बिहार में BJP ने डुबोई मुकेश सहनी की नाव, जयंत चौधरी, ओपी राजभर, जीतन मांझी जैसे छोटे दलों के लिए ‘रेड सिग्नल’

बिहार में BJP ने डुबोई मुकेश सहनी की नाव, जयंत चौधरी, ओपी राजभर, जीतन मांझी जैसे छोटे दलों के लिए ‘रेड सिग्नल’

पटना: बिहार की पॉलिटिक्स में 23 मार्च 2022 की शाम को नीतीश सरकार के मंत्री मुकेश सहनी के साथ खेला हो गया। यह खेला किसी और ने नहीं, बल्कि एनडीए गठबंधन के सहयोगी बीजेपी ने की है। एनडीए में शामिल विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के सभी तीन विधायक बुधवार शाम को विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा से मिलकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का समर्थन पत्र सौंप दिया। इसके साथ ही वे विधानसभा में वीआईपी का BJP में विलय में हो गया। वीआईपी के तीनों विधायक राजू सिंह, मिश्री लाल यादव और स्वर्णा सिंह बुधवार की शाम विधानसभा पहुंचे और विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा से मिलकर BJP को समर्थन का पत्र सौंप दिया। उनके साथ बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. संजय जायसवाल तथा बिहार के उपमुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी भी साथ थे। बिहार की पॉलिटिक्स में बीजेपी की ओर से किए गए इस खेला से देश की तमाम छोटी पार्टियों को सबक लेने की जरूरत है।

RJD ने VIP का उदाहरण देकर मांझी को किया अलर्ट
मुकेश सहनी के साथ जो कुछ हुआ उसके बाद बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी आरजेडी ने एनडीए के अन्य सहयोगी पूर्व सीएम जीतन राम मांझी की पार्टी हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) को आगाह किया है। आरजेडी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि बीजेपी ने वीआईपी के साथ जो कुछ किया है, वैसा ही हश्र जीतन मांझी की पार्टी के साथ भी हो सकता है। यूं तो मृत्युंजय तिवारी ने बिहार में अपनी पार्टी के नफा नुकसान को देखकर यह बयान दिया है, लेकिन इसे विस्तृत राजनीतिक परिदृष्य में देखें तो इसमें देश की तमाम छोटे दलों के लिए बड़ा संदेश छुपा है।

जिताऊ कैंडिडेट के फेर में छोटे दलों को हो सकता है बड़ा नुकसान
लोकसभा या विधानसभा चुनाव के दौरान अपनी पार्टी का कद बढ़ाने के लिए छोटे दल बड़ी राजनीतिक पार्टियों के साथ गठबंधन करने को आतुर होते हैं। समाज के एक खास वर्ग पर अच्छी पकड़ होने के चलते बड़ी राजनीतिक पार्टियां भी इन्हें पूरे सम्मान के साथ अपने साथ लाती हैं। छोटे दल बड़े दलों के साथ गठबंधन तो कर लेते हैं लेकिन ज्यादातर केस में उनके पास ऐसे चर्चित कैंडिडेट ही नहीं होते हैं कि जो अपने दम पर चुनाव जीत सकें। आमतौर पर भारत में छोटी पार्टियां व्यक्ति विशेष या परिवार आधारित हैं। ऐसी स्थिति में गठबंधन होने पर बड़ी पार्टियां छोटे दलों के सिंबल पर अपने नेताओं को प्रत्याशी बना देती हैं।

इससे बड़ी पार्टियों को तीन फायदा होता है। पहली बात यह कि खास जाति या समाज को रिप्रजेंट करने वाली पार्टियों का सिंबल मिलने से कैंडिडेट का उस समाज का अच्छा खासा वोट मिल जाता है। दूसरा बात यह है कि बड़ी पार्टियां अपने उन नेताओं को भी टिकट दिलवा देती हैं जिन्हें वह अपने दल से प्रत्याशी नहीं बना पाते हैं। तीसरी बात यह है कि जब बड़े दल का नेता किसी छोटी पार्टी के सिंबल पर जनप्रतिनिधि बनते हैं तो उनकी निष्ठा अपने पुराने दल के प्रति ही बनी रहती है। ऐसी स्थिति में छोटे राजनीतिक दलों की मजबूरी हो जाती है कि वह बड़े दलों के कंट्रोल में रहें।

यूपी चुनाव में भी छोटे दलों ने की है यही गलती
हाल ही में संपन्न हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा), राष्ट्रीय लोकदल (RLD), प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया), अपना दल जैसी छोटी पार्टियों के सिंबल पर समाजवादी पार्टी और बीजेपी ने अपने नेताओं को प्रत्याशी बनाया, जिसमें से कई ने जीत भी दर्ज की है। उदाहरण के तौर पर मुजफ्फरनगर की मीरापुर सीट से सपा नेता चंदन चौहान RLD के टिकट पर प्रत्याशी बने और चुनाव जीत भी गए। खतौली सीट पर RLD के सिंबल पर सपा नेता और पूर्व सांसद राजपाल सैनी ने भाग्य आजमाया। चरथावल सीट पर सपा के टिकट पर RLD नेता पंकज मलिक मैदान में उतरे। इसी तरह प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) के नेता शिवपाल सिंह यादव सपा के टिकट पर प्रत्याशी बने और जीत भी गए। इसी तरह सिराथु विधानसभा सीट पर अपना दल (कमेरावादी) की नेता पल्लवी पटेल सपा के टिकट पर उतरीं और उन्होंने डेप्युटी सीएम केशव प्रसाद मौर्या को शिकस्त दे दी।

यहां राजस्थान की घटना पर भी ध्यान देने की जरूरत है। राजस्थान में अशोक गहलोत ने कांग्रेस के कई नेताओं को छोटे दलों के सिंबल पर या निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव में उतारे थे। इसमें से कई विधायक भी बने। जब सचिन पायलट ने पार्टी में अपनी नाराजगी जाहिर की तो अशोक गहलोत ने बीएसपी और कुछ निर्दलीय विधायकों को कांग्रेस में शामिल करा लिया।

परिवारवादी पार्टियों को PM मोदी भी दे चुके हैं संदेश
खास व्यक्ति और परिवार आधारित पार्टियों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपना रुख साफ कर दिया है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान पीएम मोदी ने कहा कि परिवारवादी पार्टियां, लोकतंत्र की सबसे बड़ी दुश्मन हैं। उन्‍होंने कहा कि जब परिवार ही सर्वोपरि होता है, परिवार को बचाओ पार्टी बचे न बचे, देश बचे न बचे। जब ये होता है तो सबसे बड़ा नुकसान प्रतिभा को होता है। ऐसे में देखना होगा कि देश की राजनीति में आगे छोटे दल बड़ी राजनीतिक दलों के नेताओं को अपने सिंबल पर प्रत्याशी बनाते हैं या नहीं।

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