति की कुर्की प्रारंभ नहीं कर सकते कि कुछ करों का भुगतान करना अभी बाकी है।”