पाकिस्तान में शिया मुसलमानों पर हिंसा का लंबा खूनी इतिहास, आंकड़ों में देखें कब-कब बने निशाना

पाकिस्तान में शिया मुसलमानों पर हमले कोई नई बात नहीं हैं। ताज़ा मामला राजधानी इस्लामाबाद से सामने आया है, जहां शुक्रवार को शियाओं के एक इमामबाड़ा में हुए धमाके में 30 से अधिक लोगों के मारे जाने की खबर है। इस हमले को शिया समुदाय को निशाना बनाकर किया गया बताया जा रहा है। आइए जानते हैं कि पाकिस्तान में शियाओं के खिलाफ हिंसा का इतिहास कैसा रहा है और हालात यहां तक कैसे पहुंचे।

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में एक मस्जिद के बाहर बम धमाके की सूचना मिली है। यह धमाका शहजाद टाउन के तरलाई इलाके में स्थित एक इमामबाड़ा परिसर में हुआ। शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक यह एक आत्मघाती हमला था, जिसमें कम से कम 15 लोगों की मौत हुई है और कई लोग घायल बताए जा रहे हैं। हमले के बाद पूरे इलाके में आपात हालात बना दिए गए हैं।

जिस इमामबाड़ा और उससे जुड़ी जामिया मस्जिद को निशाना बनाया गया, उसे पाकिस्तान में शिया मुसलमानों के प्रमुख धार्मिक केंद्रों में गिना जाता है। ऐसे में वहां धमाका होना इस बात की ओर इशारा करता है कि देश में एक बार फिर शिया समुदाय को सीधे तौर पर निशाना बनाया गया है। यह स्थिति उस पाकिस्तान के लिए हैरान करने वाली है, जिसकी स्थापना खुद को एक मुस्लिम राष्ट्र के रूप में करने के दावे के साथ हुई थी। करीब 24 करोड़ की आबादी वाले पाकिस्तान में शिया मुसलमानों की संख्या लगभग चार करोड़ मानी जाती है।

पाकिस्तान में शिया-सुन्नी टकराव

दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना स्वयं शिया मुसलमान थे। इसके बावजूद शियाओं के खिलाफ हिंसा का सिलसिला 1980 के दशक में तेज़ हुआ, जब देश में जिया-उल-हक का सैन्य शासन था। उसी दौर में इस्लामीकरण की नीतियां लागू की गईं, जो मुख्य रूप से सुन्नी इस्लाम की व्याख्या पर आधारित थीं।

इस प्रक्रिया में सिपाह-ए-सहाबा पाकिस्तान जैसे कट्टरपंथी संगठनों को बढ़ावा मिला, जो शियाओं को काफिर बताकर उन्हें मुसलमान मानने से इनकार करते रहे। बाद में लश्कर-ए-झंगवी जैसे आतंकी संगठनों ने भी ताकत पकड़ी और बाजारों, मस्जिदों, स्कूल-कॉलेजों में शिया समुदाय को निशाना बनाना शुरू किया।

सऊदी अरब और ईरान के बीच चल रहे प्रॉक्सी संघर्ष का असर भी पाकिस्तान के सामाजिक ताने-बाने पर पड़ा। जहां सऊदी अरब ने सुन्नी मदरसों और संगठनों को आर्थिक मदद दी, वहीं ईरान ने शिया संगठनों का समर्थन किया। इसका नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान में सांप्रदायिक विभाजन और गहरा होता चला गया।

कितने शिया मारे गए?

साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान में वर्ष 2000 से 2025 के बीच शियाओं पर हमलों की 378 घटनाएं दर्ज की गईं। इन हमलों में 1813 लोगों की जान गई और 2422 लोग घायल हुए, जबकि 62 शियाओं का अपहरण भी किया गया।
सबसे अधिक 83 घटनाएं वर्ष 2012 में दर्ज की गईं, जिनमें 263 लोगों की मौत हुई। वहीं 2013 में मौतों का आंकड़ा सबसे ज्यादा रहा—56 घटनाओं में 445 लोगों की जान गई और 657 लोग घायल हुए।

सुन्नी व्याख्या वाला इस्लाम और शिया अल्पसंख्यक

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक माने जाने वाले शिया मुसलमान अक्सर हिंसा का शिकार होते रहे हैं। नवंबर 2024 के आखिर में खैबर पख्तूनख्वा के खुर्रम जिले में शिया-सुन्नी दंगे भड़क उठे थे, जिनमें 150 से अधिक लोगों की मौत और 200 से ज्यादा के घायल होने की खबर आई थी। हिंसा तब भड़की, जब 21 नवंबर को शिया तीर्थयात्रियों के एक काफिले पर फायरिंग की गई, जिसमें 52 लोग मारे गए। खुर्रम पाकिस्तान का इकलौता जिला है, जहां शिया बहुसंख्यक और सुन्नी अल्पसंख्यक हैं।

कानून और बढ़ती मुश्किलें

पाकिस्तान की बहुसंख्यक आबादी सुन्नी मुसलमानों की है और देश में प्रचलित इस्लाम की व्याख्या भी सुन्नी मानी जाती है। सरकारों ने इसे कानूनी रूप भी दिया है। जुलाई 2020 में पंजाब असेंबली ने ‘तहफुज-ए-बुनियाद-ए-इस्लाम’ नाम से एक बिल पारित किया, जिसमें सुन्नी व्याख्या वाले इस्लाम को ही मान्यता देने की बात कही गई। शिया समुदाय ने इसका कड़ा विरोध किया था।

इस कानून के बाद शिया मुसलमानों पर ईशनिंदा के आरोप लगने के मामले बढ़े। हालात ऐसे रहे कि आरोप लगाने वालों ने छोटे बच्चों तक पर ईशनिंदा के आरोप लगाए, जिसके चलते कई लोगों को जेल जाना पड़ा। कुल मिलाकर, पाकिस्तान में शिया मुसलमानों के खिलाफ हिंसा और भेदभाव का यह सिलसिला आज भी थमता नजर नहीं आ रहा है।

Share post:

Popular

More like this
Related