बिहार की सत्ता में ‘अति पिछड़ों’ की चाबी, नीतीश कुमार की राजनीति का सामाजिक समीकरण

बिहार की सत्ता में ‘अति पिछड़ों’ की चाबी, नीतीश कुमार की राजनीति का सामाजिक समीकरण

THe Front Desk, बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों पर हमेशा से टिकी रही है, लेकिन 2005 के बाद एक नया मोड़ तब आया जब ‘अति पिछड़ी जातियों’ (EBC – Extremely Backward Classes) को पहली बार राज्य की सत्ता के केंद्र में स्थान मिला। इस सामाजिक वर्ग को सत्ता में निर्णायक भूमिका देने का श्रेय मुख्यमंत्री नीतिश कुमार को जाता है, जिन्होंने इन्हें न केवल पहचान दिलाई, बल्कि राजनीतिक ताकत भी सौंपी। आज जब बिहार एक बार फिर चुनावी मोड में है, तब यह वर्ग पुनः राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में है।

‘अति पिछड़ा’ क्या है और क्यों है अहम?

बिहार की कुल जनसंख्या का लगभग 36% हिस्सा अति पिछड़ी जातियों से आता है। इसमें नाई (नाई), मछुआरे (साहनी, निषाद और केवट), टाटावान दस्त, तेली (तेल व्यवसाय वाले),नोनिया(चौहान) (परंपरागत रूप से वे शोरा और नून या लून बनाते थे, और धानुक जैसे अनेक जातीय समूह शामिल हैं जो पारंपरिक रूप से न तो सवर्णों की सत्ता में रहे और न ही यादव-मुस्लिम गठबंधन की मुख्यधारा में।
इन जातियों का महत्व इसलिए बढ़ता है क्योंकि ये संख्या में विशाल हैं लेकिन ऐतिहासिक रूप से राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित रहे हैं। नीतिश कुमार ने इसी राजनीतिक खालीपन को भरने की रणनीति बनाई।
नीतीश कुमार और ‘EBC कार्ड’
2005 में सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार ने सबसे पहले पंचायत चुनावों में अति पिछड़ों को 20% आरक्षण देकर उन्हें स्थानीय शासन में भागीदारी दी। इसके बाद उन्होंने ‘महादलित आयोग’ और ‘अति पिछड़ा आयोग’ का गठन कर इन वर्गों को अलग पहचान और योजनाओं में प्राथमिकता दी।
नीतीश कुमार की ‘समावेशी विकास’ की नीति में यह स्पष्ट झलकता है कि उन्होंने EBC और महादलित वर्ग को कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक से खींचकर JDU की राजनीतिक रीढ़ बना दिया।

जातीय जनगणना और आरक्षण का विस्तार

2022–23 की जातीय जनगणना में खुलासा हुआ कि EBC और OBC मिलाकर बिहार की जनसंख्या का 63% हैं। इस आधार पर नीतीश सरकार ने राज्य स्तरीय नौकरियों व शिक्षा में आरक्षण की सीमा 50% से बढ़ाकर 65% कर दी।
यह कदम एक सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा निर्णय था, लेकिन इसका राजनीतिक संदेश भी उतना ही स्पष्ट था—EBC वर्ग को दिखाना कि सत्ता में उनकी भागीदारी और बढ़ाई जा रही है।

राजनीतिक रणनीति: ‘लव-कुश’ समीकरण से ‘पसमांदा’ तक

नीतीश कुमार की राजनीति ‘लव–कुश समीकरण’ (यानी कुर्मी + कोइरी) से शुरू होकर अब EBC + महादलित + पसमांदा मुस्लिम वोट बैंक तक फैल गई है। उन्होंने सामाजिक रूप से पिछड़े, राजनीतिक रूप से उपेक्षित वर्गों को एक साझा पहचान और मंच दिया।
वहीं, यह समीकरण RJD के ‘MY (Muslim–Yadav)’ गठबंधन से भिन्न है और JDU की अपनी स्वतंत्र पहचान गढ़ता है। यही वजह है कि भाजपा या RJD, दोनों ही दलों को नीतीश के EBC प्लैंक से चुनौती मिलती है।

आलोचना और विवाद

नीतीश कुमार की यह रणनीति आलोचना से भी अछूती नहीं रही। विपक्षी दलों का आरोप है कि EBC और महादलित आयोगों का गठन चुनावी साल में केवल वोट बैंक साधने के लिए किया गया। वहीं, बढ़ा हुआ आरक्षण सुप्रीम कोर्ट में चुनौती का सामना कर रहा है।
इसके बावजूद, यह तथ्य नकारा नहीं जा सकता कि नीतीश कुमार ने एक ऐसा सामाजिक तबका राजनीति में सक्रिय किया है जिसे लंबे समय तक हाशिये पर रखा गया था।

बिहार की राजनीति में अब न केवल यादव या सवर्ण वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं, बल्कि ‘अति पिछड़ा’ वर्ग सत्ता का नया केंद्र बन चुका है। नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत इसी सामाजिक पुनर्रचना में निहित है। वे न केवल बिहार में EBC राजनीति के शिल्पकार हैं, बल्कि देशभर में ‘सबका साथ, सबका विकास’ की व्याख्या को व्यावहारिक धरातल पर लागू करने वाले नेता के रूप में भी उभरे हैं।
आगामी चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह वर्ग एक बार फिर नीतीश को सत्ता दिलाएगा या विपक्ष इस समीकरण को तोड़ने में सफल रहेगा।

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