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इमरान के जाने और पाकिस्तान PM पद पर शरीफ के आने के क्या है भारत के लिए मायने? समझें

इमरान के जाने और पाकिस्तान PM पद पर शरीफ के आने के क्या है भारत के लिए मायने? समझें

नई दिल्ली, 10 अप्रैल 1973 को पाकिस्तान की संसद ने वहां के संविधान को मान्यता दी थी। ये दिन हमारे पड़ोसी देश के लिए बेहद अहम माना जाता है। लेकिन 49 साल बाद इसी दिन पाकिस्तान की जनता ने पहली बार देखा कि एक प्रधानमंत्री के तौर पर इमरान को अविश्वास प्रस्ताव के जरिए हटा दिया गया। क्रिकेट में उनके कैरियर का अंत जितने शानदार तरीके से हुआ था राजनीति में वो उतना ही नाटकीय और हैरत भरा रहा।

लेकिन भारत के दृष्टिकोण से देखा जाए तो उनका जाना नए रिश्ते कायम होने की शुरुआत माना जा सकता है। उनके पूर्ववर्ती नवाज शरीफ हमेशा भारत के साथ बेहतर रिश्ते कायम करने के पक्षधर थे। अलबत्ता इमरान खान पिछले दो ढाई सालों से जिस तरह से पीएम नरेंद्र मोदी और संघ की जिस तरह से आलोचना कर रहे थे उससे रिश्ते बद से बदतर ही हुए।

इमरान खान नया पाकिस्तान बनाने का वादा करके 2018 में सत्ता में आए थे। उन्होंने 18 अगस्त 2018 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। उनका 10 अप्रैल 2022 तक 1,332 दिनों का कार्यकाल रहा। वहां के इतिहास में आज तक किसी भी प्रधानमंत्री ने पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया है। अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान के समय इमरान संसद के निचले सदन में मौजूद नहीं थे। इमरान को हटाए जाने के साथ ही नए प्रधानमंत्री के चुनाव की कवायद शुरू हो गई। मौजूदा सदन का कार्यकाल अगस्त 2023 तक का है।

342 सदस्यीय नेशनल असेंबली में अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान के दौरान संयुक्त विपक्ष को 174 सदस्यों का समर्थन मिला था, जो प्रधानमंत्री को सत्ता से बाहर करने के लिए जरूरी संख्याबल यानी 172 से अधिक था। पाकिस्तान में एक बार फिर से दिखा कि राजनेता सेना के हाथ की कठपुतली भर हैं। सेना से तल्ख हुए रिश्तों की वजह से ही इमरान को पद से हटना पड़ गया।

सेना से संबंध बिगड़ने की शुरुआत तब हुई जब इमरान ने पिछले साल खुफिया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख की नियुक्ति को समर्थन देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद ऐसा माना जाता है कि उन्होंने शक्तिशाली सेना का समर्थन भी खो दिया था। खान लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद को खुफिया प्रमुख बनाए रखना चाहते थे लेकिन सेना के आलाकमान ने पेशावर में कोर कमांडर के तौर पर उनका तबादला कर दिया था।

हालांकि, रूस-यूक्रेन वॉर भी उनके पद से हटने के पीछे एक बड़ा कारण रहा। लड़ाई से पहले रूस की यात्रा करके इमरान ने अमेरिका के साथ अपने तमाम विरोधियों को मुखऱ कर दिया। सेना प्रमुख भी उनसे नाखुश थे। संकटग्रस्ट हुए तो भारत की तारीफ करने लग गए। इससे भी रावलपिंडी नाराज हुआ।

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