होली पर लड़कों ने क्यों पहनी साड़ी-ज्वेलरी? जानिए इस अनोखी परंपरा की पूरी कहानी

होली पर लड़कों ने क्यों पहनी साड़ी-ज्वेलरी? जानिए इस अनोखी परंपरा की पूरी कहानी

द फ्रंट डेस्क: होली आमतौर पर रंगों और उल्लास का त्योहार माना जाता है, लेकिन आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में इसे एक बेहद अलग और अनोखी परंपरा के साथ मनाया जाता है। कुरनूल जिले के अडोनी मंडल के सांथेकुडलूर गांव में होली के अवसर पर पुरुष महिलाओं की पोशाक पहनते हैं। साड़ी, गहने और पारंपरिक महिला वेशभूषा में तैयार होकर गांव के पुरुष धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। इस अनोखी परंपरा को देखकर बाहर से आने वाले लोग अक्सर हैरान रह जाते हैं, लेकिन गांव के लोगों के लिए यह आस्था और विश्वास का हिस्सा है जो पीढ़ियों से निभाया जा रहा है।

रति-मनमथ की पूजा से जुड़ी है परंपरा

सांथेकुडलूर गांव में होली का त्योहार प्रेम के देवता मनमथ और उनकी पत्नी रति की पूजा से जुड़ा हुआ है। इस दिन गांव के पुरुष महिलाओं की तरह कपड़े पहनकर मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। देश के अधिकांश हिस्सों में होली रंग-गुलाल और उत्सव के साथ मनाई जाती है, लेकिन इस गांव में धार्मिक श्रद्धा को विशेष महत्व दिया जाता है। पुरुष साड़ी और गहने पहनकर पूजा करते हैं और मानते हैं कि इससे गांव में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है।

दो दिनों तक चलता है यह विशेष उत्सव

इस परंपरा से जुड़ा उत्सव दो दिनों तक चलता है। इसकी शुरुआत काम दहन नामक अनुष्ठान से होती है। इसके बाद गांव के पुरुष महिलाओं के पारंपरिक कपड़े पहनकर धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। गांव के बुजुर्गों का मानना है कि होली के दिन पुरुषों का साड़ी पहनना दुर्भाग्य को दूर करता है और जीवन में खुशियां लाता है। इसी विश्वास के कारण यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

साड़ी पहनकर भजन गाते हैं गांव के पुरुष

उत्सव के दौरान गांव के पुरुष साड़ी और आभूषण पहनकर भजन-कीर्तन करते हैं और देवताओं की स्तुति करते हैं। इस दौरान पूरा गांव भक्ति और उत्साह के माहौल में डूबा रहता है। शाम के समय हाथी के जुलूस के साथ इस उत्सव का समापन होता है। ग्रामीणों का मानना है कि मनमथ की पूजा करने से नकारात्मकता दूर होती है और जीवन में खुशियां आती हैं।

गांव के लोगों का विश्वास है कि इस परंपरा को निभाने से उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। लोग प्रार्थना करते हैं कि अविवाहित युवाओं का विवाह हो जाए, निःसंतान दंपतियों को संतान प्राप्त हो, फसल अच्छी हो और गांव में समृद्धि बनी रहे। यहां की एक खास परंपरा यह भी है कि जिन लोगों की मनोकामना पूरी हो जाती है, वे फिर से साड़ी पहनकर भगवान के दर्शन करने आते हैं और आभार व्यक्त करते हैं।

दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु

इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए केवल आंध्र प्रदेश ही नहीं बल्कि कर्नाटक, तेलंगाना और महाराष्ट्र जैसे पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं। आधुनिक समय में भी यह परंपरा पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। सांथेकुडलूर गांव के लोग मानते हैं कि जब तक यह परंपरा जारी रहेगी, तब तक गांव में सुख-समृद्धि बनी रहेगी और पूर्वजों की संस्कृति भी जीवित रहेगी।

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