UGC Equity Regulations 2026: उच्च शिक्षा में समानता का दावा या कैंपस में नए विवाद की नींव? नियम, आंकड़े और विरोध की पूरी पड़ताल

देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को खत्म करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अपने मौजूदा नियमों को और सख्त बना दिया है। यूजीसी के नए नियम लागू होते ही राजनीतिक और सामाजिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक इस फैसले के खिलाफ और समर्थन में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

शिक्षा संस्थानों में भेदभाव समाप्त करने के उद्देश्य से लागू किए गए इन नए नियमों को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। कवियों से लेकर नेताओं तक, अलग-अलग वर्गों से इस मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष में आवाजें सामने आ रही हैं। कोई इसे सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रहा है, तो कोई इसे शिक्षा व्यवस्था में नया टकराव पैदा करने वाला नियम मान रहा है।

इसी क्रम में कवि कुमार विश्वास और शिवसेना (यूबीटी) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने जहां इन नियमों पर तीखी आपत्ति जताई है, वहीं आरजेडी से जुड़े कुछ नेताओं ने इन नियमों को लंबे समय से चले आ रहे भेदभाव के खिलाफ जरूरी कदम बताया है। कुल मिलाकर, यूजीसी के नए नियमों को लेकर सियासी संग्राम छिड़ चुका है।

क्या है UGC का नया ‘इक्विटी’ नियम?

दरअसल, University Grants Commission (UGC) ने 15 जनवरी 2026 से पूरे देश में UGC Equity Regulations 2026 लागू किए हैं। इन नियमों का सीधा उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति, जेंडर या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर होने वाले भेदभाव को खत्म करना है। यूजीसी का कहना है कि किसी भी छात्र, शिक्षक या कर्मचारी के साथ उसकी पहचान के कारण बुरा व्यवहार नहीं होना चाहिए और यदि ऐसा होता है, तो उसके खिलाफ सख्त और समयबद्ध कार्रवाई होनी चाहिए।

ये नए नियम 2012 में बनाए गए पुराने दिशानिर्देशों की जगह लेंगे। यूजीसी का तर्क है कि पुराने नियम अब समय के अनुरूप नहीं रह गए थे और उनमें कई व्यावहारिक खामियां थीं। इसलिए नियमों को ज्यादा स्पष्ट, सख्त और जवाबदेह बनाया गया है, ताकि हर छात्र को बराबरी और सम्मान मिल सके।

इन नियमों की जरूरत क्यों महसूस की गई?

यूजीसी की नई गाइडलाइन का सीधा संबंध उन घटनाओं से जुड़ता है, जिन्होंने देश को झकझोर दिया था। 2016 में हैदराबाद यूनिवर्सिटी के रिसर्च स्कॉलर रोहित वेमुला की आत्महत्या और इसके बाद मेडिकल छात्रा पायल तडवी का मामला सामने आया। दोनों मामलों में जातिगत भेदभाव और संस्थागत उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगे थे।

ये मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे, जहां अदालत ने माना कि उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए मौजूदा नियम पर्याप्त नहीं हैं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को निर्देश दिया कि वह पुराने नियमों की जगह ज्यादा सख्त, स्पष्ट और प्रभावी गाइडलाइन बनाए। इन्हीं निर्देशों के बाद 2026 के नए इक्विटी रेगुलेशंस लागू किए गए।

हर कॉलेज में क्यों बन रही है ‘इक्विटी सेल’?

नए नियमों के तहत अब चाहे सरकारी कॉलेज हो या निजी विश्वविद्यालय, हर संस्थान में एक ‘Equity Cell’ बनाना अनिवार्य कर दिया गया है। यह सेल शिकायत निवारण मंच के तौर पर काम करेगी। अगर किसी छात्र या कर्मचारी को लगता है कि उसके साथ भेदभाव हुआ है, तो वह यहां अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। नियमों के मुताबिक संस्थान को इस शिकायत पर तय समय सीमा के भीतर कार्रवाई करनी होगी।

विवाद की जड़ क्या है?

