Gandhi Jayanti 2026: जिस महात्मा गांधी ने जीवनभर सादगी को अपनाया, उनके इस्तेमाल की कुछ बेहद साधारण चीजें आज लाखों-करोड़ों रुपये की कीमत हासिल कर चुकी हैं। गांधी जी का गोल चश्मा करोड़ों में नीलाम हुआ, उनकी पॉकेट घड़ी और चप्पलों के लिए भी लाखों रुपये की बोली लगी, जबकि उनकी हाथ से लिखी वसीयत भी नीलामी में 55 लाख रुपये से ज्यादा में बिकी। 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के मौके पर जब देश बापू को याद कर रहा है, तो उनके जीवन से जुड़ी इन खास निशानियों की कहानी भी दिलचस्प है। आखिर गांधी जी का चश्मा, घड़ी और चप्पलें आज कहां हैं, इन्हें किसने खरीदा और इनकी नीलामी कितनी कीमत पर हुई?
लिफाफे में मिला था गांधी जी का गोल चश्मा
महात्मा गांधी का गोल चश्मा उनकी सबसे पहचान वाली वस्तुओं में से एक माना जाता है। गांधी जी की तस्वीरों में अक्सर यह चश्मा उनके चेहरे पर नजर आता है, इसलिए इससे जुड़ी कोई भी वस्तु सामने आने पर लोगों की दिलचस्पी बढ़ जाती है। अगस्त 2020 में ब्रिटेन की नीलामी संस्था ईस्ट ब्रिस्टल ऑक्शन्स को गांधी जी का एक चश्मा बेहद सामान्य तरीके से मिला था। यह चश्मा किसी खास पैकेज या सुरक्षित बॉक्स में नहीं, बल्कि एक साधारण लिफाफे में नीलामी घर के लेटरबॉक्स में छोड़ा गया था। नीलामी संस्था के विशेषज्ञ एंड्र्यू स्टो ने जब इसकी जांच की तो उन्हें इसके गांधी जी से जुड़े होने की जानकारी मिली। शुरुआत में अनुमान लगाया गया था कि यह चश्मा करीब 14 लाख रुपये तक में बिक सकता है। लेकिन जैसे ही नीलामी शुरू हुई, दुनियाभर के कलेक्टरों की इसमें दिलचस्पी बढ़ने लगी। इसके बाद इसकी बोली अनुमान से कई गुना ऊपर चली गई और आखिरकार यह करीब 2.55 करोड़ रुपये यानी 2.6 लाख पाउंड में नीलाम हुआ।
अमेरिकी कलेक्टर ने खरीदा था बापू का चश्मा
नीलामी के दौरान गांधी जी के इस चश्मे को अमेरिका के एक निजी कलेक्टर ने खरीदा था। रिपोर्टों के मुताबिक, यह चश्मा गांधी जी को 1910 से 1930 के बीच उनके चाचा ने दिया था। उस समय गांधी जी दक्षिण अफ्रीका में रह रहे थे और वहां सामाजिक अन्याय के खिलाफ अपने संघर्ष को आगे बढ़ा रहे थे। चश्मे का संबंध जिस परिवार से सामने आया, उसके बारे में बताया गया कि इसके पुराने मालिक इंग्लैंड के मैनगॉट्सफील्ड में रहने वाले एक बुजुर्ग व्यक्ति थे। उनके परिवार के पास यह चश्मा लंबे समय से सुरक्षित था। बाद में जब इसे नीलामी के लिए पेश किया गया तो इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि सामने आई। चश्मे की नीलामी से मिली रकम को उसके पुराने मालिक ने अपनी बेटी के साथ बांटने का फैसला किया था। इस तरह गांधी जी की एक साधारण-सी रोजमर्रा की वस्तु ने अंतरराष्ट्रीय नीलामी में करोड़ों रुपये की कीमत हासिल की।
गांधी जी की स्विस पॉकेट वॉच का किस्सा
गांधी जी के जीवन में समय का विशेष महत्व था। वह अपने दैनिक जीवन में अनुशासन और समय की पाबंदी के लिए जाने जाते थे। उनके पास एक चांदी की अलार्म वाली पॉकेट वॉच भी थी। यह घड़ी स्विट्जरलैंड की प्रसिद्ध कंपनी Zenith की थी। जेनिथ की स्थापना 1865 में जॉर्जेस फावरे-जैकोट ने की थी। कंपनी लंबे समय से घड़ियों के निर्माण के लिए जानी जाती है। गांधी जी की यह घड़ी भी उनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा थी और लंबे समय तक उनके पास रही। साल 1944 में गांधी जी ने यह घड़ी अपने एक अनुयायी मोहनलाल शर्मा को दे दी थी। मोहनलाल शर्मा पेशे से बढ़ई थे और गांधी जी से जुड़े लोगों में शामिल बताए जाते हैं। गांधी जी से मिलने और उनके संपर्क में रहने के दौरान उन्हें यह घड़ी उपहार के रूप में मिली थी। इसके बाद यह उनके परिवार में सुरक्षित रही।
पोते को विरासत में मिली घड़ी, फिर हुई नीलाम
