Online bahis kullanıcılarının %54’ü haftada en az bir kez canlı bahis oynamaktadır; bu oran bahsegel giriş platformunda %63’tür.

Engellemelerden etkilenmemek için bettilt sık sık kontrol ediliyor.

Bahsegel güncel giriş bahsegel bettilt

OECD raporları, kullanıcıların %52’sinin “kayıp limiti” belirleyen platformları tercih ettiğini göstermektedir; paribahis bu özelliği destekler.

bahsegel giriş bettilt bahsegel bahsegel giriş bahsegel

TMC की पकड़, BJP की चुनौती और वाम-कांग्रेस की वापसी की कोशिश… बंगाल की सियासत में किसका पलड़ा भारी?

TMC की पकड़, BJP की चुनौती और वाम-कांग्रेस की वापसी की कोशिश… बंगाल की सियासत में किसका पलड़ा भारी?

द फ्रंट डेस्क: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा के साथ ही राज्य की राजनीति एक बार फिर गर्मा गई है। चुनाव आयोग ने बताया है कि राज्य में मतदान 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में कराया जाएगा। जैसे ही चुनावी कार्यक्रम सामने आया, वैसे ही सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC), मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (BJP) और वामपंथी दलों तथा कांग्रेस की ताकत और कमजोरियों को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी पिछले एक दशक से भी अधिक समय से राज्य की सत्ता पर काबिज है। पार्टी की सबसे बड़ी ताकत ममता बनर्जी की मजबूत और संघर्षशील राजनीतिक छवि मानी जाती है। बंगाल की राजनीति में उनका जनाधार अब भी बेहद मजबूत माना जाता है और यही कारण है कि विपक्षी दलों के लिए उन्हें चुनौती देना आसान नहीं रहा है। बीते वर्षों में उन्होंने खुद को न केवल राज्य की प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित किया है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्ष की एक प्रमुख आवाज बनकर उभरी हैं।

टीएमसी का मजबूत संगठनात्मक ढांचा

टीएमसी की दूसरी बड़ी ताकत उसका व्यापक संगठनात्मक नेटवर्क है। राज्य नेतृत्व से लेकर गांव-कस्बों तक बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं की मजबूत मौजूदगी पार्टी की चुनावी ताकत मानी जाती है। पंचायत, नगरपालिकाओं और स्थानीय निकायों में पार्टी की मजबूत पकड़ ने इस संगठन को और मजबूत किया है। इसी नेटवर्क के जरिए पार्टी मतदाताओं तक अपनी पहुंच बनाए रखने और चुनावी रणनीति को जमीन तक पहुंचाने में सफल रही है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान भी टीएमसी ने अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखा, ताकि स्थानीय स्तर पर प्रक्रिया की निगरानी की जा सके और पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक को सुरक्षित रखा जा सके। इसके अलावा लक्ष्मी बंधन, कन्याश्री और स्वास्थ्य साथी जैसी कल्याणकारी योजनाओं के जरिए पार्टी ने महिलाओं, ग्रामीण मतदाताओं और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बीच अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने की कोशिश की है।

टीएमसी की चुनौतियां भी कम नहीं

हालांकि टीएमसी के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। लंबे समय से सत्ता में रहने के कारण पार्टी को सत्ता विरोधी माहौल का सामना करना पड़ सकता है। कई जिलों में प्रशासनिक कामकाज को लेकर असंतोष, भ्रष्टाचार के आरोप और स्थानीय नेताओं के खिलाफ नाराजगी जैसे मुद्दे सामने आते रहे हैं। इसके अलावा पार्टी के भीतर गुटबाजी भी एक समस्या मानी जाती है। कई जिलों में स्थानीय नेताओं के बीच राजनीतिक प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा और टकराव की खबरें सामने आती रही हैं, खासकर स्थानीय चुनावों के दौरान। ऐसी परिस्थितियां संगठनात्मक एकजुटता को प्रभावित कर सकती हैं, खासकर तब जब पार्टी को चुनावी मैदान में पूरी ताकत के साथ उतरना हो।

बीजेपी की उम्मीदें और रणनीति

दूसरी ओर बीजेपी भी इस बार बंगाल चुनाव को लेकर पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरने की कोशिश कर रही है। पार्टी को उम्मीद है कि टीएमसी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रभाव और केंद्रीय नेतृत्व की चुनावी रणनीति उसे फायदा पहुंचा सकती है। बीजेपी ने बंगाल में अपनी राजनीतिक जमीन बनाने के लिए हिंदुत्व आधारित वैचारिक ध्रुवीकरण, भ्रष्टाचार के मुद्दे और कानून-व्यवस्था जैसे सवालों को लगातार उठाया है। पिछले एक दशक के चुनावी नतीजों को देखें तो बीजेपी ने पारंपरिक रूप से वामपंथ और कांग्रेस के मतदाताओं में सेंध लगाकर खुद को राज्य की प्रमुख विपक्षी ताकत के रूप में स्थापित किया है।