अगर नियमों का उद्देश्य समानता है, तो फिर इतना विरोध क्यों हो रहा है? इस विवाद के पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी वजहें सामने आ रही हैं।

सबसे बड़ा विवाद OBC वर्ग को जातिगत भेदभाव की श्रेणी में शामिल करने को लेकर है। नए नियमों में अन्य पिछड़ा वर्ग को भी स्पष्ट रूप से इस कैटेगरी में रखा गया है। जनरल कैटेगरी के कई छात्रों और संगठनों का कहना है कि OBC वर्ग को पहले से ही आरक्षण जैसी सुविधाएं मिल रही हैं, ऐसे में उन्हें भी इसी श्रेणी में रखना अन्य छात्रों के साथ असंतुलन पैदा कर सकता है।

दूसरी वजह शिक्षा की गुणवत्ता और वैश्विक रैंकिंग को लेकर उठाए जा रहे सवाल हैं। आलोचकों का कहना है कि भारतीय विश्वविद्यालय पहले ही विश्व रैंकिंग में पीछे हैं और ऐसे समय में सरकार और यूजीसी को पढ़ाई, रिसर्च और इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, न कि ऐसे नियमों पर जो विवाद और तनाव बढ़ाएं।

आम छात्रों और अभिभावकों के लिए इसका क्या मतलब है?

सीधे शब्दों में कहें तो अब विश्वविद्यालय परिसरों में अनुशासन और जवाबदेही को लेकर सख्ती बढ़ेगी। कॉलेज प्रशासन भेदभाव से जुड़ी शिकायतों को नजरअंदाज नहीं कर पाएगा। जहां एक ओर इसे वंचित और पिछड़े वर्गों के लिए सुरक्षा कवच माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इससे छात्रों के बीच आपसी अविश्वास और खींचतान बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।

नए कानून में क्या बड़ा बदलाव किया गया है?

अब तक उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतें मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तक सीमित मानी जाती थीं। नए रेगुलेशंस के तहत OBC वर्ग को भी स्पष्ट रूप से इस श्रेणी में शामिल कर लिया गया है। इसका मतलब यह है कि अब OBC छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी अपने साथ होने वाले उत्पीड़न या भेदभाव की शिकायत आधिकारिक रूप से दर्ज करा सकेंगे।

हर संस्थान को क्या-क्या करना होगा अनिवार्य?

नए नियमों के अनुसार हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में SC, ST और OBC के लिए समान अवसर प्रकोष्ठ बनाना अनिवार्य होगा। विश्वविद्यालय स्तर पर एक समानता समिति गठित की जाएगी, जिसमें OBC, महिला, SC, ST और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधियों की मौजूदगी जरूरी होगी। यह समिति हर छह महीने में अपनी रिपोर्ट तैयार कर यूजीसी को भेजेगी। यूजीसी का कहना है कि इससे शिकायतों की निगरानी, जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ेगी।

जनरल कैटेगरी के छात्रों में नाराजगी क्यों है?

नई गाइडलाइन को लेकर सबसे बड़ा विरोध जनरल कैटेगरी के छात्रों की ओर से देखने को मिल रहा है। उनका कहना है कि नियमों का डिजाइन और क्रियान्वयन ड्यू प्रोसेस और एकेडमिक फ्रीडम को प्रभावित कर सकता है। आलोचकों का तर्क है कि शिकायतकर्ता को तो पूरी सुरक्षा और गोपनीयता दी गई है, लेकिन आरोपी के अधिकारों और निष्पक्ष जांच की प्रक्रिया को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

झूठी शिकायतों को लेकर क्यों उठ रहे सवाल?

