द फ्रंट डेस्क: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के सामने इस समय पार्टी के अस्तित्व और राजनीतिक पहचान से जुड़ा बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। पार्टी के भीतर दो गुट आमने-सामने हैं और मामला अब चुनाव आयोग तक पहुंच चुका है। आयोग ने फिलहाल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और पारंपरिक ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न को फ्रीज कर दिया है। इसके बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को अंतरिम तौर पर ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और फुटबॉल खिलाड़ी का चुनाव चिह्न दिया गया है, जबकि दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ और लिफाफा चुनाव चिह्न मिला है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या टीएमसी भी महाराष्ट्र की शिवसेना और एनसीपी की तरह पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर लंबी कानूनी और राजनीतिक लड़ाई में फंस सकती है? महाराष्ट्र में पार्टी टूटने के बाद नाम और चुनाव चिह्न को लेकर दोनों गुटों के बीच लंबी लड़ाई चली थी। अब टीएमसी के मामले में भी ऐसी ही स्थिति बनने की चर्चा हो रही है। इस पूरे विवाद के बीच ममता बनर्जी के सामने कौन-कौन से रास्ते हैं और उनकी पार्टी की आगे की राजनीतिक रणनीति क्या हो सकती है?
शिवसेना में क्या हुआ था?
महाराष्ट्र में शिवसेना के भीतर जून 2022 में बड़ा राजनीतिक विभाजन हुआ था। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायक उद्धव ठाकरे से अलग हो गए और इसके बाद महाराष्ट्र की तत्कालीन महा विकास अघाड़ी सरकार गिर गई। इसके बाद पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर दोनों गुटों के बीच विवाद चुनाव आयोग तक पहुंचा। फरवरी 2023 में आयोग ने शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और पारंपरिक धनुष-बाण चुनाव चिह्न दे दिया। उद्धव ठाकरे के गुट को अलग नाम ‘शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)’ और नया चुनाव चिह्न मशाल मिला। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल यह था कि पार्टी का वास्तविक प्रतिनिधित्व किस गुट के पास है। चुनाव आयोग के फैसले के बाद दोनों गुटों को अलग-अलग राजनीतिक पहचान के साथ आगे बढ़ना पड़ा और पुराने नाम-चिह्न को लेकर विवाद का एक बड़ा हिस्सा आयोग के फैसले से तय हुआ।
NCP में भी दो गुट बने और नाम-चिह्न पर हुआ फैसला
ऐसा ही विवाद जुलाई 2023 में एनसीपी में भी देखने को मिला। अजित पवार के नेतृत्व में पार्टी के कई विधायक शरद पवार से अलग हो गए और महाराष्ट्र की बीजेपी-शिंदे सरकार में शामिल हो गए। इसके बाद एनसीपी के नाम और चुनाव चिह्न पर अधिकार को लेकर दोनों गुटों के बीच विवाद शुरू हुआ और मामला चुनाव आयोग तक पहुंच गया। फरवरी 2024 में चुनाव आयोग ने अजित पवार के गुट को असली एनसीपी के रूप में मान्यता दी और पार्टी का नाम तथा चुनाव चिह्न उनके गुट के पास चला गया। इसके बाद शरद पवार के गुट को अलग नाम और चुनाव चिह्न के साथ आगे बढ़ना पड़ा। इस मामले ने भी दिखाया कि किसी राजनीतिक पार्टी में विभाजन के बाद नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चुनाव आयोग का फैसला दोनों गुटों की आगे की राजनीति पर बड़ा असर डाल सकता है।
अब TMC में क्या हो रहा है?
टीएमसी का मौजूदा विवाद भी पार्टी के नाम, संगठन और चुनाव चिह्न पर नियंत्रण से जुड़ा है। पार्टी में बगावत के बाद दो गुट आमने-सामने हैं और दोनों के बीच संगठन पर अधिकार को लेकर विवाद बढ़ गया है। चुनाव आयोग ने फिलहाल किसी एक गुट को मूल टीएमसी का अंतिम मालिक घोषित करने के बजाय दोनों पक्षों के लिए अंतरिम व्यवस्था की है। आयोग ने मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल और घास’ चिह्न को फ्रीज कर दिया। इसके बाद ममता बनर्जी वाले गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और फुटबॉल खिलाड़ी का चिह्न दिया गया। दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और लिफाफा चिह्न मिला है। यह व्यवस्था फिलहाल आगामी उपचुनावों के लिए अंतरिम तौर पर लागू की गई है। यानी अभी यह तय नहीं है कि भविष्य में टीएमसी का मूल नाम और चुनाव चिह्न किस गुट के पास रहेगा। विवाद का अंतिम समाधान कानूनी और चुनावी प्रक्रिया के आगे बढ़ने के बाद ही साफ हो सकेगा।
ममता बनर्जी के सामने अब पहला रास्ता क्या है?
ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने का रास्ता चुना है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है और आयोग के उस फैसले को चुनौती दी है जिसके तहत टीएमसी का मूल नाम और चुनाव चिह्न फ्रीज किया गया है। ऐसे में अब इस विवाद का एक अहम हिस्सा अदालत में तय होना है। ममता गुट के लिए यह लड़ाई पार्टी की पुरानी पहचान और चुनाव चिह्न को बचाने से जुड़ी हुई है।अब अदालत के सामने यह सवाल होगा कि चुनाव आयोग का अंतरिम आदेश कानूनी रूप से कितना उचित है और पार्टी के नाम व चुनाव चिह्न को लेकर आगे की प्रक्रिया किस तरह चलेगी। इसलिए ममता बनर्जी के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण रास्ता कानूनी लड़ाई के जरिए पार्टी की मूल पहचान को वापस हासिल करने की कोशिश करना है। हालांकि अंतिम स्थिति अदालत और चुनाव आयोग की आगे की प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
दूसरा रास्ता फिलहाल व्यावहारिक तौर पर सामने है। चुनाव आयोग ने ममता गुट को नया अंतरिम नाम और चिह्न दे दिया है। इसका मतलब है कि मौजूदा व्यवस्था के तहत पार्टी को आगामी उपचुनाव में इसी नई पहचान के साथ मैदान में उतरना होगा। पार्टी के सामने अब यह चुनौती भी होगी कि वह अपने समर्थकों और मतदाताओं तक नए नाम और चुनाव चिह्न की जानकारी कितनी तेजी से पहुंचाती है। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और शरद पवार के गुटों को भी पार्टी के मूल नाम और चुनाव चिह्न से अलग होने के बाद नई राजनीतिक पहचान के साथ चुनाव लड़ना पड़ा था। टीएमसी के मामले में भी अंतिम फैसला आने तक नई पहचान के साथ चुनावी मैदान में बने रहना एक रास्ता है। हालांकि यह अंतरिम व्यवस्था आगे चलकर स्थायी राजनीतिक पहचान में बदलेगी या नहीं, यह आने वाले फैसलों पर निर्भर करेगा।
क्या कांग्रेस के साथ नजदीकी बढ़ सकती है?
टीएमसी और कांग्रेस के रिश्ते भी इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। ममता बनर्जी ने नंदीग्राम उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने का ऐलान किया है और अपने गुट की ओर से उम्मीदवार नहीं उतारने की बात कही है। इसे विपक्षी दलों के बीच चुनावी तालमेल के संदर्भ में देखा जा सकता है। मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में दोनों दलों के बीच सहयोग की संभावनाओं को लेकर चर्चा भी महत्वपूर्ण हो जाती है। हालांकि कांग्रेस और टीएमसी के बीच किसी विलय को लेकर अभी कोई अंतिम फैसला सामने नहीं है। इसलिए इसे फिलहाल एक संभावित राजनीतिक विकल्प या सहयोग के तौर पर ही देखा जाना चाहिए, न कि तय रणनीति के रूप में। टीएमसी की अपनी संगठनात्मक पहचान और राजनीतिक आधार है, इसलिए आगे की रणनीति पार्टी के नेतृत्व और परिस्थितियों के अनुसार तय होगी।
क्या TMC का भी शिवसेना-NCP जैसा होगा हाल?
फिलहाल इसका कोई निश्चित जवाब नहीं है। शिवसेना और एनसीपी के मामलों में चुनाव आयोग ने अलग-अलग परिस्थितियों, संगठनात्मक दावों और संबंधित पक्षों की स्थिति के आधार पर फैसला दिया था। टीएमसी का विवाद अभी उस प्रक्रिया के अंतिम चरण में नहीं पहुंचा है। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि भविष्य में पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न किस गुट के पास रहेगा। मौजूदा स्थिति में इतना जरूर स्पष्ट है कि टीएमसी के लिए लड़ाई सिर्फ पार्टी के भीतर नेतृत्व की नहीं, बल्कि ना म, चुनाव चिह्न और संगठनात्मक पहचान की भी बन चुकी है। ममता बनर्जी ने कानूनी लड़ाई शुरू कर दी है, जबकि चुनाव आयोग ने दोनों गुटों के लिए अंतरिम पहचान तय कर दी है। अब आगे की तस्वीर अदालत और चुनाव आयोग की प्रक्रिया से साफ होगी। यही फैसला तय करेगा कि टीएमसी की पुरानी राजनीतिक पहचान किस रूप में आगे बढ़ती है और दोनों गुटों की राजनीति किस दिशा में जाती है।




