UGC नियम, शंकराचार्य विवाद और इस्तीफे: UP में सियासी-प्रशासनिक घमासान की पूरी कहानी

उत्तर प्रदेश में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों और शंकराचार्य से जुड़े विवाद के बाद प्रशासनिक और सियासी हलकों में जबरदस्त उथल-पुथल देखने को मिल रही है। शुरुआत भले ही शिक्षा नीति से जुड़े सवालों से हुई हो, लेकिन समय के साथ यह मामला धार्मिक भावनाओं, सामाजिक असंतोष और राजनीतिक टकराव में तब्दील हो गया। हालात इस कदर बिगड़े कि इसका असर सीधे-सीधे प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ा और सरकारी अफसरों के इस्तीफे सामने आने लगे। बरेली से लेकर अयोध्या तक फैली इस पूरी श्रृंखला ने सरकार और प्रशासन के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

UGC के नए नियम और विवाद की शुरुआत

इस पूरे विवाद की जड़ UGC द्वारा जारी किए गए नए नियम माने जा रहे हैं। इन नियमों को लेकर आरोप लगे कि वे छात्रों के एक वर्ग को पहले से ही संदेह के घेरे में रखते हैं। आलोचकों का कहना है कि शिकायत और सुनवाई की प्रक्रिया में संतुलन का अभाव है और इससे सामान्य वर्ग के छात्रों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। कई संगठनों ने आशंका जताई कि इन प्रावधानों का दुरुपयोग संभव है और इससे शिक्षा संस्थानों में भय और अविश्वास का माहौल बन सकता है।

इन्हीं आशंकाओं को लेकर देशभर में विरोध शुरू हुआ। राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और छात्र समूहों ने इन नियमों को भेदभावपूर्ण बताते हुए UGC से इन्हें वापस लेने या इनमें संशोधन की मांग की। धीरे-धीरे यह मुद्दा केवल शिक्षा नीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया।

शंकराचार्य विवाद और सियासी बयानबाज़ी

UGC नियमों के विरोध के बीच शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ा विवाद सामने आया, जिसने इस पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया। आरोप है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर की गई कथित टिप्पणी ने राजनीतिक तापमान को और बढ़ा दिया। इसके बाद मामला केवल प्रशासनिक या शैक्षणिक न रहकर धार्मिक सम्मान और राजनीतिक समर्थन-विरोध के रूप में देखा जाने लगा।

इस विवाद के बाद अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक समूह खुलकर आमने-सामने आ गए। बयानबाज़ी तेज हुई और मुद्दा शिक्षा सुधार से हटकर वैचारिक टकराव में बदलने लगा, जिसका असर प्रशासनिक तंत्र पर भी साफ दिखाई देने लगा।

पहला इस्तीफा: बरेली सिटी मजिस्ट्रेट आलंकार अग्निहोत्री

26 जनवरी को बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट आलंकार अग्निहोत्री ने इस्तीफा देकर पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया। अपने इस्तीफे में उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में ‘ब्राह्मण विरोधी अभियान’ चल रहा है और सामान्य वर्ग को योजनाबद्ध तरीके से निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने प्रयागराज में माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्यों के साथ कथित दुर्व्यवहार का भी उल्लेख किया।

अलंकार अग्निहोत्री ने दावा किया कि मौनी अमावस्या के दिन स्नान के दौरान शिष्यों और बुजुर्ग भिक्षुओं के साथ मारपीट की गई, जिससे वे मानसिक रूप से आहत हुए। उस समय इन आरोपों पर सरकार या प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई, लेकिन इस्तीफे ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी।

दूसरा इस्तीफा: अयोध्या के GST डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह

बरेली के बाद अयोध्या से आया दूसरा इस्तीफा इस विवाद को और गहरा कर गया। अयोध्या के GST डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह ने भी पद छोड़ने का ऐलान कर दिया। उन्होंने राज्यपाल को दो पन्नों का इस्तीफा पत्र भेजते हुए साफ कहा कि वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में यह कदम उठा रहे हैं।

अपने बयान में उन्होंने कहा,
“जिस प्रदेश का नमक खाता हूं और जहां से वेतन मिलता है, मैं उसका पक्षधर हूं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए मुख्यमंत्री हैं और उनका अपमान मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता।”

UGC और शंकराचार्य विवाद से मानसिक तनाव का दावा

प्रशांत कुमार सिंह ने यह भी बताया कि शंकराचार्य द्वारा मुख्यमंत्री पर की गई कथित अभद्र टिप्पणी से वे बेहद आहत थे और पिछले तीन दिनों से मानसिक तनाव में थे। उन्होंने कहा कि UGC के नाम पर जिस तरह की राजनीति की जा रही है, उससे वे गहराई से दुखी हैं और इसी वजह से उन्होंने इस्तीफा देने का फैसला किया।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया जाएगा, तो वे अपने निजी संसाधनों से सामाजिक कार्यों में सक्रिय रूप से जुड़ेंगे।

राजनीति, प्रशासन और समाज—तीनों स्तरों पर टकराव

इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि UGC के नियमों से शुरू हुआ विवाद अब केवल शिक्षा नीति तक सीमित नहीं रहा। यह अब धार्मिक सम्मान, सामाजिक वर्गों के बीच तनाव और राजनीतिक समर्थन-विरोध का व्यापक मुद्दा बन चुका है। बरेली से लेकर अयोध्या तक सामने आए इस्तीफों ने सरकार, विपक्ष और प्रशासन—तीनों को आमने-सामने खड़ा कर दिया है।

फिलहाल, इस पूरे मामले पर राज्य सरकार की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन जिस तरह घटनाएं आगे बढ़ रही हैं, उससे यह साफ है कि आने वाले दिनों में यह विवाद और गहराने वाला है।

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