शब्दों की बेबाक आवाज़ : जावेद अख्तर का साहित्यिक संसार

जावेद अख्तर केवल गीतकार या शायर नहीं हैं, वे शब्दों के माध्यम से समय से संवाद करने वाले रचनाकार हैं। उनका साहित्य मनोरंजन से आगे बढ़कर सवाल करता है, असहमति जताता है और सोचने को मजबूर करता है। आज उनके जन्मदिवस पर उन्हें याद करना दरअसल हिंदी–उर्दू साहित्य की उस परंपरा को सलाम करना है, जहाँ कविता सिर्फ़ खूबसूरती नहीं, साहस भी होती है।

कुछ रचनाकार ऐसे होते हैं जिनकी रचनाएँ समय के साथ पुरानी नहीं होतीं, बल्कि समय को समझने का औज़ार बन जाती हैं। जावेद अख्तर उन्हीं में से एक हैं। उनका लेखन किसी बीते दौर की स्मृति में उलझा नहीं रहता, बल्कि हर बार पढ़े जाने पर वर्तमान से सवाल करता है। शायद यही कारण है कि दशकों बाद भी उनके शब्द उतने ही जीवित और प्रासंगिक लगते हैं, जितने अपने शुरुआती दिनों में थे।

जावेद अख्तर की शायरी आम आदमी की ज़िंदगी से निकलती है। उनकी पंक्तियों में मोहब्बत है, लेकिन आँख मूँदकर की गई नहीं; उसमें सवाल भी हैं, तर्क भी और आत्मसम्मान भी। वे प्रेम को कमज़ोरी नहीं बनने देते, बल्कि उसे समझदारी और बराबरी के साथ देखने की बात करते हैं। वे लिखते हैं— “ये जो हम में तुम में रब्त है, ये कोई खेल नहीं, ये कोई हद नहीं।” ऐसी पंक्तियाँ रिश्तों को भावुकता नहीं, चेतना के साथ जीने की सीख देती हैं।

उनकी ज़िंदगी खुद एक कहानी है — संघर्ष, अकेलापन और आत्मसम्मान की कहानी। भोपाल में जन्मे जावेद अख्तर का बचपन सुविधाओं में नहीं बीता। शुरुआती दौर में उन्होंने अभाव, अस्थिरता और अकेलेपन को बहुत करीब से देखा। यही वजह है कि उनके लेखन में संवेदना बनावटी नहीं लगती; वह अनुभव से उपजी हुई सच्चाई होती है। उन्होंने गरीबी को न तो रोमांटिक बनाया और न ही उससे सहानुभूति की भीख माँगी — उन्होंने उसे समझा और उसी समझ से लिखा।

फिल्मों की दुनिया में जब वे आए, तब गीतकार को अक्सर तुकबंदी करने वाला कारीगर माना जाता था। लेकिन जावेद अख्तर ने गीत को विचार दिया। उनके गीत कहानी की सजावट नहीं बने, बल्कि उसका विस्तार बने। उन्होंने यह साबित किया कि लोकप्रिय सिनेमा और साहित्यिक गरिमा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। उनके गीत किरदारों को गहराई देते हैं, कहानी को आगे बढ़ाते हैं और समाज का आईना बनते हैं। वे शब्दों को सजाते नहीं, तराशते हैं। शायरी में भी उन्होंने भावुकता के शोर से दूरी बनाए रखी। उनका दुख आत्मदया में नहीं बदलता, और उनका विद्रोह नारेबाज़ी नहीं करता — वह तर्क करता है। वे उस परंपरा के कवि हैं जहाँ कविता सत्ता से सवाल करती है, समाज की चुप्पी को तोड़ती है और इंसान को इंसान होने की याद दिलाती है।

आज उनके जन्मदिवस पर यह समझना ज़रूरी हो जाता है कि जावेद अख्तर को पढ़ना महज़ पसंद का मामला नहीं, बल्कि अपने समय को समझने का एक तरीका है। शायद इसलिए क्योंकि वे हमें यह याद दिलाते हैं कि सवाल करना ज़रूरी है,शायद इसलिए क्योंकि वे डर के दौर में भी भाषा को झुकने नहीं देते और शायद इसलिए क्योंकि वे यह साबित करते हैं कि सच हमेशा असहज होता है, लेकिन ज़रूरी भी। जावेद अख्तर की सबसे बड़ी पहचान उनकी बेबाकी है। चाहे मंच हो या पन्ना, वे वही कहते हैं जो उन्हें सच लगता है। उनकी असहमति न तो शोर मचाती है और न ही चुप रहती है। यही कारण है कि वे कई बार विवादों में भी रहे, लेकिन उन्होंने कभी अपने शब्दों की धार कम नहीं की। उनका साहित्य सुविधा से नहीं, ज़मीर से जन्म लेता है।

आज उन्हें पढ़ना दरअसल यह स्वीकार करना है कि साहित्य केवल सौंदर्य का अभ्यास नहीं, बल्कि विवेक का निर्माण भी है। जावेद अख्तर का लेखन हमें सिखाता है कि सोचने की आज़ादी सबसे बड़ी आज़ादी है — और शब्द उसका सबसे मज़बूत हथियार। आज जावेद अख्तर का जन्मदिवस सिर्फ़ एक लेखक का उत्सव नहीं है। यह उस सोच का उत्सव है जो शब्दों से डरती नहीं, और शायद किसी भी लेखक की सबसे बड़ी उपलब्धि यही होती है— कि वह हमें सहज न रखे,बल्कि हमें सोचने पर मजबूर कर दे।

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