बंगाल में बीजेपी का चुनावी सफर

अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो बीजेपी का बंगाल में राजनीतिक सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। वर्ष 2001 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को केवल लगभग 5 प्रतिशत वोट मिले थे। इसके बाद 2016 के चुनाव में 291 सीटों में से केवल 3 सीटें ही बीजेपी के खाते में आई थीं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पार्टी का वोट प्रतिशत तेजी से बढ़ा है और अब यह करीब 39 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच चुका है। पार्टी के पास राज्य में 12 सांसद और 65 से अधिक विधायक भी हैं। हालांकि इसके बावजूद बीजेपी को अब तक टीएमसी के सामने निर्णायक जीत हासिल नहीं हो सकी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी द्वारा बीजेपी को “बाहरी पार्टी” बताने की रणनीति कई मौकों पर प्रभावी रही है, जिससे बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ा।

कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि बंगाल में बीजेपी का अत्यधिक निर्भर रहना कथित उत्तर भारतीय राजनीतिक मॉडल पर कई बार पार्टी के लिए चुनौती बन जाता है। इसके अलावा कुछ वर्गों का मानना है कि मतदाता सूची पुनरीक्षण जैसे मुद्दों पर अत्यधिक जोर देने से मतुआ समुदाय सहित कुछ समूहों में असंतोष भी पैदा हो सकता है। इसके साथ ही राज्य इकाई में समय-समय पर सामने आने वाली आंतरिक गुटबाजी भी पार्टी के लिए चुनौती बनी रही है। पिछले चुनावों में भी यह स्थिति बीजेपी के प्रदर्शन को प्रभावित करती दिखाई दी थी।

अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही माकपा

पश्चिम बंगाल की राजनीति में कभी मजबूत रही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) आज अपने अस्तित्व को बचाने की चुनौती से जूझ रही है। पार्टी को उम्मीद है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में वोट शेयर में हुई हल्की बढ़ोतरी से उसे कुछ राजनीतिक ऊर्जा मिलेगी। हाल ही में आयोजित ‘बांग्ला बचाओ यात्रा’ के दौरान मिली प्रतिक्रिया से उत्साहित माकपा राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार और धार्मिक ध्रुवीकरण के आरोप लगाते हुए जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी अपने नेताओं की सादगी और साफ छवि को भी अपनी ताकत मानती है। इसके अलावा माकपा ने स्कूल नौकरी घोटाला और आर. जी. कर मेडिकल कॉलेज की घटना जैसे मुद्दों को लेकर आंदोलन भी चलाए हैं।

हालांकि इन आंदोलनों का चुनावी परिणामों पर ज्यादा असर देखने को नहीं मिला। 2011 में सत्ता से बाहर होने से पहले वाम मोर्चे को लगभग 39 प्रतिशत वोट मिले थे, जिनमें से करीब 30 प्रतिशत वोट अकेले माकपा के थे। लेकिन एक दशक बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चे का वोट प्रतिशत घटकर लगभग 4.7 प्रतिशत रह गया। घटता जनाधार और वरिष्ठ नेतृत्व का उम्रदराज होना भी वाम दलों के सामने बड़ी चुनौती माना जाता है। कभी 1977 से 2011 तक लगातार 34 वर्षों तक सत्ता में रहने वाला वाम मोर्चा अब राज्य की राजनीति में काफी कमजोर स्थिति में पहुंच चुका है।

कांग्रेस भी तलाश रही नई जमीन

इधर कांग्रेस भी बंगाल में अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता को फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रही है। इस बार पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है और लंबे समय से चला आ रहा वाम दलों के साथ गठबंधन समाप्त कर दिया है। हालांकि पिछले चुनावों में कांग्रेस को खास सफलता नहीं मिली, लेकिन मालदा, मुर्शिदाबाद और नदिया जैसे जिलों में पार्टी का पारंपरिक प्रभाव अब भी मौजूद माना जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर इन क्षेत्रों में कांग्रेस ने प्रभावी प्रचार किया, तो यह उसके राजनीतिक पुनरुत्थान का आधार बन सकता है। पार्टी के नेताओं के मुताबिक आगामी चुनाव के लिए टिकट पाने के लिए बड़ी संख्या में आवेदन आए हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि संगठन के भीतर अभी भी चुनावी उम्मीद बनी हुई है।

फिर भी राज्य में कांग्रेस के सामने कई चुनौतियां हैं। कभी बंगाल की राजनीति पर दशकों तक शासन करने वाली पार्टी आज संगठनात्मक कमजोरी, सीमित संसाधनों और लगातार दलबदल जैसी समस्याओं से जूझ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में घटती पकड़ और स्थानीय स्तर पर कमजोर संगठन के कारण कांग्रेस की राजनीतिक ताकत काफी सीमित हो गई है। ऐसे में आने वाला चुनाव यह तय करेगा कि बंगाल की राजनीति में टीएमसी का दबदबा बरकरार रहेगा या विपक्षी दल उसे चुनौती दे पाएंगे।

Share post:

Popular

More like this
Related