बिहार में कांग्रेस का दलित दांव: क्या राहुल गांधी का नया कदम दिलाएगा 40 साल पुराना रुतबा?

बिहार में कांग्रेस का दलित दांव: क्या राहुल गांधी का नया कदम दिलाएगा 40 साल पुराना रुतबा?

बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस ने दलित राजनीति पर फोकस करना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में कांग्रेस ने बड़ा फैसला लेते हुए दलित नेता और दो बार के विधायक राजेश कुमार को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है। इससे साफ है कि पार्टी बिहार में अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाने के लिए दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है।

राजेश कुमार को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का क्या है मतलब?
राजेश कुमार उर्फ राजेश राम औरंगाबाद के कुटुंबा विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं और वे रविदास समुदाय से आते हैं। कांग्रेस ने भूमिहार समाज के अखिलेश प्रसाद सिंह की जगह राजेश कुमार को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर यह संदेश दिया है कि वह दलितों को अपने पाले में करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

राजेश कुमार के पिता दिवंगत दिलकेश्वर राम भी कांग्रेस के दिग्गज दलित नेता थे और बिहार में जगजीवन राम के बाद दलित राजनीति का बड़ा चेहरा माने जाते थे। ऐसे में कांग्रेस राजेश राम के जरिए अपने पुराने दलित वोटरों को वापस लाने की कोशिश कर रही है।

बिहार में कांग्रेस का दलित वोट बैंक कितना अहम?
बिहार में करीब 18% दलित आबादी है, जिनके लिए 38 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं। यह वर्ग सत्ता बनाने और बिगाड़ने की क्षमता रखता है। 1980 के दशक तक दलित मतदाता कांग्रेस के साथ थे, लेकिन मंडल राजनीति के बाद उनका झुकाव आरजेडी, जेडीयू और एलजेपी की ओर हो गया।

कांग्रेस अब उसी दलित वोट बैंक को दोबारा अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। इसके लिए राहुल गांधी ने हाल ही में बिहार में कई कार्यक्रमों में भाग लिया, जिनमें सामाजिक न्याय और दलित उत्थान के मुद्दे उठाए गए।

दलित वोटों पर किसका है कब्जा?
बिहार में दलित वोटों पर कई दावेदार हैं:

चिराग पासवान – पासवान जाति के नेता और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख।
जीतन राम मांझी – मुसहर जाति के नेता और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) के प्रमुख।
तेजस्वी यादव – आरजेडी नेता, जिन्होंने दलितों को जोड़ने की कोशिश की, लेकिन उनकी पार्टी में बड़ा दलित चेहरा नहीं है।
नीतीश कुमार – उन्होंने दलितों को “महादलित” श्रेणी में बांटकर अपना अलग आधार बनाया।

कांग्रेस अब रविदास समुदाय को साधकर दलित राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है, क्योंकि रविदास समुदाय की आबादी 5.25% है और यह पासवान व मुसहर जाति के बाद तीसरा सबसे बड़ा दलित वोट बैंक है।

राहुल गांधी का दलित एजेंडा
राहुल गांधी लंबे समय से दलित राजनीति को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ अहम पहलें:

संविधान बचाओ अभियान – 18 जनवरी को पटना में एक कार्यक्रम में दलितों और पिछड़ों के लिए आरक्षण सीमा तोड़ने की बात कही।
जंगललाल चौधरी की जयंती में शामिल हुए – पासी समुदाय को साधने के लिए दलित प्रतीक माने जाने वाले जंगललाल चौधरी की 130वीं जयंती में भाग लिया।
दलित नेताओं को कांग्रेस में शामिल कराया – पूर्व सांसद अली अनवर अंसारी और दशरथ मांझी के बेटे को पार्टी से जोड़ा।
दलित सहप्रभारी नियुक्ति – सुशील पासी को बिहार कांग्रेस का सहप्रभारी बनाया गया, जो पासी वोट बैंक को प्रभावित कर सकते हैं।

क्या कांग्रेस का यह दांव सफल होगा?
कांग्रेस के पास बिहार में दलित राजनीति की मजबूत विरासत रही है। देश के पहले दलित मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री कांग्रेस से ही थे। इसके अलावा बाबू जगजीवन राम जैसे कद्दावर दलित नेता भी कांग्रेस के प्रमुख चेहरे थे।

हालांकि, 1990 के बाद कांग्रेस का दलित वोट बैंक बिखर गया। अब राहुल गांधी इसी वोट बैंक को दोबारा जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

चुनौतियां:
चिराग पासवान और जीतन राम मांझी पहले से ही मजबूत दलित नेता हैं।
कांग्रेस के पास बिहार में संगठनात्मक कमजोरी है।
महागठबंधन में आरजेडी पहले से ही मजबूत स्थिति में है, जिससे कांग्रेस को अपनी पहचान बनाना मुश्किल होगा।

संभावनाएं:
जेडीयू और बीजेपी के पास बड़ा दलित चेहरा नहीं है, जिससे कांग्रेस को फायदा हो सकता है।
कांग्रेस ने दलितों को साधने के लिए जमीनी स्तर पर काम शुरू कर दिया है।
बिहार में दलितों की 22 जातियां हैं, जिनमें रविदास और पासी समुदाय पर कांग्रेस की मजबूत पकड़ बन सकती है।

राजेश कुमार को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने दलित वोटों को साधने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। हालांकि, कांग्रेस के सामने कई चुनौतियां हैं, लेकिन अगर वह सही रणनीति अपनाती है तो बिहार की राजनीति में उसकी वापसी संभव है। अब देखना होगा कि राहुल गांधी की यह सियासी बिसात कांग्रेस को कितनी मजबूती देती है और क्या यह दलित कार्ड बिहार में पार्टी का 40 साल पुराना रुतबा वापस दिला पाएगा?

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