मोहनलाल शर्मा के पास गांधी जी की यह घड़ी कई वर्षों तक रही। बाद में यह परिवार की अगली पीढ़ी तक पहुंची। वर्ष 1975 में यह ऐतिहासिक घड़ी मोहनलाल शर्मा के पोते को विरासत में मिली। परिवार ने गांधी जी से जुड़ी इस निशानी को लंबे समय तक संभालकर रखा। समय के साथ गांधी जी की निजी वस्तुओं की ऐतिहासिक और संग्रहणीय कीमत बढ़ती गई। आखिरकार इस स्विस पॉकेट वॉच को अंतरराष्ट्रीय नीलामी के लिए पेश किया गया। वर्ष 2010 में यह घड़ी करीब 12.7 लाख रुपये में नीलाम हुई। गांधी जी की यह घड़ी सिर्फ एक महंगी नीलामी की वजह से चर्चा में नहीं आई, बल्कि इससे बापू के जीवन में समय और अनुशासन के महत्व से जुड़ी उनकी छवि भी सामने आती है। एक साधारण पॉकेट वॉच उनके जीवन की दिनचर्या और सादगी से जुड़ी महत्वपूर्ण निशानी बन गई।
जुहू बीच का घर और गांधी जी की भूरे रंग की चप्पलें
गांधी जी की सादगी का अंदाजा उनके पहनावे और इस्तेमाल की चीजों से भी लगाया जा सकता है। उनके जीवन से जुड़ी भूरे रंग की साधारण चप्पलें भी नीलामी में काफी चर्चा में रही हैं। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ये चप्पलें मुंबई के जुहू बीच के पास स्थित एक पुराने मकान से मिली थीं। बताया जाता है कि वर्ष 1917 से 1934 के बीच मुंबई प्रवास के दौरान गांधी जी इस मकान में अक्सर ठहरा करते थे। उस दौरान उनके इस्तेमाल की कुछ निजी वस्तुएं वहां रह गई थीं और बाद में इन्हीं वस्तुओं में उनकी चप्पलें भी मिलीं। गांधी जी के जीवन से जुड़ी होने के कारण इन साधारण चप्पलों को बाद में ऐतिहासिक महत्व की वस्तु माना गया और अंतरराष्ट्रीय नीलामी में पेश किया गया।
करीब 19 लाख रुपये में बिकीं गांधी जी की चप्पलें
जब गांधी जी की भूरे रंग की चप्पलों को नीलामी में रखा गया तो उन्हें खरीदने के लिए कई लोगों ने बोली लगाई। चप्पलों की अंतिम बोली 19,000 पाउंड तक पहुंची। भारतीय मुद्रा में यह रकम करीब 19 लाख रुपये के बराबर बताई गई। गौर करने वाली बात यह है कि चप्पलें अपने आप में बेहद सामान्य थीं। उनकी कीमत उनकी सामग्री से ज्यादा गांधी जी के जीवन से जुड़े ऐतिहासिक संबंध के कारण बनी। गांधी जी के इस्तेमाल की वस्तुओं को लेकर संग्रहकर्ताओं की दिलचस्पी का यह एक उदाहरण है। इन चप्पलों से गांधी जी के उस जीवन की भी झलक मिलती है, जिसमें महंगे और दिखावटी सामान की जगह जरूरत भर की चीजों को महत्व दिया जाता था।
गुजराती में लिखी गई थी गांधी जी की दो पन्नों की वसीयत
गांधी जी से जुड़ी महत्वपूर्ण निजी वस्तुओं में उनकी हाथ से लिखी गई वसीयत भी शामिल है। यह वसीयत उन्होंने अपनी मातृभाषा गुजराती में लिखी थी। यह दस्तावेज दो पन्नों का था और गांधी जी की निजी लिखावट में होने के कारण इसका ऐतिहासिक महत्व और बढ़ जाता है। जब इस वसीयत को नीलामी के लिए पेश किए जाने की जानकारी सामने आई, तो इतिहासकारों और गांधी जी से जुड़ी वस्तुओं को संग्रह करने वाले लोगों में काफी दिलचस्पी देखने को मिली। दस्तावेज की शुरुआती बोली ही 30,000 से 40,000 पाउंड के बीच रखी गई थी। इसके बाद नीलामी में बोली लगातार बढ़ती गई। गांधी जी के हाथ से लिखे होने और उनके निजी जीवन से जुड़े दस्तावेज होने की वजह से यह वसीयत एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में सामने आई।
55 लाख रुपये से ज्यादा में बिकी गांधी जी की वसीयतनामा
नीलामी के दौरान गांधी जी की दो पन्नों की वसीयत की अंतिम बोली 55,000 पाउंड तक पहुंच गई। भारतीय मुद्रा में यह रकम 55 लाख रुपये से अधिक बैठती है। इस तरह गांधी जी की लिखावट वाला यह छोटा-सा दस्तावेज भी लाखों रुपये की कीमत पर नीलाम हुआ। हालांकि, गोपनीयता से जुड़े नियमों के कारण वसीयत खरीदने वाले व्यक्ति की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई। यही वजह है कि इस दस्तावेज का मौजूदा निजी मालिक कौन है, इसकी जानकारी सार्वजनिक रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है। गांधी जी के चश्मे से लेकर उनकी घड़ी, चप्पलों और वसीयत तक की नीलामी यह बताती है कि इतिहास से जुड़ी किसी वस्तु का महत्व हमेशा उसकी कीमत या आकार से तय नहीं होता। बापू के जीवन की ये साधारण चीजें आज उनके जीवन, सादगी और उस दौर के इतिहास से जुड़ी महत्वपूर्ण निशानियों के रूप में देखी जाती हैं।




