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हूती, ईरान और सऊदी अरब की जंग में अमेरिका की भूमिका क्या? मेजर जनरल के.के. सिन्हा का विश्लेषण

हूती, ईरान और सऊदी अरब की जंग में अमेरिका की भूमिका क्या? मेजर जनरल के.के. सिन्हा का विश्लेषण

द फ्रंट डेस्क : मध्य पूर्व (Middle East) की भू-राजनीति में इन दिनों खलबली मची हुई है। पश्चिम एशिया के सुलगते हालात और वैश्विक महाशक्तियों की चालों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कूटनीति में कोई भी देश किसी का स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता, बल्कि केवल अपने स्वार्थ सर्वोपरि होते हैं। वरिष्ठ पत्रकार राणा यशवंत के साथ एक विशेष लाइव चर्चा में रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल के.के. सिन्हा (सेवानिवृत्त) ने सऊदी अरब की वर्तमान लाचारी, अमेरिका की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति, हूतियों के बढ़ते प्रभाव और बदलती युद्ध तकनीकों पर बहुत ही गहरी और स्पष्ट बातें रखीं। आइए इस पूरे घटनाक्रम और भू-राजनीतिक समीकरण को विस्तार से समझते हैं।

सऊदी अरब का संकट और अमेरिका की बेरुखी

दुनिया जानती है कि यमन के एक बड़े हिस्से पर हूती विद्रोहियों का कब्जा है और उन्हें ईरान का खुला समर्थन प्राप्त है। हूतियों के पास आधुनिक मिसाइलें, ड्रोन और युद्ध का पूरा साजो-सामान है। सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिका का सबसे करीबी और भरोसेमंद साझीदार रहा है। सऊदी ने अमेरिका को अपनी जमीन दी, उसका साथ निभाया और ईरान के खिलाफ हर मोर्चे पर खड़ा रहा। लेकिन आज जब सऊदी अरब हूतियों और ईरान के हमलों से घिर चुका है, तो अमेरिका वैसी खुलकर मदद नहीं कर रहा जैसी उम्मीद की जाती थी। सऊदी शासक मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के प्रमुख से स्पष्ट कहा है कि हालात उनके पक्ष में नहीं हैं और उन्हें तत्काल मदद चाहिए। इसके बावजूद, अमेरिका सीधे तौर पर हूतियों के खिलाफ इस भीषण दलदल में कूदने से कतरा रहा है।

अमेरिका का चरित्र: “अमेरिका First” और ट्रांजिएंट रिश्ते

मेजर जनरल के.के. सिन्हा ने अमेरिका के इतिहास और उसकी कार्यशैली का कच्चा चिट्ठा खोलते हुए बताया कि अमेरिका हमेशा से अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति पर चलता आया है। द्वितीय विश्व युद्ध के पहले और बाद के इतिहास को देखें तो अमेरिका ने हमेशा हर देश का इस्तेमाल केवल अपने फायदे के लिए किया है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराना हो, या शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ (USSR) को बिखेरना हो, अमेरिका का एकमात्र लक्ष्य दुनिया में अपनी सर्वोच्चता कायम रखना रहा है। यही वजह है कि जो बाइडन प्रशासन के समय से ही अमेरिका ने सऊदी अरब को एक तरह से पीछे छोड़ दिया था (हालांकि बाद में डोनाल्ड ट्रम्प के दौर में कूटनीतिक समीकरण थोड़े बदले)। आज अमेरिका खुद हूतियों के साथ परोक्ष संपर्क (Backchannel talks) साध रहा है ताकि लाल सागर (Red Sea) और बाब-अल-मंदेब (Bab-el-Mandeb) के रास्ते उसके अपने व्यावसायिक जहाज और तेल टैंकर सुरक्षित निकल सकें, भले ही इसके लिए उसे अपने पारंपरिक सहयोगियों की कीमत चुकानी पड़े।

पाकिस्तान और तुर्किए की कागजी कूटनीति

चर्चा के दौरान उस तथाकथित ‘इस्लामिक नाटो’ या ‘मक्का समझौते’ का भी जिक्र आया, जिसे कुछ समय पहले सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए ने मिलकर बनाने की बात कही थी। जानकारों का मानना है कि ऐसे समझौते केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं। पाकिस्तान की अपनी आंतरिक स्थिति बेहद खराब है। उसके सामने बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) जैसी गंभीर समस्याएं हैं, जहां उसकी सेना बुरी तरह उलझी हुई है। ऐसे में पाकिस्तान में यह हिम्मत नहीं है कि वह यमन के दुर्गम पहाड़ी इलाकों में जाकर हूतियों के खिलाफ सीधी जमीनी जंग लड़ सके। तुर्किए के राष्ट्रपति एर्दोगान बड़े-बड़े दावे जरूर करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि खाड़ी के इन देशों में संकट के समय कोई भी देश अपनी सेना झोंकने को तैयार नहीं है।

