Varanasi: राहुल गांधी को वाराणसी की कोर्ट से बड़ी राहत, लंदन वाले बयान के खिलाफ दाखिल परिवाद खारिज

Varanasi: राहुल गांधी को वाराणसी की कोर्ट से बड़ी राहत, लंदन वाले बयान के खिलाफ दाखिल परिवाद खारिज

कांग्रेस नेता राहुल गांधी को वाराणसी की कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। लंदन वाले बयान के खिलाफ मुकदमा दर्ज किए जाने से संबंधित परिवाद को एसीजेएम प्रथम व एमपीएमएलए कोर्ट के प्रभारी उज्जवल उपाध्याय की अदालत ने खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि राहुल गांधी का बयान असंवैधानिक नहीं है।

हाल ही में लंदन में भारतीय लोकतंत्र को लेकर बयान देने वाले राहुल गांधी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के लिए परिवाद दाखिल किया गया था। भाजपा काशी क्षेत्र के विधि प्रकोष्ठ के संयोजक अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी ने परिवाद दाखिल किया था।

परिवादी की तरफ से  अधिवक्ताओं ने कोर्ट में कहा था कि कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के जज बिजनेस स्कूल में भारतीय एकता, अखंडता और संप्रभुता के खिलाफ बयान दिया। उन्होंने आरएसएस जैसे धार्मिक व सांस्कृतिक संगठन की तुलना आतंकवादी संगठन से करके अपराध किया है। संज्ञेय अपराध का संज्ञान लेकर कैंट थाने में मुकदमा दर्ज कर विवेचना का आदेश दिए जाने की प्रार्थना की।

परिवाद पर पोषणीयता के बिंदु पर सुनवाई के दौरान वादी शशांक शेखर त्रिपाठी की ओर से अधिवक्ता राजकुमार तिवारी, आनंद पाठक, अजय सिंह, चंद्रभान गिरी आदि ने पक्ष रखा था। अधिवक्ताओं ने कहा कि राहुल गांधी केरल के वायनाड से सांसद हैं। उन्होंने नफरती भाषण दिया है। इस पर अदालत को सुनवाई का अधिकार है। सीआरपीसी की धारा 179 में साफ लिखा है कि मामले की सुनवाई वहीं होगी, जहां अपराध हुआ या फिर जहां प्रभावित पक्ष रहता है। वादी भारतीय जनता पार्टी विधि प्रकोष्ठ काशी क्षेत्र का संयोजक है। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुषांगिक संगठनों में पदाधिकारी भी है। राहुल गांधी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे धार्मिक व सांस्कृतिक संगठन की तुलना आतंकवादी संगठन से करके अपराध किया है।

अदालत ने क्या कहा

अदालत ने परिवादी पक्ष कि दलीलें सुनने के बाद पत्रावली आदेश के लिए सुरक्षित रखा था। बुधवार को 8 पेज के विस्तृत आदेश में कोर्ट ने परिवाद पत्र खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि परिवाद के अवलोकन से साफ नहीं होता कि राहुल गांधी का बयान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अतिक्रमण करता हो। ऐसे में यह संज्ञेय अपराध नहीं है। परिवाद पत्र खारिज किया जाता है।

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