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पटना कॉलेज के बाहर छात्रों का जोरदार प्रदर्शन: डोमिसाइल नीति को लेकर उठी नई बहस

पटना कॉलेज के बाहर छात्रों का जोरदार प्रदर्शन: डोमिसाइल नीति को लेकर उठी नई बहस

बिहार: पटना कॉलेज के बाहर सोमवार को छात्रों का भारी प्रदर्शन देखने को मिला। सैकड़ों छात्र-छात्राएं “बिहार के छात्रों को हक दो”, “स्थानीय को प्राथमिकता दो” जैसे नारे लगाते हुए कॉलेज गेट पर जमा हुए और सरकार से डोमिसाइल नीति को स्पष्ट और प्रभावी रूप से लागू करने की मांग की।

क्या है डोमिसाइल नीति?
डोमिसाइल नीति का मतलब है कि किसी राज्य के स्थानीय निवासियों को सरकारी नौकरियों, उच्च शिक्षा संस्थानों में सीटों और अन्य सुविधाओं में प्राथमिकता दी जाए। बिहार में लंबे समय से यह मांग की जा रही है कि राज्य के युवाओं को बाहर से आने वाले छात्रों और उम्मीदवारों की तुलना में प्राथमिकता दी जाए, खासकर मेडिकल, इंजीनियरिंग और प्रशासनिक सेवाओं में।

छात्रों की क्या है मांग?
प्रदर्शन कर रहे छात्रों का कहना है कि बिहार में दूसरे राज्यों से आकर कई छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं और कॉलेजों में सीटें ले जाते हैं, जिससे राज्य के स्थानीय छात्रों के लिए अवसर कम हो जाते हैं। छात्रों का यह भी कहना है कि जब अन्य राज्य — जैसे महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, तेलंगाना — डोमिसाइल नीति अपनाकर अपने युवाओं को संरक्षण दे रहे हैं, तो बिहार क्यों पीछे है?

राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
इस मुद्दे पर राजनीतिक हलचल भी तेज़ हो गई है।
राजद (RJD) ने छात्रों का समर्थन करते हुए कहा है कि उनकी सरकार बनने पर पहली कैबिनेट में डोमिसाइल नीति को लागू किया जाएगा।
भाजपा (BJP) ने आरोप लगाया कि विपक्ष इस मुद्दे को चुनावी हथकंडा बना रहा है, जबकि डोमिसाइल नीति पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है।
जेडीयू (JDU) ने फिलहाल छात्रों से शांति बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि सरकार इस विषय पर विचार कर रही है।

बिहार चुनाव में क्या है इसका महत्व?
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं और युवाओं का मुद्दा हर पार्टी के लिए अहम है। राज्य में बड़ी संख्या में बेरोजगार स्नातक और प्रतियोगी परीक्षार्थी हैं, जो सरकार से नीति-निर्धारण की उम्मीद लगाए बैठे हैं। ऐसे में डोमिसाइल नीति एक केंद्रीय चुनावी मुद्दा बनता जा रहा है।

छात्रों का कहना है कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो वे आगामी चुनाव में “नो वोट” कैंपेन शुरू करेंगे। प्रदर्शन की तीव्रता और व्यापकता को देखते हुए, अब यह केवल शिक्षा या रोजगार का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि बिहार की राजनीति का एक निर्णायक मुद्दा बनता जा रहा है।

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