जनरल कैटेगरी के छात्रों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि जानबूझकर झूठी शिकायत करने वालों के लिए कोई स्पष्ट दंड प्रावधान तय नहीं किया गया है। उनका कहना है कि इससे गलत शिकायतों की संभावना बढ़ सकती है और एक झूठा आरोप भी किसी छात्र का करियर, पढ़ाई और भविष्य बर्बाद कर सकता है।

शिकायत दर्ज होने पर क्या प्रक्रिया होगी?

यूजीसी के नियमों के अनुसार जातिगत भेदभाव की शिकायत मिलने पर इक्विटी कमेटी मामले की जांच करेगी और अपनी रिपोर्ट संस्थान प्रमुख को सौंपेगी। दोष सिद्ध होने पर चेतावनी, जुर्माना या गंभीर मामलों में निष्कासन जैसी कार्रवाई हो सकती है। हालांकि आरोपी को 30 दिनों के भीतर फैसले के खिलाफ अपील करने का अधिकार भी दिया गया है।

समर्थकों का पक्ष क्या कहता है?

नए नियमों के समर्थकों का कहना है कि दशकों से SC, ST और OBC छात्रों को संस्थागत भेदभाव का सामना करना पड़ा है, लेकिन उनकी शिकायतें अक्सर गंभीरता से नहीं ली गईं। उनके मुताबिक बिना सख्त नियमों और समयबद्ध कार्रवाई के कैंपस में समानता केवल कागजों तक सीमित रह जाती है। वे मानते हैं कि यह व्यवस्था किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि पीड़ित छात्रों की सुरक्षा के लिए है।

यूपी में क्यों तेज हुई हलचल?

उत्तर प्रदेश में यह मुद्दा खास तौर पर राजनीतिक रंग ले चुका है। गाजियाबाद की डासना पीठ के पीठाधीश्वर यति नरसिंहानंद गिरि ने खुले तौर पर यूजीसी के नियमों का विरोध शुरू किया। वह जंतर-मंतर पर अनशन के लिए दिल्ली जा रहे थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें गाजियाबाद में ही रोककर नजरबंद कर दिया। इसके बाद उन्होंने योगी सरकार पर सवर्ण समाज की आवाज दबाने का आरोप लगाया, जिससे विवाद और गहरा गया।

सोशल मीडिया पर क्यों छिड़ी जंग?

इस रेगुलेशन को लेकर सोशल मीडिया पर भी तीखी बहस चल रही है। अगड़ी जातियों से जुड़े कई यूट्यूबर और एक्टिविस्ट इसे “सवर्ण विरोधी कानून” बता रहे हैं, जबकि सामाजिक न्याय से जुड़े लोग इसे बराबरी और सम्मान की दिशा में जरूरी सुधार मान रहे हैं।

क्या कहते हैं आंकड़े?

यूजीसी द्वारा संसद और सुप्रीम कोर्ट में पेश आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच वर्षों में जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में 118.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2019-20 में जहां 173 शिकायतें दर्ज हुई थीं, वहीं 2023-24 में यह संख्या बढ़कर 378 हो गई। 704 विश्वविद्यालयों और 1553 कॉलेजों से कुल 1160 शिकायतें सामने आईं। यूजीसी इन आंकड़ों को नए नियमों के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क के रूप में पेश कर रहा है।

निष्कर्ष: समाधान या नया विवाद?

UGC Equity Regulations 2026 का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और गरिमा सुनिश्चित करना है, लेकिन इसके मौजूदा स्वरूप ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। एक ओर यह नियम उन छात्रों के लिए उम्मीद की किरण हैं, जो वर्षों से खुद को हाशिए पर महसूस करते रहे, वहीं दूसरी ओर जनरल कैटेगरी के छात्रों को डर है कि कहीं यह व्यवस्था निष्पक्षता की जगह नया असंतुलन न पैदा कर दे। आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि इन नियमों का अमल इस तरह हो, जिससे कैंपस वास्तव में भेदभाव-मुक्त बनें और न्याय सभी के लिए समान रूप से सुनिश्चित हो सके।