यमन का भूगोल और हूतियों का अजेय गढ़

यमन का भौगोलिक ढांचा ऐसा है कि वहां बाहरी ताकतों के लिए सैन्य जीत हासिल करना लगभग असंभव है। सना (San’a), सदा (Sa’dah) और हुदैदा (Hodeidah) के बीच का जो पहाड़ी त्रिकोण (Triangle) है, वह हूतियों का मुख्य गढ़ है। 2015 से 2022 तक चली लंबी लड़ाइयों में सऊदी नीत गठबंधन और यमन की आधिकारिक सेना हूतियों को इस इलाके से खदेड़ने में नाकाम रही। अंततः संयुक्त राष्ट्र (UN) की मध्यस्थता में समझौता करना पड़ा। आज हुदैदा पोर्ट और पेरिम द्वीप (Perim Island) जैसे बेहद रणनीतिक इलाके हूतियों के नियंत्रण में हैं। यहाँ से वे लाल सागर के संकरे समुद्री मार्ग को पूरी तरह नियंत्रित करते हैं।

युद्ध के बदलते तौर-तरीके: आधुनिक तकनीक और ‘जुगाड़’

इस पूरी जंग का सबसे बड़ा पहलू यह है कि आधुनिक युद्ध तकनीक ने महाशक्तियों के घमंड को तोड़ दिया है।

  • एयरक्राफ्ट कैरियर की विफलता: अमेरिका अपने विशालकाय एयरक्राफ्ट कैरियर (जैसे यूएसएस गेराल्ड फोर्ड या यूएसएस लिंकन) के बल पर दुनिया पर धौंस जमाता था। लेकिन हूतियों और ईरान ने एंटी-शिप मिसाइलों और ड्रोन हमलों से इन युद्धपोतों को इतना संवेदनशील बना दिया है कि अमेरिकी बेड़ों को भी पीछे हटने या संभलकर चलने पर मजबूर होना पड़ा है।
  • फिफ्थ जनरेशन जेट्स की चुनौती: आधुनिक F-35 जैसे लड़ाकू विमानों को रडार की पकड़ से बाहर माना जाता था, लेकिन नई तकनीकों और लेजर-बेस्ड ट्रैकिंग ने इनकी अजेयता को भी चुनौती दी है।
  • सस्ते ड्रोन और मिसाइलें: ईरान और उसके सहयोगियों (जैसे हूतियों और हिजबुल्लाह) ने कम लागत वाले ड्रोन्स और मिसाइलों के जरिए एक ऐसा ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ (Hybrid Warfare) खड़ा कर दिया है, जिसके सामने अमेरिका के खरबों डॉलर के हथियार भी बेअसर साबित हो रहे हैं।

भारत का स्वतंत्र और मजबूत रुख

रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर अमेरिकी कांग्रेस द्वारा 100% टैरिफ लगाने जैसी धमकियों पर चर्चा करते हुए यह स्पष्ट किया गया कि आज का भारत किसी के दबाव में आने वाला देश नहीं है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दुनिया के मंचों पर यह साफ कर दिया है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और 140 करोड़ देशवासियों के हितों को सर्वोपरि रखते हुए फैसले लेगा। अमेरिका खुद चाहे जितनी पाबंदियां लगाए, लेकिन वैश्विक बाजार में वैकल्पिक रास्ते तलाश लिए गए हैं और भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर अडिग है।

यह संघर्ष इस बात का प्रतीक है कि 21वीं सदी में युद्ध अब केवल हथियारों की संख्या से नहीं, बल्कि तकनीकी दक्षता, रणनीतिक भूगोल और राष्ट्रीय मनोबल से लड़े जाते हैं। अमेरिका जैसी महाशक्तियों का प्रभाव अब कमजोर पड़ रहा है, और क्षेत्रीय ताकतें अपनी शर्तों पर दुनिया को चलाना सीख रही हैं। यदि पश्चिम एशिया के इन सुलगते मुद्दों का कोई कूटनीतिक समाधान नहीं निकला, तो आने वाले समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति के लिए संकट और गहरा सकता है।

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