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“हिंदी भाषा को बंगाल-तमिलनाडु में थोपकर दिखाओ”: उद्धव ठाकरे का BJP को खुला चैलेंज

“हिंदी भाषा को बंगाल-तमिलनाडु में थोपकर दिखाओ”: उद्धव ठाकरे का BJP को खुला चैलेंज

Maharashtra News Desk: महाराष्ट्र में भाषा को लेकर सियासत गरमा गई है। शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने शनिवार को राज्य सरकार द्वारा हिंदी को स्कूलों में अनिवार्य करने की कोशिशों को लेकर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और भाजपा पर सीधा हमला बोला। ठाकरे ने कहा, “अगर हिम्मत है तो बंगाल और तमिलनाडु में हिंदी थोप कर दिखाओ।”

 “कोई मराठी दिखाओ जो बाहर मराठी थोपता हो”

उद्धव ठाकरे ने मंच से फडणवीस को घेरते हुए कहा, “आप कहते हैं कि भाषा की गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं करेंगे, तो बताइए एक भी मराठी व्यक्ति जो महाराष्ट्र के बाहर मराठी थोपता हो।” उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भाजपा हिंदी को हर राज्य पर थोपने की कोशिश कर रही है?

हिंदी अनिवार्यता पर बवाल

दरअसल, महाराष्ट्र सरकार ने 16 अप्रैल को एक आदेश जारी कर कक्षा 1 से 5 तक अंग्रेज़ी और मराठी माध्यम के स्कूलों में हिंदी को तीसरी अनिवार्य भाषा बनाने का आदेश दिया था। इस फैसले के खिलाफ साहित्यकारों, कलाकारों और राजनीतिक दलों ने विरोध दर्ज कराया। विरोध के बाद 17 जून को सरकार को आदेश में बदलाव करते हुए हिंदी को वैकल्पिक भाषा बनाना पड़ा।

उद्धव-राज की 20 साल बाद जोड़ी

उद्धव ठाकरे यह बयान शिवसेना (UBT) और मनसे (MNS) के संयुक्त कार्यकर्ता सम्मेलन में दे रहे थे, जिसमें राज ठाकरे भी मौजूद थे। दोनों ठाकरे नेताओं का यह पहला साझा मंच था, करीब 20 साल बाद दोनों भाई एकजुट दिखाई दिए। दोनों ने मंच से सरकार की नीतियों पर तीखा हमला बोला।

राष्ट्रीय प्रतिक्रिया भी तेज

महाराष्ट्र की इस ‘हिंदी बनाम मातृभाषा’ बहस में तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के नेताओं की पुरानी आपत्तियाँ भी सामने आई हैं। मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने कहा था, “तमिलनाडु हिंदी उपनिवेशवाद नहीं सहेगा। केंद्र सरकार की योजनाओं, संस्थानों और पुरस्कारों तक में हिंदी थोपना गैरजरूरी है।”

वहीं, ममता बनर्जी ने कहा था, “हर राज्य की अपनी भाषा और पहचान है। भाजपा यह तय नहीं कर सकती कि राज्य क्या सीखेगा। यह भारत है, हर भाषा की अपनी जगह है।“

अमित शाह की सफाई

इससे पहले गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि हिंदी किसी भी भारतीय भाषा की विरोधी नहीं है, बल्कि सभी भाषाओं की ‘सखी’ है। उन्होंने जोर दिया कि हिंदी कोई प्रतिस्पर्धा नहीं कर रही, बल्कि एक सेतु का काम करती है।

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