यूजीसी के फैसले को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। आइए जानते हैं कि यूजीसी के नए नियमों पर किसने क्या कहा है।

मैं सवर्ण हूं, मेरा रंग सांवला — कुमार विश्वास

यूजीसी के नए नियमों को लेकर कवि कुमार विश्वास ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने दिवंगत रमेश रंजन मिश्र द्वारा रचित कविता की कुछ पंक्तियां साझा करते हुए यूजीसी से नियमों को वापस लेने की मांग की। अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर उन्होंने लिखा—

“चाहे तिल ले लो गाढ़ लो राजा,

राई ले लो पहाड़ लो राजा,

मैं अभागा ‘सवर्ण’ हूं मेरा,

रंग सांवला उखाड़ लो राजा।”

(स्व. रमेश रंजन मिश्र)

इस कविता को साझा करते हुए कुमार विश्वास ने कहा कि यूजीसी जिस तरह से नियम लागू कर रहा है, वह लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ है। उन्होंने नए नियमों को वापस लेने की मांग करते हुए अपनी आपत्ति दर्ज कराई।

दोष और भेदभाव कैसे होगा तय — प्रियंका चतुर्वेदी

शिवसेना (यूबीटी) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने भी यूजीसी के नए नियमों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि कैंपस में किसी भी तरह का जाति आधारित भेदभाव गलत है और भारत में इसके दुष्परिणाम पहले भी सामने आ चुके हैं, लेकिन क्या किसी कानून को लागू करने से पहले सभी पक्षों की सुरक्षा और सहमति सुनिश्चित नहीं की जानी चाहिए?

प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि नए नियमों के दुरुपयोग से बचाव को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसे मामलों की जांच कैसे होगी और दोष किस आधार पर तय किया जाएगा। भेदभाव को शब्दों, व्यवहार या धारणा में से किस आधार पर परिभाषित किया जाएगा, यह भी साफ नहीं है। उन्होंने कहा कि कानून लागू करने की प्रक्रिया सभी के लिए पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए। इसलिए उन्होंने यूजीसी से अपील की कि या तो इस अधिसूचना को वापस लिया जाए या फिर आवश्यक संशोधन किए जाएं।

पंडितों और ठाकुरों के खिलाफ मुकदमे होंगे — राकेश टिकैत

भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने भी यूजीसी के नए कानून का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि इस तरह के नियम समाज में आपसी तनाव और दुश्मनी को बढ़ावा दे सकते हैं। टिकैत का कहना है कि नया कानून जाति के आधार पर आरोप लगाने की दिशा में बढ़ रहा है।

उन्होंने आशंका जताई कि इस व्यवस्था के तहत पंडितों और ठाकुरों जैसे समुदायों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए जाएंगे। राकेश टिकैत ने आरोप लगाया कि सरकार समाज को धर्म और जाति के आधार पर बांटने की कोशिश कर रही है, जिससे लगातार मुकदमेबाजी का माहौल बनेगा।

धर्म-जाति के आधार पर भेदभाव स्वीकार नहीं — जितेंद्र सिंह

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पार्टी महासचिव जितेंद्र सिंह अलवर ने यूजीसी के नए नियमों को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि धर्म, जाति या पहचान के आधार पर भेदभाव किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है, लेकिन शिक्षा संस्थान समाज की असली तस्वीर होते हैं और वहां इस तरह के नियम छात्रों को आपस में बांटने का काम कर सकते हैं।

जितेंद्र सिंह का कहना है कि यूजीसी द्वारा लाए गए 2026 के नियम छात्रों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने जैसे प्रतीत होते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ये दिशानिर्देश छात्र विरोधी हैं और छात्रों को गुमराह कर शैक्षणिक संस्थानों को कमजोर करने की कोशिश है।

