मेला राम ‘वफ़ा’: शब्दों से नहीं, संवेदना से पहचाने जाने वाले शायर

मेला राम ‘वफ़ा’ उन शायरों में थे, जिनकी रचनाएँ पढ़ते हुए पाठक रुक जाता है। उनकी शायरी किसी तात्कालिक उत्तेजना या ऊँची आवाज़ का सहारा नहीं लेती, बल्कि अनुभवों की गहराई से जन्म लेकर सीधे मन के भीतर अपनी जगह बना लेती है। आज मेला राम ‘वफ़ा’ का जन्मदिन है, और यह अवसर उनके शब्दों से दोबारा जुड़ने का है—उन शब्दों से, जो दिखावे से दूर और ज़िंदगी के क़रीब थे।

मेला राम ‘वफ़ा’ का तख़ल्लुस केवल एक साहित्यिक पहचान नहीं था, बल्कि उनके रचनात्मक स्वभाव का सार था। ‘वफ़ा’ उनके लिए भावनात्मक आग्रह नहीं, बल्कि लेखन की नैतिकता थी। उन्होंने जो देखा, जो भोगा और जो महसूस किया—उसे बिना किसी बनावट के काग़ज़ पर उतार दिया। इसी ईमानदारी ने उनकी शायरी को स्थायित्व दिया।

उनकी भाषा सरल थी, लेकिन साधारण नहीं। मेला राम ‘वफ़ा’ की ग़ज़लों और नज़्मों में अल्फ़ाज़ का चयन सोच-समझकर किया गया है। रिश्तों की उलझनें, प्रेम का संयम, जुदाई की खामोश टीस और इंसान का अकेलापन—ये सब उनकी रचनाओं में सहज रूप से मौजूद हैं। उनकी शायरी पढ़ते हुए पाठक को ऐसा महसूस होता है मानो कोई अनुभव साझा किया जा रहा हो, कोई उपदेश नहीं दिया जा रहा।

मुशायरों में भी उनकी पहचान अलग थी। वे श्रोताओं को प्रभावित करने के लिए शब्दों का बोझ नहीं बढ़ाते थे। उनकी प्रस्तुति में ठहराव होता था—और वही ठहराव श्रोताओं को बाँध लेता था। उनकी शायरी सुनने के बाद लोग तालियों से ज़्यादा सोच के साथ लौटते थे। यह किसी शायर के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।

मेला राम ‘वफ़ा’ की रचनाओं में सामाजिक चेतना भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उन्होंने अपने समय की विसंगतियों को महसूस किया, मगर तीखे तेवरों या नारेबाज़ी के ज़रिये नहीं। उनकी नज़्मों में प्रश्न हैं, पर आरोप नहीं; पीड़ा है, पर आक्रोश नहीं। वे इंसान को उसकी कमजोरियों के साथ स्वीकार करते हैं—और यही दृष्टि उन्हें मानवीय बनाती है।

आज के समय में, जब शायरी अक्सर त्वरित प्रतिक्रिया और तात्कालिक लोकप्रियता की ओर झुकती जा रही है, मेला राम ‘वफ़ा’ का लेखन हमें यह याद दिलाता है कि साहित्य का मूल उद्देश्य प्रभावित करना नहीं, बल्कि समझना और समझाना है। उनकी शायरी पाठक से धैर्य माँगती है—और बदले में गहरा अनुभव देती है।

आज उनके जन्मदिन पर मेला राम ‘वफ़ा’ को याद करना दरअसल उस साहित्यिक परंपरा को याद करना है, जहाँ शब्दों से पहले संवेदना आती है। उन्होंने अपनी शायरी के साथ कभी समझौता नहीं किया, न ही अपने समय से मुँह मोड़ा। वे आज भले ही हमारे बीच न हों, लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी उसी सादगी और सच्चाई के साथ मौजूद हैं, जो उन्हें अलग पहचान देती हैं।

मेला राम ‘वफ़ा’ को जन्मदिन पर शब्दों की नहीं, संवेदनाओं की श्रद्धांजलि—
क्योंकि कुछ शायर पढ़े नहीं जाते, महसूस किए जाते हैं।

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