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बिहार में ‘मौलाना पॉलिटिक्स’ पर संग्राम: वक्फ संशोधन कानून बना चुनावी हथियार

बिहार में ‘मौलाना पॉलिटिक्स’ पर संग्राम: वक्फ संशोधन कानून बना चुनावी हथियार

बिहार: बिहार की सियासत इन दिनों वक्फ (संशोधन) अधिनियम को लेकर बुरी तरह से धधक रही है। एक ओर जहां RJD के नेता तेजस्वी यादव ने इसे “मुस्लिम अधिकारों पर हमला” बताया है, वहीं सत्ताधारी NDA इसे “संशोधन के ज़रिए पारदर्शिता की दिशा में कदम” कह रही है। पूरे मुद्दे ने बिहार में ‘मौलाना पॉलिटिक्स’ का नया चेहरा सामने ला दिया है, जो विधानसभा चुनाव से पहले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का संकेत दे रहा है।

क्या है वक्फ (संशोधन) अधिनियम?
वक्फ एक्ट के तहत देशभर में मुस्लिम समुदाय की संपत्तियों का प्रबंधन वक्फ बोर्ड करता है। संशोधित अधिनियम में कुछ नई प्रावधानों को जोड़ा गया है, जिनमें वक्फ संपत्तियों की पहचान, उपयोग और प्रशासन में सरकारी हस्तक्षेप को बढ़ाने की शक्ति दी गई है। विपक्ष का आरोप है कि इससे धार्मिक स्वतंत्रता और मुस्लिम समुदाय के संपत्ति अधिकारों का हनन होगा।

वक्फ संशोधन कानून को लेकर किसने क्या कहा?

तेजस्वी यादव (RJD नेता)
तेजस्वी ने पटना में जनसभा को संबोधित करते हुए साफ कहा,

“अगर हमारी सरकार बनी तो इस वक्फ कानून को कूड़ेदान में फेंक देंगे।”
उन्होंने खुद को “मौलाना” और “नमाजवादी” कहे जाने पर गर्व जताते हुए BJP पर हमला बोला। तेजस्वी ने यह भी कहा कि वक्फ संपत्ति मुस्लिम समाज की धरोहर है और इसमें सरकार की दखलअंदाज़ी संविधान के खिलाफ़ है।

गौरव भाटिया (BJP प्रवक्ता)
BJP ने तेजस्वी के बयान को धार्मिक उन्माद फैलाने की कोशिश बताया। भाटिया ने कहा,

“तेजस्वी यादव नमाजवादी हैं, समाजवादी नहीं। उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए।”
उन्होंने तेजस्वी को “9वीं फेल नेता” कह कर भी निशाना साधा और SC में लंबित मामले का हवाला देते हुए RJD के विरोध को गैर-जरूरी बताया।

पप्पू यादव (पूर्व सांसद)
जनता के बीच लोकप्रिय पप्पू यादव ने कहा,

“यह कानून मुस्लिमों से उनका वोट देने का अधिकार छीनने की कोशिश है।”
उन्होंने NDA सरकार पर सांप्रदायिक विभाजन की राजनीति करने का आरोप लगाया।

ललन सिंह (जेडीयू नेता)
अपने दल के भीतर विरोध के बावजूद, जेडीयू सांसद ललन सिंह ने लोकसभा में कहा,

“यह संशोधन गरीब मुसलमानों के लिए है, जो वक्फ संपत्ति से कभी लाभ नहीं उठा पाए।”
लेकिन उनके बयान के बाद जेडीयू के कई मुस्लिम नेताओं ने पार्टी छोड़ दी, जिससे भीतरघात की स्थिति बन गई है।

जितन राम मांझी (NDA)
मांझी ने तेजस्वी पर चुनावी अवसरवाद का आरोप लगाते हुए कहा,

“तेजस्वी इस मुद्दे को मजहबी रंग देकर वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं।”

सड़क से संसद तक विरोध
‘वक्फ बचाओ, दस्तूर बचाओ’ के नारे के साथ पटना के गांधी मैदान में हुए मुस्लिम समुदाय के बड़े जमावड़े ने यह साबित कर दिया कि यह मुद्दा सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर भावनाओं से भी जुड़ा है। इमारत-ए-शरिया के प्रतिनिधि फैज़ल रहमानी ने इसे “शरीयत में दखल” करार दिया।

क्या है इसके सियासी मायने
विश्लेषकों की मानें तो बिहार की 243 विधानसभा सीटों में 50 से अधिक सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। RJD इसे भाजपा के खिलाफ एकजुट करने की रणनीति में लगा है, जबकि BJP इसे कानून व्यवस्था और पारदर्शिता के नाम पर हिंदू वोट को अपने पक्ष में समेटने का प्रयास कर रही है।

‘वक्फ कानून’ अब महज़ एक कानूनी मामला नहीं रह गया है। यह बिहार की सियासत में धर्म बनाम संविधान, परंपरा बनाम पारदर्शिता और अल्पसंख्यक बनाम सत्ता का बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुका है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन सी पार्टी इस मुद्दे को किस दिशा में मोड़ती है—धर्म की राह या लोकतंत्र की।

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