गंगासागर (पश्चिम बंगाल): सतयुग में भगवान कपिल मुनि की तपोस्थली रहा गंगासागर स्थित कपिल मुनि आश्रम आज समुद्री कटाव के गंभीर संकट से जूझ रहा है। समुद्र की लहरें लगातार इस ऐतिहासिक स्थल को नुकसान पहुंचा रही हैं, जिससे आश्रम का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। आशंका जताई जा रही है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह पवित्र स्थल जल्द ही समुद्र में समा सकता है।
समुद्र की लहरों से कटाव, मंदिर पर संकट
गंगासागर में हर साल मकर संक्रांति के अवसर पर लाखों श्रद्धालु गंगासागर मेले में स्नान और पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। लेकिन हाल ही में आए समुद्री उफान ने कपिल मुनि आश्रम के सामने स्थित स्नान घाटों को भारी नुकसान पहुंचाया है। स्थानीय प्रशासन ने कुछ घाटों को बंद करने का फैसला भी लिया, जिससे यात्रियों को काफी परेशानी उठानी पड़ी।
पूर्णिमा के दिन समुद्र की लहरों ने स्नान घाट संख्या 1 से 4 तक के तटबंध को बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया। इससे आश्रम और समुद्र के बीच की दूरी काफी कम हो गई है। मौसम में लगातार हो रहे बदलाव और समुद्री जलस्तर में वृद्धि से स्थानीय लोग आश्रम के भविष्य को लेकर चिंतित हैं।
गंगासागर मेले पर करोड़ों खर्च, लेकिन सुरक्षा पर सवाल
पश्चिम बंगाल सरकार ने हाल ही में संपन्न हुए गंगासागर मेले के आयोजन में करोड़ों रुपये खर्च किए, लेकिन मंदिर और तटबंध की सुरक्षा को लेकर सवाल उठने लगे हैं। बीजेपी नेता अरुणाभ दास का आरोप है कि सरकारी फंड का सही इस्तेमाल नहीं किया गया, जिससे यह ऐतिहासिक स्थल प्राकृतिक आपदा के सामने असहाय हो गया है।
सतयुग से चला आ रहा है आश्रम का अस्तित्व
कपिल मुनि आश्रम का उल्लेख श्रीमद्भागवत, स्कंद पुराण और कई अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। कपिल मुनि को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। वह कर्दम ऋषि और माता देवहूति के पुत्र थे।
श्रीमद्भागवत के अनुसार, भगवान कपिल ने अपनी माता को सृष्टि के 24 तत्वों का ज्ञान दिया और बाद में तपस्या के लिए उत्तराखंड चले गए। बाद में वह गंगासागर आए, जहां उन्होंने राजा सगर के 60,000 पुत्रों को भस्म किया था। उनके ही कारण गंगा का धरती पर अवतरण हुआ, जिससे यह स्थान “गंगासागर” कहलाया।
क्या बच पाएगा कपिल मुनि आश्रम?
समुद्री कटाव को रोकने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कुछ प्रयास जरूर हुए हैं, लेकिन वे अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं की मांग है कि सरकार ठोस कदम उठाए ताकि यह ऐतिहासिक आश्रम समुद्र में समाने से बच सके। यदि जल्द ही उचित समाधान नहीं निकाला गया तो धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण यह स्थल केवल इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह जाएगा।




