देवेंद्र फडणवीस की जगह एकनाथ शिंदे क्यों बने महाराष्ट्र के सीएम, 5 प्वाइंट्स में समझें पूरा मामला

महाराष्ट्र में पिछले 21 जून से सियासी घमासान अपने चरम पर था। आज महाराष्ट्र के नए मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद ये घमासान शांत हो गया है। एकनाथ शिंदे ने 40 शिवसेना विधायकों के साथ उद्धव ठाकरे से बगावत कर दी और पहले सूरत फिर उसके बाद गुवाहाटी में जाकर शिफ्ट हो गए। 9 दिनों तक चले इस घटना क्रम में आखिरी घंटे तक दांव बदलते रहे। लोगों को ऐसा लग रहा था कि शिवसेना के बागी विधायक बीजेपी को समर्थन देकर सरकार बनाएंगे और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बनेंगे।

फिर आखिरी दिन यानि कि गुरुवार की शाम को महाराष्ट्र के पूर्व मुख्मंत्री और बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में वो ऐलान करते हैं कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद पर एकनाथ शिंदे बैठेंगे और वो इस सरकार से बाहर रहेंगे और बाकि मंत्रिमंडल का गठन आने वाले दिनों में किया जाएगा। इसके बाद शपथ ग्रहण से एक घंटे पहले खबर आती है कि देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। बताया जा रहा है कि शपथ ग्रहण से ठीक पहले दिल्ली में बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा और अमित शाह की बैठक हुई जिसमें नड्डा ने फडणवीस को डिप्टी सीएम की शपथ के लिए कहा जिसके बाद शपथ ग्रहण से आखिरी घंटे से पहले ये बदलाव हुआ।

सियासत से लेकर आम आदमी तक आखिर ये सोचकर हैरान है कि बीजेपी ने एकनाथ शिंदे को मुख्मयंत्री क्यों बनाया? ये ऐसा यक्ष प्रश्न है जो हर किसी के दिमाग में गूंज रहा है। तो चलिए हम आपकी इस शंका को भी दूर किए देते हैं और बताते हैं कि आखिरकार बीजेपी ने ऐसा कदम क्यों उठाया जिसके तहत उसने देवेंद्र फडणवीस की जगह एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया। इसके पीछे 5 बड़ी वजहें हैं जिसकी वजह से बीजेपी ने ऐसा कदम उठाया है और आने वाले समय में बीजेपी का ये कदम उसके लिए फायदेमंद साबित होने वाला है।

1- साल 2019 में बीजेपी और शिवसेना ने गठबंधन में महाराष्ट्र का विधानसभा चुनाव लड़ा था और जीता भी था। हालांकि चुनाव परिणाम के बाद इस सवाल पर गठबंधन टूट गया कि मुख्यमंत्री पद पर कौन काबिज होगा? जैसे ही ये मुद्दा उठा इसके तुरंत बाद ही बीजेपी ने एनसीपी के साथ मिलकर अजित पवार के समर्थन में सुबह-सुबह ही शपथ ग्रहण करवा दिया। बीजेपी के इस कदम के बाद पूरी राजनीतिक हलकों में एक झोंका सा आ गया जो सबको झकझोरता हुआ गुजर गया। बीजेपी के इस कदम ने जनता के सामने उसे एक सत्ता की लालची पार्टी के रूप में पेश किया। एकनाथ शिंदे के मुख्यमंत्री पद पर होने से बीजेपी की छवि में सुधार होगा, अब कोई ये आरोप नहीं लगा सकता है कि बीजेपी सत्ता की लालची है।

2- महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देते समय उद्धव ठाकरे ने ऐसे नैरेटिव खड़ा किया कि लोगों को ऐसा लगे कि बीजेपी ने उद्धव की पीठ में छुरा भोंक दिया है। वो इस कहानी को गढ़ने में काफी हद तक सफल भी हो गए थे। उद्धव ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देते हुए कहा था, “आपने (बीजेपी) बालासाहेब के बेटे को नीचे उतारा है।” उद्धव के इस बयान में महाराष्ट्र के मतदाताओं से भावनात्मक अपील दिखाई देती है कि आज बाला साहेब ठाकरे के बेटे को बीजेपी सत्ता से बेदखल कर रही है। लेकिन बीजेपी ने यहां भी मास्टर स्ट्रोक खेलते हुए एक ‘शिवसैनिक’ को मुख्यमंत्री बना दिया अब उद्धव का बयान निरर्थक साबित हो जाएगा क्योंकि उनके सत्ता से हटने के बाद भी सत्ता एक शिवसैनिक के पास ही रहेगी।

3- बीजेपी स्पष्ट रूप से एक ऐसी छवि बनाना चाहती थी कि वो सचमुच बाला साहेब की विरासत का समर्थन करे। एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाकर उसने ये काम भी बहुत ही आसानी से कर लिया। गुरुवार को जब देवेंद्र फडणवीस प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एकनाथ शिंदे के महाराष्ट्र के सीएम होने की घोषणा करने से पहले ये बात कही थी। सीएम की कुर्सी पर एक ‘शिवसैनिक’ के साथ ‘बालासाहेब का सपना अब भी पूरा हुआ।’

4- 21 जून से महाराष्ट्र में मचे सियासी घमासान के बाद से महाराष्ट्र में असली शिवसेना कौन है इसे लेकर सवाल खड़ा हो गया है। फिलहाल अभी कुछ समय के लिए ये सवाल तो बिना उत्तर का रहेगा लेकिन आने वाले समय में एकनाथ शिंदे बाला साहेब की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए मुखर रहे हैं। शिंदे के मुख्यमंत्री के बन जाने के बाद बीजेपी के लिए भी ये दावा करना आसान हो जाएगा कि 2024 के चुनाव आने पर वो असली शिवसेना पार्टी के साथ है।

5- एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाए जाने के फैसले के जरिए बीजेपी ने शिवसेना में बने एकनाथ शिंदे गुट को और मजबूत करने का काम किया है। अब एकनाथ शिंदे शिवसेना पार्टी को अपने नियंत्रण में आसानी से ले सकते हैं उनका अगला कदम भी हो सकता है यही हो। ऐसे में बीजेपी महाराष्ट्र में मराठा वोटरों को भी साधने का प्रयास करेगी। चुनाव में अगर बीजेपी बिना शिवसेना के मैदान में उतरती तो उसे मराठा वोटों के अलावा हिंदुत्व के वोटों का बंटवारे का नुकसान उठाना पड़ता।

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