Gyanesh Kumar : मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार एक बार फिर चर्चा में हैं। वजह है चुनाव आयोग के भीतर सामने आईं वे आपत्तियां, जिन्हें निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दर्ज किया। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति दर्ज की। ये मामले SIR, नए मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन के लिए Form-6 में बदलाव, मतदाता सूची से नाम जोड़ने-हटाने और चुनावी डेटाबेस तक पहुंच जैसे मुद्दों से जुड़े बताए गए हैं। चुनाव आयोग ने हालांकि इन घटनाओं को अलग तरीके से देखा है। आयोग का कहना है कि बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय आना सामान्य है और पिछले एक साल में लिए गए अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ 14 आपत्तियों का नहीं है, बल्कि यह समझना भी जरूरी है कि ज्ञानेश कुमार कौन हैं, उनका प्रशासनिक करियर किन महत्वपूर्ण घटनाक्रमों से जुड़ा रहा और चुनाव आयोग के भीतर इस समय विवाद किस मुद्दे पर है?
कौन हैं ज्ञानेश कुमार?
ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के केरल कैडर के IAS अधिकारी हैं। उनका प्रशासनिक करियर राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार के कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों तक फैला रहा है। उन्होंने IIT कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग में B.Tech किया। इसके अलावा उन्होंने बिजनेस फाइनेंस और पर्यावरण अर्थशास्त्र की पढ़ाई भी की है। चुनाव आयोग की आधिकारिक प्रोफाइल के मुताबिक, उन्होंने केरल सरकार में कई प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालने के बाद केंद्र में रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, संसदीय कार्य मंत्रालय और सहकारिता मंत्रालय में काम किया। केंद्र सरकार में वह गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव और अतिरिक्त सचिव जैसे पदों पर रहे। बाद में वह संसदीय कार्य मंत्रालय के सचिव और फिर सहकारिता मंत्रालय के सचिव बने। जनवरी 2024 में वह सहकारिता सचिव के पद से रिटायर हुए और मार्च 2024 में उन्हें चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। इसके बाद 19 फरवरी 2025 को उन्होंने देश के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभाला।

कश्मीर से क्या है ज्ञानेश कुमार का कनेक्शन?
ज्ञानेश कुमार के करियर का एक अहम पड़ाव जम्मू-कश्मीर से जुड़े मामलों का रहा है। गृह मंत्रालय में रहते हुए वह जम्मू-कश्मीर डिविजन से जुड़े काम देख रहे थे। 2019 में अनुच्छेद 370 से जुड़े बदलाव और जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन की प्रक्रिया के दौरान वह गृह मंत्रालय में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी पर थे। रिपोर्टों के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक तैयार करने की प्रक्रिया में भी उनकी भूमिका रही। इसके बाद जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में पुनर्गठित किया गया। इसलिए जब भी ज्ञानेश कुमार के प्रशासनिक करियर की चर्चा होती है, 2019 का जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन उनके करियर के महत्वपूर्ण अध्यायों में गिना जाता है।
अयोध्या और राम मंदिर से क्या संबंध रहा?
ज्ञानेश कुमार के करियर का दूसरा महत्वपूर्ण अध्याय अयोध्या से जुड़ा रहा। सुप्रीम कोर्ट के 2019 के अयोध्या फैसले के बाद केंद्र सरकार ने राम जन्मभूमि से संबंधित मामलों के लिए गृह मंत्रालय में एक अलग व्यवस्था बनाई थी। इस डेस्क की जिम्मेदारी अतिरिक्त सचिव ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में थी। वह श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन से जुड़ी सरकारी प्रक्रिया में भी शामिल रहे। 2020 में गठित ट्रस्ट में गृह मंत्रालय की ओर से ज्ञानेश कुमार को प्रतिनिधि के तौर पर शामिल किया गया था। इसलिए उनके प्रशासनिक सफर में दो बड़े अध्याय खास तौर पर सामने आते हैं। 2019 का जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन और उसके बाद अयोध्या से जुड़ी सरकारी प्रक्रिया।
CEC बनने से पहले उनका करियर कैसे आगे बढ़ा?
गृह मंत्रालय के बाद ज्ञानेश कुमार संसदीय कार्य मंत्रालय के सचिव बने। इसके बाद उन्होंने सहकारिता मंत्रालय के सचिव के तौर पर काम किया। सहकारिता मंत्रालय में उनके कार्यकाल के दौरान Multi-State Cooperative Societies से जुड़े कानून में संशोधन समेत कई नीतिगत काम हुए। जनवरी 2024 में रिटायर होने के कुछ ही समय बाद उन्हें चुनाव आयोग में निर्वाचन आयुक्त बनाया गया। मार्च 2024 में निर्वाचन आयुक्त बनने के बाद उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया में आयोग के सदस्य के तौर पर काम किया। इसके करीब एक साल बाद वह मुख्य चुनाव आयुक्त बने। उनका कार्यकाल जनवरी 2029 तक निर्धारित है।