एक वर्ग को ऐतिहासिक अपराधी बनाया जा रहा — प्रवीण भूषण

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रवीण भूषण ने भी यूजीसी के नियमों का विरोध करते हुए कहा कि भारतीय समाज के एक वर्ग को लगातार ‘ऐतिहासिक अपराधी’ के रूप में पेश किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इतिहास में बाहरी आक्रांताओं और उपनिवेशी ताकतों द्वारा किए गए अत्याचारों को भुला दिया गया, लेकिन देश के भीतर एक समुदाय को बदनाम करने की कोशिश जारी है।

उनका कहना है कि शासन तंत्र इस सोच को आगे बढ़ा रहा है, जिससे सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है।

सर्व समाज को साथ लेकर निर्णय — संजय सिंह

बीजेपी नेता और पूर्व मंत्री डॉ. संजय सिंह ने भी यूजीसी के नए नियमों पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में शिक्षा संस्थानों में आरोप-प्रत्यारोप के बजाय सकारात्मक माहौल की जरूरत है। किसी एक समुदाय के खिलाफ बनाई गई व्यवस्था न्याय नहीं कर सकती।

संजय सिंह ने कहा कि ऐसे फैसलों में सभी वर्गों की भागीदारी जरूरी है, ताकि कोई भी खुद को अलग-थलग या असहज महसूस न करे।

यूजीसी के नए नियम के समर्थक — लक्ष्मण यादव

दलित-ओबीसी चिंतक लक्ष्मण यादव ने यूजीसी के नए नियमों का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा संस्थानों में ‘इक्विटी कमेटी’ का गठन कर SC, ST और OBC को इसमें शामिल करना एक जरूरी कदम है।

उनका कहना है कि अब तक उच्च शिक्षा संस्थानों में दलितों और पिछड़े वर्गों के साथ भेदभाव की शिकायतें सामने आती रही हैं और यह नियम उसी समस्या के समाधान की कोशिश है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि समानता सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है।

सवर्णों को फंसाया जाना चाहिए — कन्हैया यादव

यूजीसी के नए नियमों को लेकर आरजेडी प्रवक्ता कन्हैया यादव का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में वह कहते हैं कि शिक्षा संस्थानों में वर्षों तक दलितों और ओबीसी को पीछे रखा गया और उनका शोषण किया गया। उनका दावा है कि 90 फीसदी लोगों को उनका हक नहीं मिला, इसलिए अब जवाबदेही तय होनी चाहिए।

कन्हैया यादव ने अपने एक अन्य बयान में सवर्ण जातियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब भी ओबीसी आरक्षण पर सवाल उठा, तिलक, तराजू और तलवार की राजनीति सड़क पर उतर आई। उन्होंने यह भी पूछा कि अगर वही ताकतें बार-बार सक्रिय होती हैं, तो फिर हिंदू राष्ट्र की बात कहां तक सही है।

यूजीसी के नए नियम पर छिड़ा संग्राम

गौरतलब है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने शिक्षा संस्थानों में सामाजिक भेदभाव को खत्म करने के लिए ये नए नियम लागू किए हैं। यूजीसी का दावा है कि इससे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में समानता का माहौल बनेगा, लेकिन अगड़ी जातियों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और कायस्थ—के बीच इन नियमों को लेकर भारी विरोध है।

नए नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को परिभाषित किया गया है और इसे रोकने के लिए इक्विटी कमेटियों के गठन का प्रावधान किया गया है। इन कमेटियों में आरक्षित वर्गों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी अनिवार्य होगी, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों और कर्मचारियों के लिए पर्याप्त संतुलन न होने का आरोप लगाया जा रहा है। इसी वजह से UGC 2026 को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है।

देशभर में सवर्ण समुदाय से जुड़े लोग इन नियमों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं और उनका कहना है कि यह व्यवस्था शिक्षा संस्थानों में नई तरह का भेदभाव पैदा कर सकती है। अलग-अलग राज्यों में विरोध प्रदर्शन और बयानबाजी के चलते यूजीसी के नए नियम अब एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे का रूप ले चुके हैं।

Share post:

Popular

More like this
Related