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परिवार को किनारे कर मायावती ने थामा कांशीराम का फार्मूला, ओबीसी वोटरों पर फोकस

परिवार को किनारे कर मायावती ने थामा कांशीराम का फार्मूला, ओबीसी वोटरों पर फोकस

लखनऊ: बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने अब पूरी तरह से खुद को पार्टी के मिशन में झोंक दिया है। पिछले कुछ वर्षों में हुए राजनीतिक उतार-चढ़ाव और परिवार के बढ़ते हस्तक्षेप से परेशान मायावती ने अब अपने संस्थापक कांशीराम के सिद्धांतों की ओर वापसी कर ली है। उन्होंने बसपा के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी है और इसके तहत ओबीसी नेताओं की एक अहम बैठक बुलाई है।

परिवार से अलग, पार्टी पर फोकस
मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश की थी, लेकिन अब वे खुद को परिवार की राजनीति से दूर कर चुकी हैं। उनके छोटे भाई आनंद कुमार भी अब पार्टी मामलों में अधिक सक्रिय नहीं हैं। मायावती ने साफ कर दिया है कि उनका पूरा ध्यान बसपा को मजबूत करने और कांशीराम के मिशन को आगे बढ़ाने पर है।

बसपा में ‘भाईचारा कमेटी’ की नई पहल
मायावती ने एक बार फिर से बसपा में भाईचारा कमेटियों को पुनर्जीवित करने का फैसला लिया है। यह वही फार्मूला है, जिसके जरिए कांशीराम ने बसपा को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया था। भाईचारा कमेटी का उद्देश्य बसपा को दलितों के साथ-साथ अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) और कमजोर वर्गों को जोड़कर मजबूत बनाना है। मायावती ने लखनऊ में ओबीसी नेताओं को निर्देश दिया कि वे घर-घर जाकर लोगों को पार्टी से जोड़ें।

ओबीसी नेताओं की वापसी पर जोर
एक दौर में बसपा में कई बड़े ओबीसी नेता हुआ करते थे, लेकिन समय के साथ वे या तो पार्टी छोड़कर चले गए या फिर मायावती ने उन्हें दरकिनार कर दिया। सोनेलाल पटेल, स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान, राम अचल राजभर, बाबू सिंह कुशवाहा और संजय निषाद जैसे नेता कभी बसपा का प्रमुख चेहरा हुआ करते थे। अब मायावती गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक को फिर से अपने पक्ष में करने के लिए प्रयासरत हैं।

बीजेपी और सपा के ‘पीडीए’ फार्मूले को दी चुनौती
उत्तर प्रदेश में बीजेपी और समाजवादी पार्टी, दोनों ने ही ओबीसी और दलित वोटों को साधने के लिए अलग-अलग रणनीतियां अपनाई हैं। बीजेपी ने अपना दल, निषाद पार्टी और सुहेलदेव समाज पार्टी को साथ लेकर ओबीसी वोटों में सेंधमारी की है। वहीं, सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने ‘पीडीए’ (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) का नया फार्मूला पेश किया है। लेकिन मायावती ने इसे ‘परिवार डेवलपमेंट अथॉरिटी’ करार देते हुए तंज कसा है।

नए समीकरणों के साथ मैदान में बसपा
मायावती की रणनीति अब यह है कि वे क्षेत्रवार जातिगत समीकरण बनाकर बसपा को फिर से मजबूत करें। जिन जिलों में लोधी वोटर प्रभावशाली हैं, वहां दलित-लोधी गठजोड़ बनाया जा रहा है। कुर्मी बाहुल्य जिलों में कुर्मी-दलित समीकरण पर जोर दिया जा रहा है। निषाद, राजभर, मौर्य, कुशवाहा, प्रजापति, शाक्य, सैनी जैसी पिछड़ी जातियों को भी बसपा से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

क्या मायावती का पुराना फार्मूला इस बार चलेगा?
राजनीति के बदलते समीकरणों के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मायावती का यह फार्मूला कामयाब होगा? समय के साथ मतदाताओं की सोच और प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। ऐसे में कांशीराम की रणनीति को दोहराने से क्या बसपा फिर से ताकतवर बन पाएगी, या यह प्रयास भी बाकी प्रयोगों की तरह नाकाम साबित होगा? फिलहाल, सवाल ज्यादा हैं और जवाब वक्त ही देगा।

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