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‘पॉप्युलैरिटी के लिए SC आए?’ बिहार चुनाव याचिका पर जन सुराज पार्टी को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, पूरा मामला

‘पॉप्युलैरिटी के लिए SC आए?’ बिहार चुनाव याचिका पर जन सुराज पार्टी को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, पूरा मामला

बिहार विधानसभा चुनाव से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए जन सुराज पार्टी की याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। कोर्ट की टिप्पणियां केवल याचिका की कानूनी सीमाओं तक नहीं रहीं, बल्कि चुनाव हारने के बाद अदालत का रुख करने वाली राजनीतिक पार्टियों की मंशा पर भी बड़े सवाल के रूप में सामने आईं।

याचिका किसने दायर की और किस आधार पर चुनौती दी गई

राजनीतिक रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर बिहार विधानसभा चुनाव को चुनौती दी थी। पार्टी का आरोप था कि चुनाव आचार संहिता लागू रहने के बावजूद राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत बड़ी संख्या में महिलाओं के बैंक खातों में सीधे पैसे ट्रांसफर किए। याचिका में कहा गया कि इस कदम ने चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित किया और यह संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 112, 202 और 324 का उल्लंघन है। इसी आधार पर पार्टी ने पूरे चुनाव को रद्द कर दोबारा कराने की मांग की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार क्यों किया

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष हुई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पूरी चुनाव प्रक्रिया को एक साथ चुनौती देना कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र या उम्मीदवार के खिलाफ अनियमितता के आरोप हैं, तो उसके लिए संबंधित निर्वाचन क्षेत्र से अलग-अलग चुनाव याचिकाएं दाखिल करनी होती हैं। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस तरह की याचिकाएं सीधे सुप्रीम कोर्ट में नहीं, बल्कि संबंधित हाईकोर्ट में दायर की जानी चाहिए।

CJI की सख्त टिप्पणियां क्यों बनीं चर्चा का केंद्र

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणियां सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहीं। उन्होंने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि उनकी पार्टी को कितने वोट मिले थे और कहा कि अगर जनता ने पार्टी को स्वीकार नहीं किया, तो क्या पॉप्युलैरिटी बटोरने के लिए अदालत का सहारा लिया जा रहा है। CJI ने यह भी टिप्पणी की कि अगर यही पार्टी सत्ता में होती, तो संभव है कि वह भी वही करती, जो अन्य सत्ताधारी दल करते हैं। कोर्ट ने इस बात के संकेत दिए कि चुनाव हारने के बाद मुफ्त योजनाओं को आधार बनाकर अदालत पहुंचना न्यायिक प्रक्रिया का सही इस्तेमाल नहीं है।

फ्रीबीज और महिला योजना को लेकर क्या दलील दी गई

जन सुराज पार्टी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता चंदर उदय सिंह ने दलील दी कि आचार संहिता लागू रहने के बावजूद 25 से 35 लाख महिलाओं के खातों में 10-10 हजार रुपये ट्रांसफर किए गए। उनका कहना था कि यह चुनाव से ठीक पहले किया गया, जिससे मतदाताओं पर सीधा असर पड़ा और यह आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है।

इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट का क्या कहना था

इस पर CJI ने स्पष्ट किया कि याचिका किसी एक सरकारी योजना को चुनौती नहीं दे रही है, बल्कि पूरे चुनाव को रद्द करने और दोबारा चुनाव कराने की मांग कर रही है। कोर्ट ने यह भी कहा कि फ्रीबीज से जुड़े मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट पहले से ही अलग मामलों में विचार कर रहा है, लेकिन चुनाव हारने के बाद पूरी चुनाव प्रक्रिया को चुनौती देना अलग बात है और इसे इस रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कौन सा रास्ता दिखाया

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह स्पष्ट रूप से बताया कि यह मामला पूरे देश से जुड़ा कोई संवैधानिक प्रश्न नहीं है। अदालत के मुताबिक, यदि पार्टी चाहे तो इस मुद्दे को संबंधित हाईकोर्ट में उठा सकती है, जहां तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर इस पर विचार किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

इस फैसले का बड़ा संदेश क्या है

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां सिर्फ जन सुराज पार्टी तक सीमित नहीं मानी जा रहीं। अदालत ने एक तरह से यह संदेश दिया है कि चुनाव हारने के बाद पूरी चुनाव प्रक्रिया को चुनौती देना और अदालत को राजनीतिक मंच की तरह इस्तेमाल करना न्यायिक व्यवस्था के दायरे में स्वीकार्य नहीं है।

प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने न केवल सुनवाई से इनकार किया, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र में जनता के जनादेश को अदालत के ज़रिये पलटने की कोशिशों को हल्के में नहीं लिया जाएगा। कोर्ट की सख्त टिप्पणियां आने वाले समय में चुनावी नतीजों को चुनौती देने वाली याचिकाओं के लिए एक अहम नज़ीर के रूप में देखी जा रही हैं।

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