बिहार, वक्फ संशोधन बिल को लेकर मोदी सरकार ने जिस तरह से संसद में समर्थन जुटाया, उससे उसके सहयोगी दलों के सामने नई सियासी चुनौती खड़ी हो गई है। जेडीयू, टीडीपी, आरएलडी और एलजेपी जैसे दलों ने भले ही बीजेपी के साथ खड़े होकर वक्फ बिल को संसद से पास कराने में मदद की हो, लेकिन अब इसका साइड इफेक्ट इन दलों के मुस्लिम वोटबैंक पर दिखने लगा है। मुस्लिम समुदाय में बढ़ते असंतोष ने इन नेताओं के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं, खासतौर से उन राज्यों में जहां मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
बिहार में नीतीश कुमार की अगुवाई वाली जेडीयू पहले से ही सियासी चुनौतियों से घिरी हुई है। अब वक्फ बिल पर समर्थन देकर जेडीयू को मुस्लिम नेताओं के बगावत का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के कई बड़े नेता इस्तीफा दे चुके हैं। इनमें मोहम्मद शाहनवाज मलिक, मोहम्मद तबरेज सिद्दीकी अलीग, दिलशान राईन और मोहम्मद कासिम अंसारी जैसे नेता शामिल हैं। इन नेताओं का कहना है कि जेडीयू ने मुसलमानों का भरोसा तोड़ दिया है। वहीं पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व एमएलसी मौलाना गुलाम रसूल बलियावी ने भी बिल के समर्थन पर खुलकर नाराजगी जाहिर की है।
आरएलडी भी वक्फ बिल को लेकर बैकफुट पर आती दिख रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले से पार्टी के कई मुस्लिम नेताओं ने इस्तीफा दिया है। जयंत चौधरी की अगुवाई वाली आरएलडी को यूपी में मुस्लिम और जाट गठजोड़ की राजनीति का लाभ मिलता रहा है। लेकिन वक्फ बिल के समर्थन ने उनके इस समीकरण को कमजोर कर दिया है। मुस्लिम समाज में यह धारणा बन रही है कि जयंत चौधरी ने भी मुस्लिम हितों से ज्यादा सत्ता की राजनीति को तरजीह दी है।
तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के प्रमुख चंद्रबाबू नायडू और लोक जनशक्ति पार्टी के चिराग पासवान भी मुस्लिम संगठनों के निशाने पर आ गए हैं। आंध्र प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 9 प्रतिशत है, जो कई सीटों पर निर्णायक भूमिका में रहती है। इसी तरह बिहार में करीब 17 प्रतिशत और यूपी में 22 प्रतिशत मुस्लिम वोटर हैं। इन वोटों की नाराजगी इन दलों की सियासी सेहत पर बड़ा असर डाल सकती है।
वक्फ बिल के विरोध में एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और कांग्रेस नेता इमरान प्रतापगढ़ी ने खुलकर हमला बोला है। ओवैसी ने नीतीश कुमार, जयंत चौधरी, चिराग पासवान और चंद्रबाबू नायडू को ‘मुस्लिम विरोधी’ बताते हुए कहा कि मुस्लिम समाज उन्हें कभी माफ नहीं करेगा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ये नेता मोदी सरकार को शरीयत और मुस्लिम संपत्तियों पर हमला करने की इजाजत दे रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष ने वक्फ बिल को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना लिया है। बिहार में विधानसभा चुनाव महज कुछ महीनों दूर है और आरजेडी-कांग्रेस के साथ ओवैसी की पार्टी मिलकर इसे भुनाने की तैयारी में हैं। रमजान के दौरान रोजा इफ्तार कार्यक्रमों का बहिष्कार करके मुस्लिम संगठन विरोध का संकेत पहले ही दे चुके हैं। अगर यही नाराजगी चुनाव तक कायम रही तो एनडीए के सहयोगी दलों को भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार, जयंत चौधरी और चंद्रबाबू नायडू जैसे नेता मुस्लिम मतदाताओं को फिर से साध पाएंगे या नहीं। अगर ये दल समय रहते डैमेज कंट्रोल नहीं कर पाए, तो वक्फ बिल पर दिया गया समर्थन उनके राजनीतिक भविष्य पर भारी पड़ सकता है।