अब 14 आपत्तियों का विवाद क्या है?
यहीं से मौजूदा विवाद शुरू होता है। द इंडियन एक्सप्रेस की जांच के मुताबिक, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों या प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ मामलों में दोनों ने कहा कि फैसले उनकी जानकारी या सहमति के बिना लिए गए। इन आपत्तियों में SIR के दौरान मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने, नए मतदाताओं के Form-6 में बदलाव, मतदाता सूची के डेटा तक पहुंच और उसके IT सिस्टम के केंद्रीकरण जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं। दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने कुछ कदमों को “unauthorised” और “illegal” तक कहा, हालांकि ये उनके द्वारा दर्ज की गई आपत्तियों की भाषा है, किसी अदालत का निष्कर्ष नहीं।

Form-6 में बदलाव पर क्या आपत्ति थी?
Form-6 वह आवेदन है जिसके जरिए कोई व्यक्ति मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन करता है। रिपोर्ट के मुताबिक, SIR से जुड़े सवाल इस फॉर्म में जोड़े गए थे। इनमें आवेदक से यह जानकारी मांगी गई कि उसका, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में था या नहीं। रिपोर्ट के मुताबिक, निर्वाचन आयुक्त विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव पर सवाल उठाया था, जबकि सुखबीर सिंह संधू ने बाद में इसे हटाने की मांग की। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, आपत्ति यह थी कि इस तरह का बदलाव नियमों में जरूरी संशोधन के बिना नहीं किया जा सकता।
मतदाता डेटा को लेकर क्या सवाल उठे?
दूसरा बड़ा मुद्दा चुनावी डेटा के केंद्रीकरण से जुड़ा बताया गया है। चुनाव प्रक्रिया में स्थानीय स्तर पर Electoral Registration Officers यानी ERO की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने सवाल उठाया कि क्या मतदाता सूची से जुड़े IT सिस्टम में बदलाव के कारण स्थानीय अधिकारियों की भूमिका या डेटा तक उनकी पहुंच सीमित हो रही है। द इंडियन एक्सप्रेस ने गोवा के एक मामले का भी उल्लेख किया, जहां ERO द्वारा 97 लोगों को पात्र मानने के बावजूद सॉफ्टवेयर में उन फैसलों को दर्ज करने में समस्या आने की बात कही गई। हालांकि, इस पूरे मुद्दे पर चुनाव आयोग की आधिकारिक स्थिति और तकनीकी प्रक्रिया को भी अलग से समझना जरूरी है।

यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट इसे आयोग के भीतर गंभीर मतभेद के तौर पर पेश करती है, क्योंकि आपत्तियां लिखित रिकॉर्ड पर दर्ज की गई थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने कुछ मुद्दों पर कैबिनेट सचिव तक को पत्र लिखा। लेकिन चुनाव आयोग का पक्ष अलग है। आयोग ने कहा है कि तीन सदस्यीय संस्था में चर्चा के दौरान अलग-अलग राय होना असामान्य नहीं है और पिछले एक साल में लिए गए अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। इसलिए फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे दोनों पक्षों के दावों और दस्तावेजी आपत्तियों के बीच का विवाद समझना ज्यादा सटीक होगा, न कि किसी अंतिम निष्कर्ष के रूप में।
विपक्ष क्यों मांग रहा है ज्ञानेश कुमार पर कार्रवाई?
रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों के कई नेताओं ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई और उनके इस्तीफे की मांग की। कांग्रेस ने 25 सितंबर को देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन भी किया और CEC के इस्तीफे की मांग की। यह विपक्ष का राजनीतिक रुख है; इसे चुनाव आयोग के खिलाफ किसी न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता। विवाद का राजनीतिक पहलू इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि SIR पहले से ही मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया को लेकर विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच टकराव का विषय रहा है। ऐसे में आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों ने इस बहस को एक नया आयाम दे दिया है।

ज्ञानेश कुमार का प्रशासनिक सफर देखें तो वह केरल कैडर के IAS अधिकारी से केंद्र सरकार के वरिष्ठ नौकरशाह और फिर देश के मुख्य चुनाव आयुक्त तक पहुंचे हैं। उनके करियर में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन, अयोध्या से जुड़ी सरकारी प्रक्रिया, संसदीय कार्य और सहकारिता जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र रहे हैं। अब उनके CEC कार्यकाल में SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों को लेकर चुनाव आयोग के अंदर दर्ज 14 आपत्तियां चर्चा का केंद्र हैं। एक तरफ दो निर्वाचन आयुक्तों की लिखित आपत्तियां हैं, दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। इसलिए फिलहाल इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि विवाद चुनावी प्रक्रिया के संचालन और संस्थागत निर्णय लेने के तरीके को लेकर है, जबकि आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष अलग कानूनी या संवैधानिक प्रक्रिया से ही निकल सकता है।




