देहरादून: उत्तराखंड में पांचवीं विधानसभा के लिए हुए मतदान से लेकर भाजपा विधान मंडल दल की बैठक तक राज्य की राजनीति पूरे देश में चर्चा का विषय बनी रही। सभी की नजरें इस बात पर थी कि देवभूमि का नया मुखिया कौन होगा।
उत्तराखंड में 14 फरवरी को मतदान हुआ था। जिसके परिणाम 10 मार्च को सामने आए थे। इन चुनावों में 47 सीटें जीतकर भाजपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया था। प्रदेश में पांचवीं विधानसभा के लिए हुए चुनाव में सभी 70 सीटों पर 632 प्रत्याशी मैदान में थे। 10 बिंदुओं में जानते हैं पूरा घटनाक्रम…
-उत्तराखंड के अलग राज्य बनने से पहले भी अविभाजित उत्तर प्रदेश के इस हिस्से में भाजपा की जड़ें काफी मजबूत रहीं, लेकिन वर्ष 2014 में नरेन्द्र मोदी के गुजरात से आकर राष्ट्रीय राजनीति में पदार्पण के बाद तो पार्टी अविजित स्थिति में पहुंच गई है। तब से लेकर अब तक दो लोकसभा और दो विधानसभा चुनाव हुए हैं, जिनमें भाजपा को टक्कर देने में कांग्रेस असफल साबित हुई है।
– राज्य विधान सभा चुनाव में मिले दो-तिहाई बहुमत के बाद उत्तराखंड के भाजपा सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भेंट कर उन्हें जीत की बधाई दी। इस दौरान सांसदों ने राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से भी मुलाकात कर जीत पर उनका मुंह मीठा किया।
– इन चुनावों में भले ही भाजपा ने पूर्ण बहुमत प्राप्त किया लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खटीमा सीट से चुनाव हार गए। पुष्कर सिंह धामी के अपनी विधानसभा सीट से चुनाव हार जाने के बाद नए मुख्यमंत्री को लेकर भाजपा में दून से लेकर दिल्ली तक विमर्श चल रहा है। धामी के चुनाव हारने से उनकी स्वाभाविक दावेदारी कमजोर पड़ी है, लेकिन मुख्यमंत्री के लिए जा रहे नामों में उनका नाम चर्चा रहा।
–उत्तराखंड में हुए विधानसभा चुनाव में इस बार 75 प्रतिशत प्रत्याशी अपनी जमानत बचाने में सफल नहीं हुए। हैरत यह कि चुनाव लडऩे वाला ऐसा कोई दल नहीं है, जिसके प्रत्याशियों की जमानत जब्त न हुई हो। वर्ष 2017 कि चुनाव में 74 प्रतिशत प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई थी। यानी, इस बार जमानत गंवाने वाले प्रत्याशियों का आंकड़ा एक प्रतिशत अधिक है।
–इस विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर वर्षों पुराने मिथक टूटे हैं। राज्य गठन के बाद पांचवी विधानसभा में यह पहली बार ऐसा हुआ जब सत्ताधारी दल ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल की है। वहीं, गंगोत्री से सीट जीतने वाले विधायक के दल की सरकार बनने का मिथक बरकरार रहा। गंगोत्री से भाजपा के सुरेश चौहान ने जीत दर्ज की है।
–एक दिलचस्प संयोग यह रहा कि यहां शिक्षा मंत्री कभी चुनाव नहीं जीतता। पूर्ववर्ती सरकारों में ऐसा देखा भी गया। इस बार शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय के सामने इस मिथक को तोडऩे की चुनौती थी। उन्होंने यह मिथक तोड़ा और तकरीबन पांच हजार से अधिक मतों से गदरपुर सीट पर जीत हासिल की।
–प्रदेश में एक और मिथक मुख्यमंत्री आवास को लेकर भी है। वह यह कि जो भी इस आवास में रहता है, वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाता अथवा चुनाव नहीं जीतता। चाहे व पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी रहे या फिर रमेश पोखरियाल निशंक, विजय बहुगुणा हों या हरीश रावत और त्रिवेंद्र सिंह रावत इस आवास में रहने आए, लेकिन वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। इसके बाद पुष्कर सिंह धामी इस आवास में रहे और वह भी चुनाव हार गए।
– उत्तराखंड विधानस भा चुनाव में कर्नल अजय कोठियाल आम आदमी पार्टी (आप) के मुख्यमंत्री पद का चेहरा रहे। वह उत्तरकाशी जनपद की गंगोत्री सीट से चुनाव लड़े। इस चुनाव में वह अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए। उन्हें मात्र 6161 वोट मिले। अगर वोट प्रतिशत की बात करें तो उन्हें मात्र 10.33 वोट मिले।
– दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के बावजूद भाजपा विधायक दल के नेता के नाम को लेकर हो रहे विलंब के कारण शीर्ष नेतृत्व के बुलावे पर कार्यवाहक मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक, प्रदेश महामंत्री संगठन अजेय कुमार सहित कई नेता दिल्ली गए। यहां गृहमंत्री अमित शाह और रमेश पोखरियाल निशंक के आवास पर बैठक हुई। जिसके बाद यह तय किया गया कि सोमवार 21 मार्च को देहरादून में भाजपा विधायक दल की बैठक बुलाई गई।
– राष्ट्रीय नेतृत्व ने केंद्रीय पर्यवेक्षक व सह पर्यवेक्षक के रूप में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी को उत्तराखंड में नियुक्त किया। पार्टी के केंद्रीय कार्यालय से इसकी विधिवत सूचना भी प्रदेश कार्यालय को भेजी गई। केंद्रीय पर्यवेक्षक सोमवार दोपहर को देहरादून पहुंच जाएंगे और भाजपा विधायक दल की बैठक में शामिल होंगे। इस बैठक के बाद मुख्यमंत्री के नाम का चयन हो जाएगा।




